शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

व्यंग्य : पकौड़ा टैक्स



     काम कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता। कई बार जो छोटा काम होता है वो देखने में तो छोटा होता है पर वो बड़े-बड़े कामों को फेल कर देता है। पर जिनके दिमाग में बड़ापन प्रचुर मात्रा में भरा हुआ हो वो काम का वर्गीकरण छोटे और बड़े के आधार पर ही करते हैं। इन दिनों पकौड़ा व्यवसाय पर चर्चा का बाज़ार गर्म है। पकौड़ों से याद आया कि दफ्तर में जिस दिन सबकी लार टपकने लगती तो ये एक इशारा होता कि सबका मन फलाँ जगह पर स्थित फलाँ मशहूर दुकान के चटपटे पकौड़े खाने का कर रहा है। सबकी लार से कहीं दफ्तर न भर जाए इस भय से अपन फटफटिया पर सवार हो अपने सहकर्मी को पीछे लादकर चल देते फलाँ जगह पर स्थित पकौड़ों के लिए फलाँ मशहूर दुकान पर। वहाँ पहुँचकर गज भर लंबी जीभ निकाले लंबी लाइन लगाए हुए भाँति-भाँति के पकौड़ों को देखकर लार टपकाते हुए भले मानव मिल जाते। उन्हें देखकर अनुभव होता कि उन पकौड़ों में कुछ न कुछ तो दिव्य शक्ति होती होगी जो लोगों में इतना दम-खम भर देती है कि जो लोग बैंक में नोटबंदी के दौरान रुपए बदलवाने की खातिर केवल कुछ घंटे लाइन में लगने से बेहोश तक हो जाते थे वो पकौड़े खरीदने की लाइन में बिना थके घंटों डटे रहते हैं।
     बहरहाल पकौड़ों की दुकान के मालिक फलाने सिंह के फलाने-ढिमकाने नौकर-चाकर पकौड़े बेचना शुरू करते तो इस सिलसिले का अंत देर रात तक ही होता। हर चीज को हाइजेनिक अंदाज में ग्रहण करनेवाले विकसित मस्तिष्क को धारण करनेवाले मानव अधधुले दोनों में अधपके पकौड़ों को चटनी में डुबो-डुबोकर स्वाद के मारे इतने वीभस्त तरीके से खाते कि ये देखकर एक पल के लिए तो बेचारे पकौड़े भी घबरा जाते। कोई-कोई तो स्वाद की कुछ ज्यादा ही इज्ज़त करते हुए पकौड़े खाने के बाद कटोरी भर चटनी से अपने गले को तर करते हुए चटनी को धन्य कर देते। मजे की बात ये है कि मँहगे पकौड़ों को खाते समय न तो मँहगाई रूपी सुरसा डायन अपना मुँह खोलती और न ही मँहगाई के लिए दिन-रात रोनेवाले भोले-भाले मानवों का इस ओर ध्यान देने का मन ही करता। 
     एक रात पकौड़ों की फलानी मशहूर दुकान के बंद होने के बाद उसके बाहर फलानी सरकारी नौकरी करनेवाले फलाने राम को जाने क्या सूझी कि उन्होंने उस दुकान के बाहर रखे ठूँस-ठूँसकर बुरी तरह भर चुके ड्रम को खाली करके पकौडों के दीवानों द्वारा पकौड़े हज़म करके फैकें गए जूठे दौनों को गिनना आरंभ कर दिया। जब उन्होंने सारे दौने गिन लिए तो अपना सिर पकड़कर नीचे बैठ गए। वो सोचने लगे कि फलानी सरकारी नौकरी करनेवाले उनके जैसे 10 अलाने, फलाने और ढिमकाने को उस फलानी मशहूर पकौड़ों की दुकान का मालिक फलाने सिंह वेतन पर रखने का सामर्थ्य रखता है। ये बात उस फलानी सरकारी नौकरी करनेवाले फलाने राम को कुछ ज्यादा ही चुभ गई और अगले सप्ताह ही फलानी मशहूर पकौड़ों की दुकान पर उसके मालिक फलाने सिंह के नाम आयकर विभाग का नोटिस आ गया। अब आयकर विभाग को पकौड़ों से होनेवाली आय पर नियमित रूप से आयकर प्राप्त हो रहा है लेकिन उस आयकर को फलानी मशहूर पकौड़ों की दुकान के मालिक फलाने सिंह नहीं, बल्कि गज भर लंबी जीभ निकाले दुकान के बाहर पकौड़ों पर झपटने को घात लगाए हुए ग्राहक पकौड़ा टैक्स के नाम पर ख़ुशी-ख़ुशी भर रहे हैं।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली
कार्टून गूगल से साभार 
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