रविवार, 7 अप्रैल 2019

व्यंग्य : जिले की फसल


भाई जिले!
हाँ बोल भाई नफे!
कैसे सुस्त सा हो रखा है?
भाई क्या करूँ फसल-वसल काटने का मौका ही नहीं मिल पा रहा है। अब सुस्त न होऊँ तो और क्या करूँ?
मौका नहीं मिल पा रहा हैतेरे कहने का मतलब क्या हैतेरी फसल तो कटने को तैयार खड़ी है और तू कह रहा है कि फसल काटने का मौका नहीं मिल पा रहा है।
भाई मैं बिलकुल सही कह रहा हूँ। मैं ही क्या मेरे बाकी किसान भाई भी पड़े-पड़े सुस्ता रहे हैं।
पर ऐसा क्यों?
हमारी फसल काटने को वे हैं न।
कौन वेक्या फसल काटने के लिए मजदूर रख लिए हैंअगर ऐसी बात है तो फिर तू और तेरे किसान भाई उस कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं।
कौन सी कहावत?
घर में नहीं हैं दानेअम्मा चली भुनाने।
अरे भाई ऐसी बात नहीं है।
- तो फिर कैसी बात है?
- दरअसल अब हम किसानों को मजदूर भी किराए पर लेने की जरूरत नहीं है।
फिर वे भला कौन हैं जो तुम सबकी फसल मुफ्त में काटने को इतने उतावले हो रखे हैं?
भाई इन दिनों कुछ स्वप्नसुंदरियाँ बड़ी-बड़ी गाड़ियों और हेलीकॉप्टरों से दराती हाथ में लिए हुए उतरती हैं और हमारे खेतों में खड़ी फसल काटने में जुट जाती हैं। बीच-बीच में एक भैयाजी भी आते हैं और हम सभी किसानों को हसीन सपने दिखाते हुए अपने कुर्ते की बाँह चढ़ा कर हमारे खेतों में बेगार करने लगते हैं। वे सब हमारे खेतों में मेहनत करते हैं और हम सब किसान भाई अपने-अपने घरों के आँगन में पड़े-पड़े सुस्ताते हुए अपनी-अपनी चारपाइयाँ तोड़ते रहते हैं।
तुम सबको यकीन है कि वे सभी स्वप्नसुंदरियां और हसीन सपने दिखाने वाले वो भैयाजी तुम सबकी फसल काट चुके होंगे।
हाँ भाई बिलकुल यकीन है।
तो चलके जरा अपने खेतों को भी देख ले।
जिले अपने खेतों में खड़ी फसल देखकर हैरान हो जाता है।
भाई नफे!
हाँ बोल भाई जिले!
उन स्वप्नसुंदरियों और हसीन सपने दिखाने वाले भैयाजी ने तो मरवा दिया।
इस घटना से कुछ समझ में आया?
हाँ भाई अच्छी तरह समझ में आया।
तो जो समझ में आया झट से बता डाल।
वे सभी स्वप्नसुंदरियाँ और हसीन सपनों के सौदागर भैयाजी वोटों की फसल काटने आये थे और उसे भली-भाँति काटकर अपने-अपने रास्ते निकल लिए। अब याद आया कि ऐसी स्वप्नसुंदरियाँ और ऐसे सपनों के सौदागर भैयाजी तो हमारे दादा और बापू के समय भी आये थे और ऐसे ही वोटों की फसल काटकर चंपत हो गए थे।
तो आगे से वोटों की फसल काटने वालों से सावधान रहना।
सावधान रहें भी तो भला कैसे रहें?
मतलब?
भाई अपने दादा और बापू की तरह ये जिले भी भारत की जनता का वो महान भाग है, जिसे चाहे जितना समझा लो पर वो स्वार्थ से विवश होकर वोटों की फसल काटनेवालों की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर फँस ही जाता है और बाद में अपना माथा पीटते हुए पछताता रहता है।
जिले दरअसल ये ही हमारे भारतीय लोकतंत्र का अद्भुत सौंदर्य है।
हा हा हा नफे ये तूने बिलकुल ठीक कहा।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली

चित्र गूगल से साभार 

2 टिप्‍पणियां:

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