सोमवार, 13 नवंबर 2017

कविता : दस रूपयों का आसरा


आज शाम को बाज़ार से 
मैं एक भुना मुर्गा लाया
उसमें स्वाद बढ़ाने को 
मैंने नमक-मिर्च लगाया
फिर छोटे-छोटे टुकड़ों में 
उसको मैंने तोड़ा
उसपर धीमे-धीमे 
नींबू एक निचोड़ा
फिर उसको फुरसत से
चबा-चबाके खाया
सच कहूँ तो मुर्गे का 
मैंने जमके लुफ्त उठाया
खाकर मुर्गा ली डकार
और होंठों पर जीभ को फेरा
तभी मेरे भीतर से
किसी ने मुझको टेरा
फिर उसने मुझको
जी भरके धिक्कारा
एक पल में पापी बन
घबराया मैं बेचारा
दूजे पल ही में
अंतर्मन मेरा जागा
और गली की दुकान में
गया मैं भागा-भागा
वहाँ से झट से खरीद लिया
दस रुपये का बाजरा
तीन सौ के मुक़ाबले
अब दस रुपयों का था आसरा
फिर मैं दौड़-भागके 
बगल के पार्क में आया
वहाँ बैठके नीचे मैंने
एक जगह बाजरा फैलाया
थोड़ी देर में उस जगह
गिलहरी-कबूतर आये
चुन-चुन खाया बाजरा उन्होंने
और खाकर वो हर्षाये
यूँ हुआ दूर अपराधबोध मेरा
जिसने अब तक था जकड़ा 
फिर मैं फुरसत में लगा सोचने
कल मुर्गा खाऊँ या बकरा?

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
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