मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

लघुकथा : असली वैलेंटाइन

      

      रोहित को खिड़की में दूरबीन से दूसरी बिल्डिंग में झाँकते हुए देखकर जतिन ने पूछा, “अबे साले किसके बाथरूम की जासूसी हो रही है?”

“साले इतना भी कमीना मत समझ। मैं तो अखिल के घर पर निगाह टिकाए हुए हूँ।” रोहित दूरबीन में ही खोया हुआ बोला।
“अखिल की जासूसी? अबे तुझे और कोई शिकार नहीं मिला जो उस शरीफ लड़के के पीछे पड़ गया।” जतिन ने नाराजगी जताई।
“भाई हर शरीफ के दिल में एक कमीना भी छिपा हुआ बैठा होता है।” रोहित ने बिना दूरबीन से संधिविच्छेद किए अपनी राय रखी।
जतिन के कुछ समझ में नहीं आया, “अबे ज्यादा कंफ्यूज मत कर, बात क्या है वो बता।”
“आज अखिल ने फूलवाले बुड्ढे से दो गुलाब खरीदे हैं।” रोहित कुटिल मुस्कान के साथ बोला।
जतिन ने हैरान हो कहा, “एक नहीं वो भी दो-दो गुलाब। मतलब कि लड़कियों से दूर भागने वाला लड़का आज वैलेंटाइन डे दो-दो लड़कियों के साथ मनायेगा!”
"यही तो पता करना है।" और रोहित फिर दूरबीन में खो गया, “अरे वाह! आज तो बंदे का ड्रेसिंग सेंस देखने लायक है। ये लो जी वैलेंटाइन डे मनाने के लिए बंदा अपने माँ-बाप के पैर छूकर आशीर्वाद भी ले रहा है। अरे ये क्या अखिल ने तो एक-एक करके दोनों गुलाब अपने मम्मी-डैडी को दे दिए।” रोहित हैरान हो अपना सिर खुजाने लगा।
“अच्छा तो ये बात है। मतलब कि अखिल के मम्मी-डैडी ही हैं उसके असली वैलेंटाइन।” जतिन ने मुस्कुराते हुए कहा।
लेखक - सुमित प्रताप सिंह

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