बुधवार, 12 जनवरी 2022

व्यंग्य : मूँछ का संकटकाल


     देश के हृदय मध्यप्रदेश में मूँछ ने इन दिनों बवंडर मचाया हुआ है। मूँछ धारियों के साथ-साथ मुछमुंडों के बीच मूँछों की चर्चा का बाजार गर्म हो रखा है। सभी सोच रहे हैं कि आखिरकार मूँछ ने ऐसा क्या गुनाह कर दिया जो उसके पीछे इतना सब हो गया। जब मूँछ से सीधे जाकर ये सवाल पूछा गया तो उसने कड़क अंदाज में पूरी नरमी से पूरे हालात बताए कि मूँछ विवाद में उसका कोई हाथ नहीं है। वो तो मूँछ भत्ते के सहारे फल-फूल कर हृष्ट-पुष्ट बनने के अभियान में लगी हुई थी, पर उसे न जाने  किस मुएँ की नज़र लगी कि  उसके अस्तित्व पर ही खतरा मँडराने लगा। वो तो भला हो स्वाभिमान महाराज का जिन्होंने एन वक़्त पर आकर उसे बाल-बाल बचा लिया।

    स्वाभिमान के अलावा राजपूती आन-बान ने भी मूँछ की रक्षा करने में बराबर की भूमिका निभाई। मूँछ अपने ऊपर अचानक आए इस खतरे से निबट कर अब इस विचार-विमर्श में डूब रखी है, कि आखिर उसके होने से भला किसी को क्या नुकसान अथवा आपत्ति है जो उसके सफाए का यूँ तुग़लकी फरमान सुना दि या गया। जिस लोकतंत्र में देशवासी कुछ भी करने की आजादी का मजा लेते हुए मर्यादा को जैम कर कूट  रहे हैं, उसमें एक बेचारी मूँछ को यूँ सरेआम मिटाने की साजिश की जा रही है। एक समय था जब 'मूँछ नहीं तो कुछ नहीं' कथन के बल पर मूँछ की दुनिया खुशहाल थी। पर अब तो ऐसा समय आ गया कि 'मूँछ का सफाया  कैसे किया जाए' योजना पर कार्य किया जा रहा है । इन दिनों बेशक मुँछडापन दुनिया पर हावी हो फिर भी मूँछ को पसंद करने वाले अभी भी हैं, जिसमें मुछमुंडों की संख्या भी अच्छी-खासी है।

     इसके बावजूद मूँछ को मूँछधारी के मुख से तड़ीपार करने का कुत्सित प्रयास किया गया। एक दौर वो था जब मूँछ बचा ने के लिए लड़ाई लड़ते हुए सर तक कटा दिए जाते थे और इस लड़ाई में कुनबे के लोग भी जी-जान से मूँछधारी का साथ निभाते थे। अब तो ऐसा दौर आ गया है कि कुनबे के बड़े ही कुनबे के छोटों की मूँछ को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। सही मायने में ये मूँछ का संकट काल है। इस काल में वही मूँछ बाकी बचेगी जिसे धारण करनेवाला निडर व स्वाभिमानी होगा और अपने व्यवहार से अधिक से अधिक समर्थन प्राप्त कर सरेआम अपनी मूँछों पर ताव देगा। बहरहाल इस मुछमुंडे लेखक का मूँछ को बिना शर्त समर्थन देने का नेक विचार है। मूँछ स्वयं को मिलने वाले भत्ते का यूँ ही सदुपयोग कर लहलहाती रही और जलने वालों के दिलों पर समय-समय पर नागिन डांस करती रही।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


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