बुधवार, 4 मई 2022

नारियों की अनछुई दास्तां है हर स्टोरी

"आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य,

मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य।"

कवि गोपालदास नीरज की उक्त पंक्तियों को चरितार्थ करते हुए काव्य परिवार में एक नए सदस्य का आगमन हुआ है और उस सदस्य का नाम है सुश्री नेहा बंसल। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी कविताओं के संग्रह 'हर स्टोरी' के माध्यम से कवयित्री नेहा बंसल पाठकों के लिए उन नारियों की कहानियाँ लेकर आयीं हैं, जिनके बारे में समाज ने लिखना उचित नहीं समझा और यदि लिखा भी है तो उसे नगण्य की श्रेणी में ही रखा जाएगा। द्रोपदी, हिडिम्बी, अहिल्या, सूर्पनखा, मंदोदरी, रेणुका, यशोदा व उर्मिला जैसे ऐतिहासिक पात्रों के साथ-साथ कवयित्री ने नारी जीवन से जुड़े प्रत्येक विषय पर अपनी कलम चलायी है। वह विषय चाहे अपने स्वार्थ के लिए नारी को डायन घोषित कर मार डालने वाले समाज का हो, या वासना से अभिभूत सिरफिरों द्वारा तेजाब फेंककर किसी मासूम लड़की का चेहरा जलाकर उसका जीवन बर्बाद कर देने की घृणित मानसिकता हो या फिर नारी के शोषण के लिए अपनायी जाने वालीं सामाजिक कुरीतियों का वर्णन हो। कवयित्री ने प्रत्येक विषय को बड़े ही संवेदनशील व मार्मिक ढंग से अपने इस कविता संग्रह में उठाया है। नारी से संबंधित छोटे-बड़े विषयों को जिस गहराई व संवेदनशीलता से कवयित्री ने उस संग्रह में संकलित अपनी 39 कविताओं द्वारा प्रस्तुत किया है वह प्रशंसनीय हैं। हिडिम्बी पर केंद्रित कविता के साथ-साथ इस कविता संग्रह की कुछ अन्य कविताएं तो इतनी मार्मिक हैं, कि उन्हें पढ़कर पाठक का हृदय संवेदना से भर उठता है। प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी कवयित्री का संवेदनशील लेखन पाठकों को इस बात के प्रति आश्वस्त करता है, कि कवयित्री लेखन के साथ-साथ प्रशासनिक सेवा का संवहन करते हुए समाज की बेहतरी में निश्चित रूप से अपना भरपूर योगदान देंगीं। इसलिए मुझे आशा के साथ-साथ पूर्ण विश्वास है, कि सरस्वती कुल के सभी सम्मानित सदस्यगण एवं गंभीर पाठकगण कवयित्री के इस प्रथम प्रयास के लिए उनका हृदय खोलकर स्वागत करेंगे तथा साथ ही ये कामना करेंगे कि कवयित्री नेहा बंसल एक न एक दिन लेखन के आकाश में ध्रुव तारा बनकर  चमकें। एवमस्तु!

पुस्तक - हर स्टोरी

लेखिका - नेहा बंसल, नई दिल्ली

प्रकाशक - साहित्य अकादमी, दिल्ली

पृष्ठ - 78

मूल्य - 100 रुपये

समीक्षक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली

मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

व्यंग्य के तड़कों से भरपूर है जैसे थे उपन्यास

 पुलिस का पेशा बड़ा नीरस और सूखा सा लगता है। पुलिस का ख्याल आते ही एक छवि उभरती है, जिसमें हंसी कहीं दूर-दूर तक नहीं होती।  लेकिन सुमित प्रताप सिंह से मिलकर आपके दिमाग में बनी पुलिस की कड़क और खड़ूस वाली छवि निकल जाएगी।  सुमित प्रताप को मैंने पहली बार एक मीडिया कार्यक्रम में कविता पाठ करते सुना था। 'माँ' और 'वन्दे भारत' वाली  देशभक्ति की कविता थी। सुनकर मुझे यकीन नहीं हुआ कि ये कवि नहीं पुलिस पर्सन हैं।  ये तो शुरूआत थी बाद में पता चला कि महाशय कवि कम व्यंग्यकार अधिक हैं, जो सुमित के तडके नाम से अपनी फेसबुक वॉल पर हंसी के खूब तड़के लगाते हैं। 

उत्सुकता बढ़ी तो उनकी लिखित किताब 'जैसे थे' पढ़ी। मेरे लिए इस किताब को पढ़ना एक अलग अनुभव था।  व्यंग्य की शेप में पुलिस का पूरा अनुभव इसमें बोल रहा था। इस किताब में उन्होंने बड़ी सहजता से झूठ, आडम्बर और अपराध के परदे खोले हैं।  जैसे-जैसे किताब आगे बढ़ती जाती है, समाज की परतें प्याज की तरह खुलती चली जाती हैं।

कहानी की शुरुआत व्यस्तपुरा गाँव की चौपाल से होती है। व्यस्तपुरा के माध्यम से लेखक ने बिजी फॉर नथिंग के कच्चे चिट्ठे उधेड़े हैं। जैसे वो बताते हैं कि व्यस्तपुरा के वासी इतने व्यस्त थे कि पड़ोस के गाँव वाले उनसे चिढ़ने लगे कि आखिर ये इतने व्यस्त कैसे रहते हैं।  लेखक ने पात्रों के नाम भी बड़े रोचक चुने हैं। भोलेभाले गाँव वालों की कहानी नारद कुमार के सवाल-जवाब से आगे बढ़ती है। लेखक सुमित के लेखन की ये बात मुझे ख़ास लगी कि उनकी कहानी में करेक्टर 'ओपोसिट कम्पलीमेंट' को बड़े अद्भुत तरीके से निभाते हैं। जैसे विनम्रपुरा थाने का नया थानेदार कड़क है, बाबा सबसे बूढ़े हैं लेकिन नाम बालक है।  थानेदार कड़क सिंह  एक मजनू को सड़क पर हीरोगीरी दिखाते देख कर आग बबूला हो जाते हैं और उसका आधा सर मुड़वा देते हैं। लेख उस वक्त की याद दिलाते हैं जब ये यूपी में बड़ा आम था, लफंगो को सबक सिखाने का शानदार तरीका।  ऐसे ही कहानी का पात्र  पुरानी फिल्मों के वो सीन याद दिला  देते हैं जिसमे शहर और गाँव के कल्चर के फासले दिखते हैं।  यहाँ भी सुमित अपने ओपोसिट कोम्प्लीमेंट वाले स्टाइल में लिखते हैं कि कैसे 'भागे सिंह' शहर पहुंचते हैं और कैसे उनके रिश्तेदार बड़ी बेरूखी से स्वागत करते है। बेचारे रात बालकनी में मच्छरों के साथ बिताते हैं और दिल्ली दर्शन करते हैं और लौट के बुद्धू वापस गाँव आकर ही राहत की सांस लेते हैं।  कहानी के माध्यम से दो  गाँव वालों के बीच की दुश्मनी भी बखूबी दिखाई है|  इतना ही नहीं साधू और मौलाना के वेश में छुपे अपराधियों की कहानी को शामिल करके सुमित  अपराधियों की चतुराई और समाज के आडम्बर और नादानी की पोल भी खोलते हैं। कहानी छोटे-छोटे चैप्टर में बंटी है। जो पढ़ने में काफी सहज लगती है। सुमित जी को खुद कहानी सुनने का शौक है लेकिन इस शौक के कारण हमें भी बड़ी मजेदार और सुन्दर कहानी सुनने को मिली, युवा साहित्यकार सुमित जी साधुवाद और बधाई के पात्र हैं। 

सुमित जी अगली किताब की प्रतीक्षा रहेगी।

- डॉ. तरुणा एस. गौड़

संपादक, लीड्स इंडिया ग्रुप, दिल्ली

गुरुवार, 24 मार्च 2022

रोचक है जैसे थे उपन्यास

    


     हाल ही में मेरे यशस्वी मित्र सुमित प्रताप सिंह की नवीनतम पुस्तक 'जैसे थे' जो कि उपन्यास के रूप में प्रकाशित हुई है उसे पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ।  अमूमन ज्ञानीजन पुस्तक पढ़कर उसकी समीक्षा करते हैं, जो कि एक नितांत अलग स्तर है पर मुझ जैसे साधारण पाठक जो कुछ भी पढ़ते हैं उस पर अपनी त्वरित प्रतिक्रिया ही दे सकते हैं। देखा जाए तो लेखक और पाठक के बीच में ही कहीं पर बैठा होता है समीक्षक जो वस्तुतः पाठक को बताता है कि अमुक पुस्तक में पढ़ने योग्य क्या अच्छा या बुरा है और वहीं लेखक को बताता है कि उसने उस पुस्तक के लेखन में कहां पर गलती की, पर बात यदि पाठक से सीधा लेखक तक पहुंच जाए तो कुछ और ही बात है। इसी क्रम में मुझे भी लगा कि मैं अपनी बात सीधा सुमित तक पहुंचाऊं।  वैसे तो सुमित अभी तक की लेखन यात्रा में अपने को एक विशिष्ट विधा में जिसे कि व्यंग्य कहा जाता है और जो कि सामाजिक जन-जागरण का सबसे सशक्त माध्यम है में अपने को स्थापित कर चुके हैं और एक मुकाम पर बैठे हुए दृष्टिगत होते हैं। अब बात करते हैं सुमित के उपन्यास 'जैसे थे' पर। चूंकि मैं स्वयं लंबे समय या यूं कहें कि बचपन से ही पढ़ने में एक अच्छा-खासा समय देते आया हूं तो प्रथम दृष्टि में ही यदि कोई पुस्तक मुझे आकर्षित न करे तो उसे फिर से हाथ में उठाना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है परंतु सुमित की पुस्तक 'जैसे थे' मैंने वन-गो में पढ़ डाली। यह तो निश्चित है कि पुस्तक रोचक है और उतने ही रोचक है पुस्तक के कथानक के पात्र व स्थान। वह चाहे पत्रकार नारद कुमार हो, कवि तोप सिंह या कि विनम्रपुरा थाने का थानेदार कड़क सिंह। यहां तक कि उपन्यास के केंद्र में उल्लिखित गाँव ही अजब से नाम वाला व्यस्तपुरा है। सुमित ने इस उपन्यास में हास्य विनोद के प्रसंगों के साथ साथ पुलिस थाना, छिछले कवि, साहित्यिक अकादमियों, धार्मिक अंध श्रद्धा, समाज में व्याप्त अन्य विसंगतियों और पुजारी व दरगाह के खादिम के माध्यम से धार्मिक घालमेल पर भरपूर व्यंग्य किया है।  आशा करता हूँ सुमित इसी प्रकार से अपनी लेखनी तीक्ष्ण करते रहेंगे और निरंतर अपना लेखकीय योगदान देते रहेंगे।

- धर्मेंद्र गिरी, नई दिल्ली


गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

व्यंग्य : चुनाव और पुलिस


    र बार चुनाव आता है और आकर चला जाता है। इस दौरान समाज के हर वर्ग की सुध ली जाती है, पर बेचारी पुलिस पर कोई राजनीतिक दल और उसका नेता ध्यान नहीं देता। ऐसा भी हो सकता है कि बेचारी पुलिस किसी वर्ग की श्रेणी में आने के योग्य ही न हो। जब भी वेतन की वृद्धि की बात आती है तो आपसी कटुता को ताक पर रखकर सभी माननीय एक हो जाते हैं। अगर माननीय क्रमशः पार्षद, विधायक और सांसद बन जाते हैं तो वे तीन-तीन पेंशन के हकदार हो जाते हैं, पर पुलिसकर्मी इस मामले में इतना भाग्यशाली नहीं होता है। वह 24 घंटे ड्यूटी के बंधन में बँधे रहने के बावजूद समुचित वेतन पाने का भी हकदार नहीं है। एक पुलिसकर्मी को ऐसी-ऐसी परिस्थितियों व ऐसे-ऐसे स्थानों में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है, कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कभी उसे जेठ की दुपहरी में जलना पड़ता है, कभी मूसलाधार बारिश में भीगते हुए काँपना पड़ता है तो कभी पूस की रात में हाड़ कंपाने वाली ठंड में ठिठुरना पड़ता है। सुनसान इलाके में अंधेरी रात में पिकेट पर आसपास कुछ भी खाने को न मिल पाने के बाद भूख को बर्दाश्त करता हुआ पुलिसवाला आकाश में पेंशन रुपी कल्पित तारे को देखकर इस बात का संतोष करते हुए  अपनी ड्यूटी में कर्मठता से जुटा रहता था, कि जब कभी वह सेवानिवृत्त होगा तो पेंशन के सहारे अपने परिवार संग अपना बाकी जीवन चैन की बंशी बजाते हुए बिताएगा,  पर अब तो नई पेंशन योजना के तहत वो आस भी कबकी टूट चुकी है। पुलिस चाहे लाख अच्छे कार्य कर ले, पर उन पर कभी  ध्यान नहीं दिया जाता, किंतु यदि उससे भूले से भी जरा सी चूक हो जाये तो उसकी आफत आ जाती है। कभी पुलिस के नाम से बदमाशों को पसीना छूट जाता था पर अब बदमाश तो बदमाश बल्कि आम आदमी भी बिना-बात के पुलिस को पीटने की फ़िराक में रहता है। पुलिस को संगठित होकर अपनी बात कहने का भी अधिकार नहीं है, जो संगठित होकर अपने दुःख और परेशानी सरकार के सामने बयाँ कर सके। इसीलिए  पुलिस से जब  कभी उसके वर्तमान हालात के बारे में पूछा जाता है तो पुलिस की बदहाल बैरकें, जर्जर स्टाफ क्वार्टर, थकी-मांदी वर्दी और नींद से भरी हुयी अलसाई हुईं आँखें एक साथ उदासी से मुस्कुराते हुए धीमे से स्वर में कहती हैं जैसे थे।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

बुधवार, 12 जनवरी 2022

व्यंग्य : मूँछ का संकटकाल


     देश के हृदय मध्यप्रदेश में मूँछ ने इन दिनों बवंडर मचाया हुआ है। मूँछ धारियों के साथ-साथ मुछमुंडों के बीच मूँछों की चर्चा का बाजार गर्म हो रखा है। सभी सोच रहे हैं कि आखिरकार मूँछ ने ऐसा क्या गुनाह कर दिया जो उसके पीछे इतना सब हो गया। जब मूँछ से सीधे जाकर ये सवाल पूछा गया तो उसने कड़क अंदाज में पूरी नरमी से पूरे हालात बताए कि मूँछ विवाद में उसका कोई हाथ नहीं है। वो तो मूँछ भत्ते के सहारे फल-फूल कर हृष्ट-पुष्ट बनने के अभियान में लगी हुई थी, पर उसे न जाने  किस मुएँ की नज़र लगी कि  उसके अस्तित्व पर ही खतरा मँडराने लगा। वो तो भला हो स्वाभिमान महाराज का जिन्होंने एन वक़्त पर आकर उसे बाल-बाल बचा लिया।

    स्वाभिमान के अलावा राजपूती आन-बान ने भी मूँछ की रक्षा करने में बराबर की भूमिका निभाई। मूँछ अपने ऊपर अचानक आए इस खतरे से निबट कर अब इस विचार-विमर्श में डूब रखी है, कि आखिर उसके होने से भला किसी को क्या नुकसान अथवा आपत्ति है जो उसके सफाए का यूँ तुग़लकी फरमान सुना दि या गया। जिस लोकतंत्र में देशवासी कुछ भी करने की आजादी का मजा लेते हुए मर्यादा को जैम कर कूट  रहे हैं, उसमें एक बेचारी मूँछ को यूँ सरेआम मिटाने की साजिश की जा रही है। एक समय था जब 'मूँछ नहीं तो कुछ नहीं' कथन के बल पर मूँछ की दुनिया खुशहाल थी। पर अब तो ऐसा समय आ गया कि 'मूँछ का सफाया  कैसे किया जाए' योजना पर कार्य किया जा रहा है । इन दिनों बेशक मुँछडापन दुनिया पर हावी हो फिर भी मूँछ को पसंद करने वाले अभी भी हैं, जिसमें मुछमुंडों की संख्या भी अच्छी-खासी है।

     इसके बावजूद मूँछ को मूँछधारी के मुख से तड़ीपार करने का कुत्सित प्रयास किया गया। एक दौर वो था जब मूँछ बचा ने के लिए लड़ाई लड़ते हुए सर तक कटा दिए जाते थे और इस लड़ाई में कुनबे के लोग भी जी-जान से मूँछधारी का साथ निभाते थे। अब तो ऐसा दौर आ गया है कि कुनबे के बड़े ही कुनबे के छोटों की मूँछ को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। सही मायने में ये मूँछ का संकट काल है। इस काल में वही मूँछ बाकी बचेगी जिसे धारण करनेवाला निडर व स्वाभिमानी होगा और अपने व्यवहार से अधिक से अधिक समर्थन प्राप्त कर सरेआम अपनी मूँछों पर ताव देगा। बहरहाल इस मुछमुंडे लेखक का मूँछ को बिना शर्त समर्थन देने का नेक विचार है। मूँछ स्वयं को मिलने वाले भत्ते का यूँ ही सदुपयोग कर लहलहाती रही और जलने वालों के दिलों पर समय-समय पर नागिन डांस करती रही।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


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