सोमवार, 27 मार्च 2017

व्यंग्य : म्हारे गुटखेबाज किसी पिकासो से कम न हैं


     पने देश में कला की तो कोई कद्र ही नहीं है। आए दिन कोई न कोई ऐसा सरकारी फरमान जारी होता रहता है, जो कला का मानमर्दन करने को तत्पर रहता है। अब गुटखेबाज कलासेवी जीवों को ही ले लीजिए। कलासेवा की खातिर कड़ी और ज़हरीली चेतावनी का सन्देश पढ़ने के बावजूद भी अपने मुँह में नुकसानदायक ज़हरीला गुटखा गटकने वाले महान जीवों का त्याग भला वे लोग कहाँ समझेंगे, जिन्होंने कभी भी गुटखा छूने का साहस ही न किया हो। गुटखा को मुँह में धरकर पिच-पिच की ध्वनि का घोष करते हुए दफ्तर से लेकर पुरातत्व के महत्त्व की इमारत तक को पिचकारी मारकर भाँति-भाँति प्रकार की कलाकृतियों का निर्माण करनेवाले कलाकारों के परिश्रम का कुछ तो ध्यान रखना चाहिए। सरकारी-गैरसरकारी दफ्तरों की सीढियाँ, दरवाजे व शौचालय की सुंदरता इन कलासेवकों के दम पर ही टिकी हुई है। इनके द्वारा ऐतिहासिक इमारतों पर गुटखा खाकर मुँह में गंभीर गुटखा मंथन के उपरांत उपजे अनोखे रंग के द्रव्य द्वारा ऐसी अनोखी कलाकृतियों  का निर्माण किया जाता है, कि जिन्हें देखकर बड़े-बड़े चित्रकार भी दाँतों तले उँगलियाँ दबाने को विवश हो जाते हैं। देशी-विदेशी पर्यटक तो इन कलाकृतियों को देखकर इन्हें निर्मित करनेवाले गुटखेबाज कलासेवियों की कलाकारी के आगे नतमस्तक हो उठते हैं। कोई माने या न माने लेकिन घूमकर वापस लौटने पर पर्यटकों के मन-मस्तिष्क पर ऐतिहासिक इमारतों अथवा स्थलों की छवि बेशक न रहे पर गुटखेबाज कलासेवियों द्वारा प्रयत्नपूर्वक निर्मित की गईं अद्भुत कलाकृतियों की मनमोहक छवि गहराई से पैठ बना लेती हैं। यदि इन कलासेवियों की कला की प्रशंसा एक वाक्य में करें तो ‘म्हारे गुटखेबाज चित्रकारी में किसी पिकासो से कम न हैं’। गुटखेबाज कलासेवियों द्वारा विकसित की गई इस अनोखी भित्ति चित्रकला को संरक्षित करने की ओर हमें गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। यदि सरकार इस पुनीत कार्य को करने में उदासीनता दिखाती है तो स्वयंसेवी संगठनों एवं भले लोगों को मदद के लिए आगे बढ़कर आना चाहिए। वरना ऐसी अद्भुत भित्ति चित्रकला के विलुप्त होने की पूरी-पूरी संभावना है। इसके विलुप्त होने से गुटखेबाज कलासेवियों द्वारा सालों-साल से निरंतर किया जा रहा कठोर परिश्रम माटी में मिल जाएगा। इसलिए गुटखा, पान और तंबाकू सेवन पर प्रतिबंधरुपी कटार चलाकर इस कला को नष्ट करने का प्रयास बहुत ही निंदनीय है और हम सभी कलाप्रेमी एक मत से इस फैसले की कड़ी से कड़ी निंदा करते हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

शनिवार, 18 मार्च 2017

व्यंग्य : इन दिनों


    न दिनों जाने क्या हो रहा है। मतलब कि इन दिनों कुछ अजीब सा ही हो रहा है। इन दिनों देश की सबसे ईमानदारी पार्टी को उसकी ईमानदारी के बदले में जनता ने फिर से ठेंगा दिखा दिया। जनता ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि उस पार्टी ने देश के लिए कितना कुछ किया था। देश के स्वतंत्र होने के बाद से ही उसके द्वारा कर्मठता से किए गए कार्यों से पूरे विश्व में देश की चर्चा हुई। उन विशेष कार्यों पर नज़र दौड़ाई जाए तो इसके द्वारा अल्पसंख्यकों पर इतनी कृपा की गयी कि वो वोट बैंक बनने से ज्यादा आगे बढ़ ही नहीं पाए। इस वोट बैंक के सहारे उसने खूब मजे काटे पर इन दिनों इस परंपरागत वोट बैंक ने भी इसका बैंड बजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। देश के संसाधनों का सदुपयोग करते हुए घोटालों की जमकर खेती की गयी और फसल से जो आय हुई उसे स्विस बैंक के चरणों में अर्पित कर दिया गया। देश के विकास का नारा देते-देते अपने परिवार की वंशबेल में पानी देकर पोषित किया जाता रहा। पर वो कहते हैं न कि किसी भी बात की होती है तो हद पार हुई और उसी वंशबेल से एक अनुपयोगी पौधा उपज गया जिसने अपने पुरखों के परिश्रम का राम नाम सत्य कर डाला। उस पौधे की संगत में आकर कुछ नए पौधे, जो जोश में आकर खुद को वटवृक्ष समझकर उछल रहे थे, वो भी अपना तिया-पाँचा करवा बैठे। अब क्या करें इन दिनों देश में ऐसी आंधी चल रही है जो देश के लिए अनुपयोगी पौधों व वृक्षों को जड़ से हिलाकर अपनी अंतिम साँसे गिनते हुए अपना शेष जीवन बिताने को विवश किए हुए है। इस आँधी ने सिर्फ राजनीति की वंशबेल को ही बेजान नहीं किया, बल्कि इसके परमप्रिय समर्थकों, जिन्हें लोग भूलवश चमचा समझ लेते हैं, का भविष्य भी दाँव पर लगा दिया। बीते दिनों इन परमप्रिय समर्थकों ने असहिष्णुता राग गाते हुए पुरस्कार वापसी अभियान चलाया था ताकि इस माध्यम द्वारा ही उस आँधी को रोका जा सके और उनके पापी पेट पर लात न पड़े। पर आँधी इतनी बेरहम निकली कि उसकी रफ़्तार के आगे उन परमप्रिय समर्थकों की भी कुछ न चली। फलस्वरूप इन दिनों परमप्रिय समर्थक अपने भविष्य को अंधकारमय पाते हुए सुबकने को विवश हैं। ऐसे गर्म माहौल में भी एक ये सर्दी है जो जाने का नाम नहीं ले रही। लगता है कि सर्दी ने भी ये सोच रखा है कि ये इन दिनों आँधी के मारे उन बेचारों को सर्द-गर्म की सौगात देकर उनके अंजर-पंजर ढीले करते हुए ही रवाना होगी।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


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