मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

स्मार्ट आदमी


हमें नहीं मतलब
अपने आसपास कुछ भी 
घटित होने से 
किसी के जीने-मरने 
हँसने या रोने से 
न ही हमें 
ये जानने की है इच्छा कि
प्रकृति की सुंदरता का 
वध करके कैसे रोज
उग रहे हैं कंक्रीट के
नए-नए जंगल 
और भला कैसे 
प्राकृतिक संसाधनों का
गला घोंट कर 
उगाई जा रही है
विनाश की लहलहाती फसल
हमें नहीं पड़ता फर्क कि
प्रगति की आग का धुआँ
प्रदूषण का भेष धर
फूँके जा रहा है 
मानव सभ्यता के कलेजे को 
हम वास्तव में नहीं हैं
बिलकुल भी चिंतित
ऐसी-वैसी फालतू की
किसी भी बात पर 
क्योंकि हमें भली-भांति 
भान है इस तथ्य का कि
स्मार्ट फोन की संगत में
दरअसल हमारी तरह 
अब हर आदमी
स्मार्ट हो गया है।
लेखक - सुमित प्रताप सिंह

रविवार, 2 दिसंबर 2018

नन्हे कदम


नन्हे कदम पड़ें जो घर में
खुशहाली आ जाती है
रौनक सी घर में रहती है
नव ऊर्जा इसमें समाती है

बालक का रोना-धोना भी
मन-मस्तिष्क को सुख देता है
छोटे-मोटे कष्टों को तो
ये सुख यूँ ही हर लेता है
हृदय में हिलोरें उठती हैं
खुशी से फूलती छाती है

बेफिक्री कर जाती है कट्टी
जिम्मेदारी गले आ मिलती है
भावी जीवन की योजनाओं में  
तन-मन की चक्की पिलती है
स्वप्न देख उन्हें सच करने को
मन की भावनाएं इठलाती हैं
लेखक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली

शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

चिरपोटन चाचा के नाम चिट्ठी



     बचपन, बोले तो जीवन का मस्तमौला, बेफिक्र और शरारत से भरा समय। सो उसी बचपन का आनंद लेते हुए मैं छठी कक्षा में पढ़ रहा था। बचपन ने शरारत करने को कहा तो कागज लेकर बैठ गया चिट्ठी लिखने को। पहली रचना के तौर पर मैंने चिट्ठी में छठी के कोर्स की एक कविता की पैरोडी लिखी, जिसमें अपने गाँव के ठाकुरों के टोले, जिसे ठकुराइस कहा जाता है, को लपेट लिया था। चिट्ठी को संबोधित किया था श्री चिरपोटन सिंह को।
हमारे गाँव के एक चाचा को हम सब चिरपोटन चाचा कहकर चिढ़ाते थे। गाँव में हर किसी के तीन नाम रखे जाते हैं। पहला नाम जो घर में बड़े-बूढ़े प्यार से रखते हैं, दूसरा नाम जो बच्चे को स्कूल में दाखिला करवाने के बाद मास्साब द्वारा रजिस्टर में दर्ज किया जाता है और तीसरा नाम गाँववालों द्वारा खिल्ली उड़ाने के लिए ससम्मान रखा जाता है। सो सबकी तरह चिरपोटन चाचा का नाम भी ससम्मान उन्हें भेंट किया गया, जिसे सुनते ही उनका खून खौलने लगता था और बाकी लोगों की बत्तीसी दीखने लगती थी।
बहरहाल डाकिया गाँव में हर जाति के टोले में मेरे द्वारा भेजे गई चिट्ठी को लेकर घूम आया लेकिन चिरपोटन सिंह न मिले। आखिरकार वो ठकुराइस में आया और डरते-डरते पूछा, "भैया वैसे तो ठाकुरों के ऐसे नाम हमने कभी सुने नहीं हैं। पर आपको अगर पता हो कि ये चिरपोटन सिंह कौन हैं तो उन्हें ये चिट्ठी दे दूँ।" ठकुराइस के बाहर बैठे सब लोग हँसने लगे और उन्होंने पोस्टमैन से चिट्ठी लेकर उसे चिरपोटन सिंह के हवाले करने को कहकर उसे रवाना कर दिया। बाद में सबने मेरे द्वारा लिखी गयी कविता की पैरोडी को पढ़कर खूब आनंद लिया और चिरपोटन चाचा के मिलने पर चिट्ठी को उनके हवाले कर दिया।
कुछ दिन चिरपोटन चाचा का फोन आया। फोन पर मेरा हालचाल पूछने के बाद वो बोले, "लला तुमने कविता तो बढ़िया लिखी हती। अब जब अगली बार गाँव अइयो तो तुम्हें जाको अच्छो-खासो इनाम दओ जइये।" मुझे मालूम था कि क्या ईनाम मिलेगा सो उस साल मैंने गाँव जाना ही कैंसिल कर दिया।
 लेखक -सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली



मंगलवार, 28 अगस्त 2018

व्यंग्यात्मक तेवर झलकाती सहिष्णुता की खोज


    कानून व्यवस्था से सीधा जुड़ा कोई व्यक्ति जब लेखन में उतरता है और वह भी व्यंग्य लेखन में तो उसकी रचनाओं पर कुछ कहने लिखने से पहले इस बात की तारीफ तो अनिवार्य हो जाती है कि वह लिखने में सन्नद्ध हुआ। यानि उसका अपना पक्ष है और वह इसे खुलकर अभिव्यक्त करना चाहता है। सुमित प्रताप सिंह के व्यंग्य संग्रह 'सहिष्णुता की खोज' इस मायने में ध्यान आकर्षित करती है कि क्या राजनीतिक चालों-कुचालों से प्रेरित व्यंग्य प्रवृतियों पर कोई सार्थक बहस की गुंजाइश संभव है जो दो धुर विरोधी विचार धाराओं की पोषक संरक्षक अवधारणा का महज मायाजाल है और अपने-अपने पक्ष में तर्क और कुतर्कों का अंबार खड़ा करता है। इस संग्रह के भी कुछ लेख इसी एकांगिता या एक पक्षीय दृष्टिकोण का शिकार हुए हैं। लेकिन यह व्यंग्य की ताकत और असीम ऊर्जा है कि व्यंग्यकार विचलन के कुछेक क्षणों के बावजूद अपने व्यापक वैचारिक उद्देलन का साथ नहीं छोड़ता और जल्द ही अपनी पुख्ता जमीन पर काबिज होता है।
इस पुस्तक में 'सहिष्णुता की खोज', 'एक पत्र आमिर खान के नाम',  'काश! हम भी सम्मान लौटा पाते' जैसे लेख थोड़ी असुविधा पैदा करते हैं। लेकिन साथ ही 'विकास गया तेल लेने' 'अगले जन्म मोहे ठुल्ला ही कीजो',  'अस्वच्छ मन बनाम स्वच्छता अभियान'  'हम पापी पुलिस वाले' जैसे सम्यक दृष्टिकोण से जनतंत्र की सच्ची अपेक्षाओं को संवेदनात्मक लय से विश्लेषित करते हुए बड़ी हद तक आश्वस्त करते हैं।
सुमित इस संग्रह के कुछ लेखों में कल्पित पात्रों जिले-नफे की समाज शैली का अत्यंत रोचक इस्तेमाल करते हैं  जहाँ चयनित विषयों को परत दर परत खोलते हुए प्रभावोत्पादक परिणाम तक ले जाते हैं।  'सच्ची श्रद्धांजलि', 'सुनो हे जनप्रतिनिधि', 'एनकाउंटर' लेख इसके बेहतर उदाहरण हैं। ऐसा नहीं है कि संग्रह के लेखक अपनी पेशेवर प्रवृत्ति के कायल ही रहे हों, लेकिन इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पेशे का व्यक्तित्व पर स्वाभाविक प्रभाव पड़ता है और एक हद तक लेखन का उससे पूरी तरह मुक्त हो पाना कठिन होता है। प्रत्येक समस्या या विषयों को कानूनी पहलू या तथाकथित स्वीकृति की यंत्रवत दुहाई न देकर उसे व्यापक नैतिक दृष्टिकोण से विश्लेषित करके अनछुए पहलुओं को उद्घाटित किया जा सकता है जहाँ कहीं भी सुमित इस एकांगिता व सीमितता से मुक्त हुए हैं और वे कुछेक विचारणाओं को छोड़कर अधिकांशतः इससे मुक्ति में सफल भी हुए हैं और वहीं वेअपने दृष्टिकोण से अपेक्षित व्यंग्यात्मक तेवर झलकाने में सफल भी हुए हैं।
पुस्तक : सहिष्णुता की 
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
प्रकाशक : सी. पी. हाउस, दिल्ली - 110081
मूल्य : 160/- 
पृष्ठ : 119
समीक्षक : श्री राजेन्द्र सहगल, दिल्ली

शनिवार, 11 अगस्त 2018

व्यंग्य : मौजमस्ती दर्शन


    प्राचीन काल में एक ऋषि चावार्क हुए। उन्होंने चावार्क दर्शन में कहा है ‘यदा जीवेत सुखं जीवेत, ऋण कृत्वा, घृतं पीवेत’। आधुनिक काल में हमें भी उनकी विचारधारा को फलित करनेवाले एक ऋषि की प्राप्त हुई है। ये ऋषि राजनीतिज्ञ भी हैं और देश के मुख्य प्रदेश की सत्ता संभालते हुए अपनी हर नाकामी के लिए दूसरों को दोषी सिद्ध करने खेल में महारत हासिल कर चुके हैं। 
जैसे कि हर विभाग में दो प्रकार के जीव होते हैं। इनमें पहले प्रकार के जीव विभागीय कार्य को बड़े परिश्रम से करते हुए अपने काम से काम रखने के आदी होते हैं, वहीं दूसरे प्रकार के जीव कुछ भी करने के बजाय इधर-उधर उछल-कूद मचाते हुए बड़े अधिकारियों की तुलाई और उनके कान फूँककर ही अपना कार्यालीय समय व्यतीत करते हैं। अब न जाने विभाग के ये उछल-कूद मचाऊ कर्मचारी इन राजनीतिक ऋषि से प्रभावित हैं या फिर ऋषि महाराज स्वयं इन कर्मचारियों से प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं।
ऋषि चावार्क सुविधा वादी विचारों से प्रेरणा लेकर कलियुग में इन्होंने 'मौजमस्ती दर्शन' का शुभारंभ किया है। वैसे तो आधुनिक पीढ़ी पर अक्सर ये इल्जाम लगाया जाता है कि वो अपनी प्राचीन परंपराओं से कटती जा रही है, लेकिन इन्होंने प्राचीन परंपरा का मान रखते हुए और उसको मॉडिफाई कर 'मौजमस्ती दर्शन' का निर्माण कर डाला। हो सकता है कि आनेवाले समय ये अपने इस दर्शन का थीम सॉन्ग 'मस्तराम मस्ती में, आग लगे बस्ती में' को ही चुन लें।
बहरहाल ऋषि महाराज सत्ता का सदुपयोग करते हुए मौजमस्ती दर्शन को चरितार्थ करते हुए  हाल-फिलहाल में हजारों की मदिरा डकार चुके हैं। बेशक चाहे इनके सत्ता क्षेत्र में बच्चियाँ भूख से बिलबिला कर प्राण दे दें पर इनके द्वारा निर्मित दर्शन पर आँच नहीं आनी चाहिए।
बीते दिनों लाइव वीडियो के द्वारा संसद की सुरक्षा व्यवस्था को दाँव पर लगानेवाले मदिरापुरुष उनके इस 'मौजमस्ती दर्शन' पर मोहित हो श्रद्धा से अपना मस्तक झुकाए खड़े हुए हैं। वो मन ही मन प्रसन्न हो 'मौजमस्ती दर्शन' को धन्यवाद देते हुए इस बात से संतुष्ट हैं कि इसके बहाने चाहे देर से ही सही पर आखिरकार उनका मार्गदर्शन करने के लिए उन्हें एक जबरदस्त गुरु की प्राप्ति तो हुई।
लेखक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली
कार्टून गूगल से साभार

सोमवार, 16 जुलाई 2018

कविता - कविता का स्वामित्व

 
ये कविता है मेरी भगवान कसम
पर तू कहता है तेरी भगवान कसम
तो सुन ये कविता है केवल उसकी
जिसके ज्यादा चेरा-चेरी भगवान कसम 
ये कविता है मेरी...

तूने कच्चा माल बनाया
मैंने उसे मस्तिष्क में पकाया
और गढ़ा अपने तरीके से
फिर उसको मंच-मंच घुमाया
कविता के मंच पे चलती है
इतनी तो हेराफेरी भगवान कसम 
ये कविता है मेरी...

कविताबाजी ही अपना धंधा है
माना इसमें होता थोड़ा पंगा है
तुझको अपना कह सुना दिया
भला इसमें क्या गोरखधंधा है
बस इतने में ही स्वर्ग सिधारी
दादी-नानी तेरी भगवान कसम 
ये कविता है मेरी...

चल गलती हुई तो फौरी सुन
मेरी भीमकाय सी सॉरी सुन
फिर भी नहीं मानता तो जा
जाके माँ शारदे की लोरी सुन 
कविता के मंच पे चलने की 
नहीं औकात तेरी भगवान कसम 
ये कविता है मेरी...

बुधवार, 4 जुलाई 2018

हास्य व्यंग्य - भैंसिया संग सेल्फ़ी



- भाई नफे! 
- हाँ बोल भाई जिले!
 - क्या बात है बड़ा तरोताजा सा दिख रहा है?
- अरे भाई गाँव की सैर करके आ रहा हूँ इसलिए तरोताजा दिख रहा हूँ।
- अच्छा पर यूँ अचानक गाँव की सैर की भला कैसे सूझ गई?
- बस भाई मन किया और गाँव की ओर चल पड़ा।
अच्छा तो फिर ये बता कि गाँव के भोले-भाले लोगों क्या हाल हैं
- अरे भाई गाँव के लोग अब भोले-भाले से भाले बन चुके हैं।
मैं कुछ समझा नहीं जरा खुलके बता।
- भाई कभी गाँव के लोग भोले-भाले थे। एक दिन उन्होंने भोले शब्द को चबाकर गाँव की सीमा के बाहर थूक दिया। अब वे सिर्फ भाले हैं।
अच्छा ऐसी बात है क्या
- हाँ भाई बिल्कुल ऐसी ही बात है।
- पर सारे गाँव वाले तो ऐसे नहीं होंगे मैं कुछ न कुछ तो अभी भी अच्छे ही होंगे।
हाँ पर उनकी संख्या बहुत ही कम रह गई है। 
-    मतलब कि शहर की बीमारी वहाँ भी अपने पाँव पसार चुकी है।
- हाँ भाई शायद शहर ने अपनी बीमारी गाँव को भेंट कर दी है।
मेरा मतलब ये था कि अब गाँव भी मतलबी हो गया है।
- हाँ भाई और उसने मतलबी होने में शहर को भी कई कोस पीछे छोड़ दिया है।
- मतलब कि गाँव को गाँव कहने लायक कुछ भी बचा नहीं।
- क्यों नहीं बचा है। अभी भी गाँव में शुद्ध हवा है, हरियाली है और अभी तक वहाँ की फ़िज़ा मतवाली है। 
- मतलब कि गाँववालों को छोड़कर वहाँ की हर चीज अभी भी भोली-भाली है।
- हाँ भाई बिलकुल भोली-भाली है।
- अच्छा तू ये बता कि तूने गाँव में बैलगाड़ी की सवारी की या नहीं?
- भाई अब गाँव-गाँव पक्की सड़कें बन गयीं हैं और वहाँ वाहन फर्राटे मारते हुए चलते हैं। और इस तेज रफ़्तार के समय में अब भला कौन बैलगाड़ी में चलना चाहता है। और वैसे भी अब बैल गाड़ियों की नहीं बल्कि लोगों की खाने की थालियों की शोभा बढ़ाने लगे हैं।
- भाई तूने बिलकुल सही कहा। अच्छा ये बता कि फिर तूने गाँव में क्या-क्या किया?
- शहर की चिल्ल-पौं से दूर गाँव के शांत वातावरण में मैंने खुली हवा में खुलकर सांस ली। वहाँ के खेत-खलियानों और बाग-बगीचों में चहलकदमी की। ऐसा करने से मेरे अंग-अंग में उमंग भर गयी, मस्तिष्क तरोताजा हो गयादिल मस्ती में झूमने लगा और फेफड़े शुद्ध हो मुस्कुराने लगे। और इसी मस्ती में झूमते हुए मेरा दिल सेल्फ़ियाना हो गया और मैंने एक गोल-मटोल, काली-कलूटी भैंसिया संग सेल्फ़ी ले डाली।
- भैंसिया तो तेरे संग सेल्फ़ी में कैद होकर काफी खुश हो गयी होगी?
- खुश नहीं बहुत नाराज हो गयी।
- भला नाराज क्यों हो गयी?
गाँव में भैंसिया के पास जाकर जब मैंने गुजारिश की, "भैंसिया रानी अगर तुम्हायी इजाजत होय तो तुम्हाये संग एक सेल्फ़ी ले लयी जायै?" 
- तो फिर भैंसिया का क्या जवाब मिला?
- भैंसिया तुनक के बोली, "हमें तुम शहर वालन संग कोई सेल्फ़ी-वेल्फ़ी नहीं खिंचवानी।"
- फिर तूने क्या किया?
- मैंने उससे पूछा, "ऐसी का नाराजगी है?"
- फिर वो क्या बोली?
- भैंसिया गुस्से में बोली, "तुम्हाये जैसे एक आये हते। एक क्रीम देकै बोले इधर क्रीम लगाओ और उधर गैया जित्ती भक्क गोरी निकर अइयौ। बा क्रीम शरीर पै घिस-घिसकै दम निकर गओ पर कछु परिणाम नहीं निकरो।" 
- हा हा हा भैंसिया का गुस्सा जायज था। फिर तूने उसकी बात का क्या उत्तर दिया?
- मैंने निरुत्तरावस्था में भैंसिया के गुस्से का आदर करते हुए उसके साथ इतनी दूर से सेल्फ़ी ली कि उसके सींग मेरा तिया-पाँचा न कर पायें और उसके बाद मैं उधर से जल्दी से खिसक लिया।
- बिलकुल ठीक किया भाई। अब अगली बार गाँव जाना हो तो मुझे ले जाना मत भूलना। 
- क्यों क्या वहाँ गाँव के भाले लोगों से घायल होना है?
- अरे नहीं भाई ! मैं तो तेरी तरह शहर की चिल्ल-पौं से दूर गाँव के शांत वातावरण में खुली हवा में खुलकर साँस लेना चाहता हूँ। वहाँ के खेत-खलियानों और बाग-बगीचों में चहलकदमी करना चाहता हूँ ताकि मेरे भी अंग-अंग में उमंग भर उठे, मस्तिष्क तरोताजा हो जाएदिल मस्ती में झूमने लगे और फेफड़े शुद्ध हो मुस्कुराने लगें। और हाँ इन सबके साथ-साथ भैंसिया रानी के संग एक अदद सेल्फ़ी भी लेना चाहता हूँ।
- और किसी के लिए न सही पर भैंसिया रानी संग सेल्फ़ी खिंचवाने के लिए तुझे गाँव जरूर ले जाना पड़ेगा।
- भाई वादा।
- हाँ भाई पक्का वादा।

लेखक - सुमित प्रताप सिंहनई दिल्ली

बुधवार, 13 जून 2018

हल्दीराम कथा


     एक गरीब आदमी था। वह हल्दी बेचकर बड़ी मुश्किल से अपना और अपने परिवार का गुजारा चलाता था। एक रात उसके सपने में आलू से सोना बनाने वाले संत आये। उन्होंने उस पर तरस खाकर उसे उपाय सुझाया, कि जब भी वह किसी ग्राहक को हल्दी बेचे तो एक हाथ से ग्राहक को हल्दी दे और ठीक उसी समय दूसरे हाथ को आसमान की ओर करके दुआ माँगते हुए अल्लाह या जीसस का नाम ले। पर वह आदमी सांप्रदायिक हिन्दू निकला। उसने एक हाथ से हल्दी बेची और दूसरे हाथ को आसमान की ओर करके दुआ माँगते हुए राम का नाम स्मरण किया। ऐसा करते हुए उसकी दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति हुई। फिर एक दिन उसने हल्दी और राम का कॉम्बिनेशन बनाकर हल्दीराम नाम से खाने-पीने की एक दुकान खोली, जहाँ लोग चौगुनी कीमत चुका कर अपनी जीभ का स्वाद मिटाने के लिए आने लगे। अब हल्दीराम नाम से दुकानों की एक बहुत बड़ी श्रृंखला बन चुकी है। वह आदमी रात को सोते हुए कामना करता रहता है, कि वो संत एक बार फिर उसके सपनों में आ जायें, ताकि वह उनको धन्यवाद दे सके पर उन संत को राम के नाम से इतनी तगड़ी एलर्जी है, कि वो राम का नाम सुनते ही सौ कोस दूर उछलकर गुलाटी मारते हुए भाग लेते हैं।

शनिवार, 26 मई 2018

कविता - बोर्ड परीक्षा का खौफ


बोर्ड परीक्षा थी सर पर 
और हृदय काँपता रहता था 
अब क्या होगा 
तब क्या होगा 
यही जपता रहता था 
मन में भरकर हर्ष 
खेले पूरे वर्ष 
अब कुछ दिन में 
क्या कर पायेंगे 
यदि हुआ कुछ गड़बड़ घोटाला
हम तो लज्जा से नहायेंगे 
खौफनाक था बोर्ड का साया 
डरता था मन और कांपती काया 
कक्षा दस में हाल हुआ जो 
याद अचानक ही आया 
विज्ञान लेने की इच्छा थी 
पर कला विषय ही मिल पाया 
पुस्तक में रहतीं आँखें चिपकीं 
फ्यूचर लगने लगा था रिस्की 
विषयों को दिल से रटना था 
अच्छे काॅलेज का सपना था 
होना चाहते थे सफल 
सो सोते हुए भी करते थे प्रश्न हल 
मेहनत थी अपनी भरपूर 
बोर्ड परीक्षा अब नहीं थी दूर 
हर पेपर जाने लगा अच्छा 
मन में था संतोष सच्चा 
आया जब परिणाम 
छलका खुशी का जाम 
क्लास में किया था टाॅप 
भला हो बोर्ड परीक्षा का खौफ।

लेखक - सुमित प्रताप सिंह

बुधवार, 16 मई 2018

पाठकों के लिए नायाब तोहफा है ये दिल सेल्फ़ियाना


   व्यंग्य का सामर्थ्य असीमित होता है। व्यंग्य के माध्यम से विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, नकारात्मकता, रुग्णता पर किया प्रहार एक तिलमिलाहट की रचना करता है।  वस्तुतः विकार के विरुद्ध आवाज उठाना पर एक विशिष्ट शैली व सीधे  बल्कि घुमा-फिराकर वही व्यंग्य के नाम से जानी जाती है। या यूँ कहें कि जूते को मखमल में लपेटकर मारने की कला का नाम है व्यंग्य। पर व्यंग का सृजन कोई सरल प्रक्रिया नहीं है। गहन चिंतन सामाजिक सर्वेक्षण विसंगति व अस्वस्थता  की खोज, फिर विषय वस्तु की तीक्ष्णता को यथावत रखते हुए उसे चाशनी में पागकर  प्रवाहमयता व संप्रेषणीयता के साथ पाठक के समक्ष परोसना कोई सुगम व आसान कार्य नहीं है। वस्तुतः व्यंग्य की रचना  श्रमसाध्यता, बुद्धिसाध्यता व धैर्यसाध्यता के उपरांत ही संभव होती है। इसीलिए व्यंग्यकार बन पाना कठिन ही होता है।

 इस समय जो युवा व्यंगकार समग्र ऊर्जस्विता व ओजस्विता के साथ व्यंग्य सृजन करके तीव्रता के साथ सफलता के सोपानों को नाप रहा है वह है सुमित प्रताप सिंह। जो कि 'ये दिल सेल्फ़ियाना' कृति के माध्यम से अपना चौथा (कुल छह पुस्तकें) व्यंग्य संग्रह लेकर पाठकों के समक्ष रूबरू हुए हैं।  एक से बढ़कर एक व्यंग्य, अनूठी मौलिकता, विषय वस्तु की उत्कृष्टता, शब्दों का शानदार मायाजाल, प्रस्तुतीकरण की विशेषता, अन्वेषणात्मक शैली, गुदगुदाते वाक्यकथ्य का बखूबी प्राकव्य समस्त असाधारण व अनुपम गुणधर्म हमें इस कृति के समस्त व्यंग्यों में दृष्टिगोचर होते हैं। 

गुटखे की पीक के माध्यम से यत्र-तत्र-सर्वत्र कलाकृतियों के निर्माता पिकासो को ढूंढकर पाठकों के समक्ष अत्यंत निपुणता से प्रस्तुत करके सुमित हम और हमारे 'स्वच्छता अभियान' की दशा/दुर्दशा का सहज ही मूल्यांकन करने में समर्थ दिखाई देते हैं। वे व्यंग बाण चलाकर लक्ष्य भेदने में सफल होते हैं। वे लिखते हैं - "देशी विदेशी पर्यटक तो इन कलाकृतियों को देखकर इन्हें निर्मित करनेवाले गुटखेबाज कलासेवियों की कलाकारी के आगे नतमस्तक हो उठते हैं।"  चाहे 'ढीले लंगोट वाले बाबा' की बात हो या फिर 'मुल्लाजी और शुभचिंतक लल्लाजी' का वृतांत व्यंग्यकार हर पिच पर सेंचुरी बनाते हुए दृष्टिगत होता है। 

 बेवफा सोनम गुप्ता के नाम पत्र लिखते समय तो व्यंग्यकार भाषा विज्ञानी ही नहीं, बल्कि भाषा अन्वेषक व शब्द विशेषज्ञ प्रतीत होता है जब वह इस पत्र का आरंभ ‘सादर दिल जलस्ते’ से संबोधित करते हुए करता है। 'अब तेरा क्या होगा कालिया' व ‘'नौटंकी उत्सव' में सुमित एक अलग ही प्रकार का प्रताप दिखाते हुए सुशोभित होते हैं।  चाहे कथ्य की बात हो, शिल्प की या फिर प्रस्तुति की वे नायाब हैं, बहुत खूब हैं, विशिष्ट हैं और उत्कृष्ट हैं। हँसने-हँसाने के मध्य अपना संदेश देने में जो व्यंग्यकार कदापि ना चूके वह चोखा है और वही अनोखा है। वे लिखते हैं -  "जिन संतानों में अपने माँ-बाप को सूखी रोटी देने में भी प्राण निकलते थे, वो ही श्राद्धों में कौओं को  पूर्वजों के नाम पर खीर- पूरी गर्वित होकर खिलाते हुए मिल जाते हैं।"
 'अल्लाह हू अकबर' में तो शुरु से ही उन्होंने छक्का जड़ दिया है। वे लिखते हैं - "अल्लाहू अकबर! कोई चीखा। इस चीख के साथ ही धड़ाधड़ बम फूटने आरंभ हो गए। बम धमाकों के बाद सुनाई दी जानेवाली चीत्कारों से हृदय द्रवित होने लगा।" यह पढ़कर बाकी व्यंग्य पढ़ने की जरूरत ही नहीं रह जाती है। फर्क, मच्छर तंत्र व मेरी खर्राटों भरी रेलयात्रा में भी रचनाकार प्रांजल भाषा, लय, प्रवाह, अनुशासन, तीखेपन व गतिशीलता के साथ आगे बढ़ता हुआ नज़र आता है। पाठकों को अपने से जोड़ लेने व वशीभूत कर लेने की क्षमता व्यंग्यकार सुमित प्रताप सिंह में निसंदेह विद्यमान है। 

यथार्थ तो यह है कि सफल व्यंगकार वही होता है, जो समाज और उसके हालातों को गहनता, सूक्ष्मता, संजीदगी, परिपक्वता व पैनेपन के साथ न केवल देखता है, बल्कि उन्हें समझ-बूझकर विश्लेषित भी करता है। जो व्यंग्यकार विसंगतियों की जाँच-पड़ताल जितनी सूक्ष्मता से कर लेता है, वह उतना ही अधिक समर्थ व्यंग्यकार माना जाता है।  सुमित में ऐसे ही लक्षण स्पष्टतः  नज़र आते हैं। उनके पास अभिधा, व्यंजना, लक्षणा शक्तियों का सामर्थ है, तो 'पिन पॉइंट' करने का मादा भी है। वे कहने के पूर्व स्वयं भी बहुत कुछ सोचते-समझते हैं और पाठकों को भी बहुत कुछ सोचने-समझने को विवश कर देते हैं। कहीं वे पुलिस को रगड़ते हैं, तो कहीं दुपट्टे के सिसकने पर उसकी खबर लेते हैं। पिता दिवस की कलई खोलते हुए वे जो लिखते हैं वो सीधा कलेजे में बिंध जाता है। भले ही बिंधे, घाव करे या पीड़ा दे पर यह तो वही है जो सुमित प्रताप सिंह 'माफ कीजिएगा पिताजी' में लिखते हैं।  वे लिखते हैं - "कोई वृद्धाश्रम में जाकर अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ अमूल्य क्षण निकालकर अपने पिता के साथ पितृ दिवस मनाकर अपने पुत्र होने के कर्तव्य को निभायेगा, तो कोई भला मानव आज घर के कोने में अपने जीवन के अंतिम दिन गुज़ार रहे पिता को एक दिन ताजा और स्वादिष्ट भोजन खिलाकर अपने अच्छे बेटे होने का सबूत देते हुए मिल जाएगा।"  

उनके जन्मदिवस पर, चाँद सीढ़ी का खेलबाबा के चरण, भेड़िया आया व बलि जैसे व्यंजनों का  खरापन व चोखापन पाठक को तिलमिला देता है। पर है  तो सत्य व प्रमाणित यथार्थ। 'बलि' व्यंग्य का समापन अत्यंत मर्मस्पर्शी है - "राम समूह अपने माथे का पसीना पोंछते हुए भर्राए हुए स्वर में बोले - गांधी की बलि चढ़ा कर आया हूँ। वो भी एक नहीं सैकड़ों की, ताकि पेंशन का बाकी पैसा आराम से मिल जाए और हमारी बेटी दहेज की बलि न चढ़ सके।" साफगोई व सरलता के साथ हमारे समाज के नंगेपन को चित्रित करता है यह व्यंग्य अद्वितीय व असाधारण है। जहाँ 'साहित्यिक बगुले' में वे व्यावसायिकता पर करारी चोट करते हैं, तो वहीं 'दुशासन का लुंगीहरण' में वे एक अनूठा व उत्कृष्ट आयाम लिए हुए नज़र आते हैं।  श्रीकृष्ण दुशासन की पुकार सुनकर लुंगी की लंबाई बढ़ाने में लग जाते हैं। शायद नारी मुक्ति का यही परिणाम होगा, कि पुरुष को अपनी लुंगी को सुरक्षित रख पाना मुश्किल हो जाएगा। विषय वस्तु की असाधारणता व प्रस्तुति की कोमलता, माधुर्य व सरसता ने सभी व्यंग्यों को  रससिक्त बना दिया है।

 शीर्षक व्यंग्य 'ये दिल सेल्फ़ियाना' में वे सेल्फी लेने की लत / जुनून पर चोट करते हैं। इसे वे 'सेल्फ़ीसाइड' रोग का नाम देते हैं। सेल्फ़ी लेने में होने वाली दुर्घटनाओं की बात भी वे करते हैं।  इसकी तुलना वे सनक से करते हैं। 'लव फ़ॉर सेल्फ़ी' की खबर लेते व्यंग्यकार सुमित प्रताप सिंह वास्तव में छिद्रावलोकन करने का सामर्थ्य रखते हैं।  वे लिखते हैं - "जहाँ घराती और बाराती विभिन्न पकवानों का आनंद ले रहे होते हैंवहीं सेल्फ़िया सेल्फ़ी से अपनी भूख मिटा रहा होता है।"

यह यथार्थ है कि सुमित प्रताप सिंह का व्यंग्य लेखन धमाकेदार है।  वस्तुतः वे परिपक्व हैं, सिद्ध हैं, समर्थ हैं और सक्षम भी। उनके पास एक मौलिक नज़रिया है और प्रस्तुतीकरण का असाधारण सामर्थ्य है। उनकी शैली में एक विशिष्टता है और ताज़गी भी है। वे आभासी दुनिया, असंवेदनशीलता, निष्ठुरता, असामाजिकता व मूल्य पतन पर बेहतरीन कलम चला रहे हैं। हर व्यंग्य को रोचक बनाने का उनमें सामर्थ्य है।  मैं उनके प्रति अनंत शुभकामनाएं अर्पित करते हुए उनके सारस्वत यश की मंगलकामना करता हूँ। 

'सुमित' आजकल लिख रहे, विभिन्न व्यंग्य अभिराम।
हो प्रताप हरदम 'शरद', आये नहीं विराम।।

- प्रो. शरद नारायण खरे
विभागाध्यक्ष, इतिहास
शासकीय जे.एम.सी. महिला महाविद्यालय,
मंडला (म.प्र.)

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