सोमवार, 4 दिसंबर 2017

हास्य व्यंग्य : मेरी खर्राटों भरी रेलयात्रा


     ससुराल की सेवा और मेवा का सुख लेने के बाद मैं सपत्नीक अपने मायके के लिये रवाना हो लिया। कहीं जीजा जी दीदी संग रेलवे स्टेशन से वापस न लौट आयें इस डर से साले रेलवे स्टेशन तक हमें छोड़ने हमारे साथ ही आये। रेलवे स्टेशन पहुँचकर हम ये सोचते हुये भागे-भागे रेलवे प्लेटफार्म पर गये कि कहीं हमारी ट्रेन समय से पहले पहुँचकर हमारी प्रतीक्षा करने का दुःख न झेल रही हो, लेकिन ये हमारी एक बहुत ही हसीन भूल थी। हमारी ट्रेन पूरे ढाई घंटे लेट थी। बहरहाल हम सरकार के स्वच्छता मिशन को जीभ चिढ़ाते इटावा स्टेशन के प्रतीक्षालय में बेहाल हो अपनी ट्रेन की प्रतीक्षा में लगे रहे। हमारी ट्रेन लेट पर लेट होकर हमारे सब्र का इम्तिहान लिये जा रही थी। खैर रेलवे विभाग की कर्मठता  और सक्षमता के फलस्वरूप साढ़े पाँच घंटे की कड़ी परीक्षा लेने के बाद सुबह 3.45 बजे जाकर ऊँचाहार एक्सप्रेस, जिसका नामकरण परेशान होकर मैंने नीचाहार एक्सप्रेस कर दिया था, में चढ़ने का सौभाग्य मिल पाया। पहले तो डिब्बे के अटेंडेंट को ढूँढने में काफी परिश्रम करना पड़ा, आखिरकार टी.टी. के बताए हुए ठिकाने पर जाकर अटेंडेंट को झकझोर कर जगाया और उससे सीट पर बिछाने के लिए चादरें माँगी तथा जितना जल्दी हो सका सीट पर चादर बिछाकर सोने की कोशिश करने लगा। मैंने देखा कि थकान होने के कारण पत्नी सो चुकी थी और मैं पूरे दिन की थकान होने के बावजूद अपने बगलवाली सीट पर पसरे इंसान के जोरदार खर्राटों से बेहाल हो जागने को विवश होता हुआ गहरी नींद में डूबने के स्वप्न देख रहा था। मैंने उसके खर्राटे बंद करने के लिये उसका कंबल कई खींचा, ताकि वो गहरी नींद से बाहर आ अपने खर्राटों पर पूर्ण विराम लगाये, लेकिन मेरी इस आशा पर उसने खर्राटे मारते रहकर फुल स्टॉप लगा दिया। अब मैंने पानी की बोतल उसके ऊपर फेंकने का दुस्साहसी विचार किया, लेकिन उस विचार को कुछ सोचकर अमल में नहीं लाया और जोर-जोर से कंबल खींचने की प्रक्रिया ही जारी रखी। पर वो इंसान शायद कुम्भकर्ण की पीढ़ी से था, सो उसे कुछ भी असर न हुआ और उसके घनघोर खर्राटे लगातार चालू रहे। मैंने अनुभव किया कि वो शायद कोई बुज़ुर्ग आदमी है, जो अधिक थकान होने के कारण खर्राटे युक्त होकर सो रहा था। मैं दुःखी हो करवट बदलते हुए सोच रहा था कि जाने किस मनहूस घड़ी में दुगुना दाम चुकाकर उस कथित सुविधासंपन्न ऊँचाहार एक्सप्रेस का तत्काल टिकट लेने की महान भूल की थी। मैं लेटे-लेटे ट्विटर पर ट्वीट क्रिया करते हुये प्रार्थना करने लगा कि हे प्रभु इस खर्राटेवाले दैत्य को कुछ देर के लिए कुम्भकर्णी मुद्रा से निकाल बाहर करो ताकि निंद्रा मेरे नैनों में एंट्री मार सके। फिर अचानक मुझे याद आया कि प्रभु तो इस्तीफा दे चुके थे सो मैंने उनके उत्तराधिकारी का स्मरण करना आरंभ कर दिया। जाने वो प्रार्थना का प्रभाव था या फिर मेरे कंबल खींचने का फल जो उसके खर्राटे अचानक बंद हो गये। मैंने इस मौके का फायदा उठाया और झट से नींद के आगोश में खो गया। एक-दो घंटे की नींद  खींचने के बाद किसी बच्चे की आवाज से मेरी आँख खुल गई। आँख खुलते ही सामने की सीट पर खर्राटे लेकर नींद का सत्यानाश करनेवाले इंसान को देखने का सौभाग्य हासिल किया। ये एक महिला थी जो अपने बतोले बेटे के ढेर सारे जवाब देने में मस्त थी। मैं मन ही मन उसकी खर्राटा शक्ति को नमन करते हुये शुक्र मनाने लगा कि अच्छा हुआ जो रात को मैंने उस महिला के ऊपर बोतल फैंककर नहीं मारी वर्ना आई.पी.सी. की छेड़छाड़ की धारा 354 मुझसे गले मिल रही होती।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

कार्टून गूगल से साभार


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