शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

...तो ये मुल्क़ बंट जाएगा


   न राजपूत किसी पंडित, जाट या गूजर को गाली देता है न पंडित, जाट अथवा गूजर किसी राजपूत को गाली देता है। न सवर्ण किसी दलित को गाली देता है और न दलित किसी सवर्ण को गाली देता है। परोक्ष और अपरोक्ष युद्ध में मुँह की खाने के बाद पड़ोसी दुश्मन देश ने अब सोशल मीडिया के माध्यम से भारत से युद्ध के लिए कमर कसी है और अपने कथित वीर सिपाहियों को हमारे देश के भाईचारे को खंडित करने के लिए सोशल मीडिया पर तैनात कर दिया है। ये कथित वीर सिपाही स्वयं को किसी न किसी जाति के नेता व हितेषी घोषित कर दूसरी जातियों के बारे में घृणित व अपमानजनक शब्द लिखकर हमारे आपसी सद्भाव को नष्ट करने की कोशिश में जी-जान से लगातार जुटे हुए हैं। कम पढ़े-लिखे व अल्पबुद्धि के लोग उनके प्रभाव में जल्दी आ जाते हैं और उनकी कठपुतली बनकर अपने जाति बंधुओं के बीच इस घृणा को फैलाने में माध्यम बनने का कार्य करते हैं। विभिन्न जातियों के देवताओं व महापुरुषों के साथ अभद्र व्यवहार करते हुए लेख व चित्र सोशल मीडिया पर डालकर जातियों को आपस में उलझाने की निरंतर साजिश रची जा रही है। इस साजिश के परिणामस्वरूप लोग एक-दूसरे के जानी दुश्मन तक बनते जा रहे हैं और ये लोग भावनाओं में अंधे होकर हत्या तक करने से नहीं चूक रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो दुश्मन देश अपने मकसद में कुछ हद तक कामयाब होता दिख रहा है। इससे पहले कि  जातियों के बीच आपसी वैमनस्यता इतनी अधिक बढ़ जाए कि अपने देश में गृह युध्द की नौबत आ जाए और ये देश खंडित होने के कगार पर पहुँच जाए हम देशवासियों को जागना होगा। सोशल मीडिया पर जो भी व्यक्ति किसी जाति के देवता अथवा महापुरुष के विषय में कोई अभद्र टिप्पणी, लेख अथवा चित्र पोस्ट करे तो उसके बारे में सोशल मीडिया के उस प्लेटफार्म के प्रबंधन समूह को सूचना देकर आपत्ति दर्ज करवाई जाए। यदि ऐसा घृणित कार्य करनेवाला आपके आस-पास ही रहता है तो इस संबंध में निकटवर्ती थाने में लिखित शिकायत दी जाए। यदि आप उससे अपरिचित हैं तो साइबर क्राइम सेल को ई मेल द्वारा इसकी शिकायत भेजी जाए। आपका कोई मित्र घृणा फैलानेवाले ऐसे किसी संदेश को सोशल मीडिया पर शेयर करता है तो उसे प्रेमपूर्वक समझाया जाए। यदि वह आपकी बात नहीं मानता है तो उसे अपनी मित्र मंडली से तड़ीपार कर अपने मित्र समूह को इस संबंध में पोस्ट के माध्यम से बाकायदा सूचित करते हुए जानकारी दी जाए। सोशल मीडिया को निरंतर प्रयोग में लानेवाले अपने मित्रों व संबधियों को दुश्मन देश के षड़यंत्र के बारे में बताया जाए।
ऐसे ही कुछ छोटे-छोटे प्रयासों से हम अपने प्यारे देश भारत की अखंडता व संप्रभुता की रक्षा कर सकते हैं। इस बात को हम हमेशा याद रखें कि हर जाति के लिए उसके देवता व महापुरुष आदरणीय और वंदनीय हैं और हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम उनके देवताओं अथवा महापुरुषों के विषय में कुछ भी उल-जलूल लिखकर या फिर इस तरह की बातों को शेयर करके उनकी भावनाओं को ठेस पहुचाएं।

नफरत का ये नाग 
चैन-ओ-अमन को डस जाएगा
तू अब भी न जागा 
तो ये मुल्क़ बंट जाएगा।

याद रखिए यदि हमने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया तो ये अपना देश कई टुकड़ों में बंट जाएगा और कोई भी देशप्रेमी कभी भी  नहीं चाहेगा कि इस देश का कोई भी हिस्सा इससे अलग हो।
जय हिंद!
वंदे मातरम!
लेखक : सुमित प्रताप सिंह

चित्र गूगल से साभार

रविवार, 1 अक्तूबर 2017

कविता : घर में बुजुर्ग होने का अर्थ


('अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस' पर विशेष कविता)

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
जीवन की एक विशेष पाठशाला का होना
जिसमें मिल सकते हैं हमको
नित्य नए-नए सबक

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
तजुर्बों को अपने मस्तिष्क में संजोए हुए
एक तजुर्बेकार व्यक्तित्व की उपस्थिति
जो सिखा सकता है हमें
गलत और सही में सच्चा फर्क

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
अपनी जिम्मेवारियों को
बखूबी निभा लेने के बाद भी
जिम्मेवारियों का बोझ उठाए हुए
एक बहुत ही खास शख्सियत

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
अपने हृदय में
स्नेह का सागर भरे हुए
एक प्यारी सी मानव कृति

घर में बुजुर्ग होने का अर्थ है
हमारे परिवार के चारों ओर
एक मजबूत चारदीवारी का होना
जो करती है सुरक्षा
हर असंभावित खतरे से

इसलिए बुजुर्ग आदणीय हैं, वंदनीय हैं
और हमारे घर के अभिन्न अंग हैं
यदि बुजुर्गों का आशीष हमारे संग है
तो फिर इस जीवन में उमंग ही उमंग है।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

हास्य व्यंग्य : युवराज का सपना


कई दशकों तक देश की कथित रूप से सेवा करने का दम भरनेवाले राजनैतिक दल के लाड़ले युवराज ने विदेशी धरती से देश में 2019 ईसवी में होनेवाले लोकसभा चुनावों का बिगुल अभी से फूँक दिया है। ये निर्णय उन्होंने बहुत सोच-समझकर लिया है। भारतीय धरती से उन्होंने बहुत प्रयास कर लिया, लेकिन सफलता ने उनके पास फटकना भी मंजूर नहीं किया है। क्या-क्या नहीं किया उन्होंने। अपने लाव-लश्कर के संग दलित के घर में आधी रात को जा धमके और वहाँ बाकायदा मीडिया की मौजूदगी में दलित के हाथों से अपना भोग लगवाया। भोग लगवाने के उपरांत अपनी सहृदयता के गीत गाकर उस दलित परिवार को सपनों का झुनझुना पकड़ाया और वहाँ से रफूचक्कर हो लिए। वो बेचारा दलित परिवार अभी भी सपनों में खोकर झुनझुना बजा रहा है और युवराज सपनों के सौदागर बनकर इत-उत डोलने में मस्त हैं। युवराज ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए खाट पंचायत का बड़े स्तर पर आयोजन किया। ये आयोजन इतने बड़े स्तर का था, कि आसपास के गाँववालों की अपने-अपने घरों के लिए टूटी खाटों की जगह नई खाटों को लाने की समस्या चुटकियों में हल हो गई। वे सब खाट पंचायत से नई और मजबूत खाटें लूटकर ले गए और अब उन खाटों पर बैठकर हुक्का फूँकते हुए खाट पंचायत की जोर शोर से ठहाका लगाते हुए चर्चा करते रहते हैं। वहाँ वो सभी खाट पर बैठे-बैठे हुक्का फूँकते हैं और यहाँ कलेजा फुंकता है युवराज का। युवराज इस कृत्य के लिए विरोधियों को जिम्मेवार ठहरा उन्हें पानी पी-पीकर कोसते हुए गरियाते रहते हैं। युवराज ने समय-समय पर अपने कुर्ते की बाजुएँ ऊपर चढ़ाकर सत्ता को सीधी चुनौती भी दी है। वो और उनके दलीय चमचे आए दिन सुंदर और सुशील गालियों से सत्ता पक्ष को सुशोभित करते हुए अपने विपक्षी होने का हक अदा करते रहते हैं। चाहे महागठबंधन की रैलियाँ हों या ‘देश के टुकड़े होंगे हजार’ जैसे नारे लगानेवाले कथित देशप्रेमियों का प्रदर्शन हो या फिर खुद ही दंगा करके खुद ही को पीड़ित दर्शानेवाले शांतिप्रिय समुदाय की विरोध सभा हो युवराज हर जगह पूरी तत्परता से और सबसे पहले उपस्थित मिलते हैं। पर उनकी इस योग्यता से बैर रखनेवाले उन्हें सत्तापक्ष का एजेंट करार देते हैं और उनपर आरोप मढ़ते रहते हैं, कि सत्ता पक्ष के इशारों पर काम करते हुए वो अपनी देश के सबसे ईमानदार राजनैतिक दल की नैया डुबोने में लगे हुए हैं। ऐसे वचन सुनकर युवराज का चेहरा गुस्से के मारे तिलमिला उठता है और उनकी बाजुएँ फडकने लगती हैं। वो क्रोध में अपने कुर्ते की बाजुओं को ऊपर चढ़ाते हैं और वंशवाद के रथ पर सवार हो अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर भोंथरे बाण से लोकसभा चुनाव-2019 रुपी मछली पर निशाना साधने को तैयार होते हैं, कि तभी कोई उनकी कमर पर गदे से जोरदार प्रहार करता है और युवराज उस अप्रत्याशित आक्रमण से घायल हो रथ से नीचे गिर जाते हैं। अचानक उनकी आँख खुल जाती है और वो खुद को औंधे मुँह बिस्तर से जमीन पर गिरा हुआ पाते हैं। वो अपना सिर उठाकर सामने देखते हैं तो सामने राजमाता दुखी और उदास होकर खड़ी हो अपना माथा पीट रही होती हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
कार्टून गूगल से साभार


शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

व्यंग्य : असहिष्णु देश के दीवाने लोग


    पना भारत देश बहुत ही असहिष्णु देश है। ये इतना असहिष्णु देश है कि आए दिन इस देश में असहिष्णुता से परेशान बेचारों को सार्वजनिक रूप से घोषित करना पड़ता है, कि ये देश कितना अधिक असहिष्णु है। इस देश के बहुसंख्यक असहिष्णु समुदाय के सहारे अपना सफल फिल्मी कैरियर बनानेवाले अभिनेता को सालों बाद अचानक ये अहसास होता है कि ये देश तो बड़ा असहिष्णु है। वो बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके ये घोषित करते हैं कि इस देश में इतनी ज्यादा असहिष्णुता बढ़ चुकी है कि यहाँ रहने में उन्हें और उनकी बीबी को बहुत डर लगने लगा है। हालाँकि इतना ज्यादा डरा हुआ होने के बावजूद भी वो इस असहिष्णु देश को छोड़कर कहीं और बसने का विचार भी नहीं करते। हमारे देश के असहिष्णु जीवों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है और वे उन अभिनेता को फिल्मी दंगल में पटखनी देने के बजाय जीत दिलवाकर अपने असहिष्णु होने का ठोस सबूत देते हैं। अभिनेता के शुभचिंतक भी अवसर का लाभ उठाते हुए असहिष्णुता का विरोध करते हुए अपने धूल जम चुके पुरस्कारों और सम्मानों को लगे हाथों लौटाकर विरोध के साथ-साथ अपने आपको गुमनामी से निकालने का प्रयास कर एक तीर से दो शिकार कर डालते हैं और वो भी इस देश को छोड़ने की बजाय इसकी छाती पर ही मूँग दलते  रहते हैं।
बीते दिनों कई साल संविधान के उच्च पद पर बैठकर मलाई खाने के बाद एक बेचारे जाते-जाते असहिष्णुता का रोना रो गए और देश में असहिष्णुता का भोंपू फिर से बजने लगा। वो इतने सालों तक मलाई खाते रहें, लेकिन इस दौरान उन्हें असहिष्णुता के बिल्कुल भी दर्शन नहीं हुए, लेकिन जैसे ही उन्हें लगा कि उनका मलाई खाना अब बंद होनेवाला है, उन्होंने असहिष्णुता का शिगूफा छोड़ दिया और जाते-जाते इस असहिष्णु देश में इतनी इज्जत कमा गए कि अब उन्हें लोगों को अपना मुँह दिखाने में भी सोच-विचार करना पड़ रहा है। बहरहाल अपने देश के इतने असहिष्णु होने के बावजूद भी आए दिन कोई न कोई  मुँह उठाए इसमें बसने के लिए चला आता है। ये सिलसिला आज से नहीं बल्कि हजारों सालों से चल रहा है। बाहर से यहाँ आ धमकने के बाद लोग यहीं डेरा डाल लेते हैं और जब लगता है कि इनका डेरा उखड़ने का खतरा नहीं रहा तो फिर ये असहिष्णुता का राग अलापने लगते हैं। अपना देश कोई देश न होकर धर्मशाला का प्रमाणपत्र पानेवाला है। पहले ही यहाँ नेपालियों और बांग्लादेशियों ने डेरा जमाकर उत्पात मचा रखा है और अब रोहिंग्या भी अपना रोना रोते हुए बोरिया-बिस्तर लादकर आ धमक रहे हैं। उन्हें कोई ये क्यों नहीं बताता कि उन्हें ऐसे असहिष्णु देश में न बसकर बांग्लादेश, पाकिस्तान या फिर अरब के किसी सहिष्णु देश में जाकर पनाह मांगनी चाहिए। पर ये बात शायद उन्हें समझ में नहीं आनेवाली। हमारे असहिष्णु देश के दीवानों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। कभी-कभी लगता है कि आने समय में देश के इन बाहरी दीवानों के आगे के हम असहिष्णु बहुसंख्यकों की संख्या लुप्तप्राय न हो जाए।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
कार्टून गूगल से साभार 

रविवार, 17 सितंबर 2017

लघुकथा : कागौर


   श्राद्धों में कौओं को कागौर खिलाने के बाद भेदा कमरे में बने मंदिर के आगे हाथ जोड़कर बोला, "हे भगवान हमाई अम्मा को स्वर्ग में आराम और चैन से रखियो।"
तभी कमरे में टँगी भेदा की अम्मा की तस्वीर फर्श पर आ गिरी।
भेदा ने तस्वीर को ध्यान से देखा तो उसे ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे उसकी अम्मा उससे कह रही हों, "लला अगर बहू की बातन में न आयकै हमाओ समय से इलाज करवाय देते तो आज तुम्हाये संगें हमऊ कागौर खिलाय रहीं होतीं।"

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


मंगलवार, 5 सितंबर 2017

हास्य व्यंग्य : ढीले लंगोटवाले बाबा


“महाराज आप कौन हैं?”
“हम बाबा हैं।“
“कौन से बाबा?”
“हम कलियुग के बाबा हैं।“
“आप करते क्या हैं?”
“हम लोगों के दुःख और परेशानी दूर करते हैं।“
“क्या वास्तव में आप लोगों के दुःख व परेशानी दूर करते हैं?”
“अब अगर शक हैं तो हमारे भक्तों से जाकर पूछ लो। हम क्या बताएँ।“
“आपके भक्त इस देश की जनता के ही अंग हैं और क्या आपको लगता है कि जनता वाकई में कुछ बताने लायक है। फिर उससे पूछने से फायदा क्या? वैसे आप ही क्यों नहीं बता देते?”
“देखो बालक भक्तों के दुःख और परेशानी दूर हुए हों या न भी हुए हों लेकिन वे सब इस बात में यकीन करते हैं कि इनका खात्मा एक न एक दिन अवश्य होगा। ये आस ही उनमें ऊर्जा का संचार करती है और वे आनंद व प्रसन्नता का अनुभव करने लगते हैं।“
“और एक दिन इसी आस में भक्तों का राम नाम सत्य हो जाएगा लेकिन शायद उनके कष्ट दूर नहीं हो पाएँगे।“
“बालक ऐसी निराशावादी सोच से उबरो।“
“निराशावादी सोच नहीं बल्कि हकीक़त है। आप झूठे संसार में अपने भक्तों को रखकर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं।“
“बालक हम खिलवाड़ नहीं बल्कि हमारे और हमारे भक्तों के जीने का जुगाड़ कर रहे हैं।“
“वो भला कैसे?”
“बालक इस संसार में इतने कष्ट हैं कि किसी भी व्यक्ति का जीना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए हम अपने भक्तों को इस संसार से दूर स्वप्नों के संसार में जीने का तरीका सिखाते हैं।“
“हाँ और इसके बदले आपके मूर्ख भक्त आपकी झोली भरके आपको मालामाल कर देते हैं।“
“बालक ये तुम गलत कह रहे हो।“
“तो फिर सही बात क्या है?”
“सही बात ये है कि हम बाबा होने का फर्ज निभाते हुए अपने भक्तों को मोहमाया के बंधन से मुक्त करते हैं।“
“और अपनी मोहमाया के जाल में अपने भक्तों को क़ैद कर लेते हैं। बाबा वैसे आप किस धर्म के हैं?”
“बालक कार्ल मार्क्स ने कहा है कि धर्म अफीम है और हम किसी भी नशे के खिलाफ हैं इसलिए हम किसी भी धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वैसे तुम हमारा पंथ, संप्रदाय अथवा धर्म बाबागीरी ही मान सकते हो।“
“मतलब आप अफीम की बजाय भक्तों को बाबागीरी नाम की चरस पिला रहे हैं।“
“बालक हम भक्तों को चरस नहीं बल्कि प्रेमरस पिला रहे हैं, जिससे विश्व में बंधुत्व की भावना का विकास हो सके।“
“खैर छोड़िए आप ये बताइए कि आपका असली नाम क्या है?”
“बालक सच कहें तो हमें हमारा असली नाम याद ही नहीं रहा है। अब तो हमें लंगोटवाले बाबा के नाम से ही जाना जाता है।“
“अच्छा बाबा एक बात और बताएँ।“
“अब बाकी बातें फिर कभी करेंगे फ़िलहाल हम अपने भक्तों को आशीर्वाद देने जा रहे हैं।“
यह कह बाबा बहुत ही अधीर हो कुछ समय पहले ही वहाँ पधारीं महिला भक्तों की ओर चलने को हुए। उनकी ऐसी हालत देखकर मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया, “बाबा आपने तो अपना नाम लंगोटवाले बाबा बताया था पर आप तो लंगोट के ढीले लगते हैं।”
बाबा आँख मारके मुस्कुराते हुए बोले, “बालक नाम तो हमारा ढीले लंगोटवाले बाबा ही है, लेकिन बोलने में ढीले शब्द साइलेंट हो जाता है।”

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
* कार्टून गूगल से साभार 

शनिवार, 2 सितंबर 2017

लघुकथा : बाहरी


  रीबा समुद्र के किनारे बैठा देख रहा था, कि लोग बारी-बारी से गणेश जी की विभिन्न आकर की प्रतिमाएँ लाते और उन्हें समुद्र मैं विसर्जित करके नाचते-गाते हुए वहाँ से अपने-अपने घर की ओर चले जाते।

गरीबा बहुत देर तक यह सब देखता रहा।

फिर अचानक ही वह बुदबुदाया, "ये और हम लोग गणपति बप्पा को बरोबर पूजता है, लेकिन ये महाराष्ट्र का लोग हम उत्तर भारतीयों  को भैया बोलता है और हमसे बहुत बुरा व्यवहार करता है। हम लोग कई पीढ़ी से यहाँ रह रहा है, फिर भी ये लोग हमको बाहरी ही मानता है।"

गरीबा ने बीड़ी जलाकर एक लंबा सा कश खींचा और बड़बड़ाया, "गणपति बप्पा को ये लोग अपना सबसे बड़ा देवता मानता है, तो वो भी तो उत्तर भारत के हिमालय परबत पर जन्म लिया था। फिर तो अपना गणपति बप्पा भी बाहरी हुआ न?"

फिर अचानक गरीबा जोर से खिलखिलाया, "या फिर हो सकता है, कि इन लोगों का हिमालय परबत महाराष्ट्र में ही किसी जगह पर हो?"

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

बुधवार, 30 अगस्त 2017

हास्य व्यंग्य : मुल्ला जी और शुभचिंतक काफ़िर लल्ला जी


मुल्ला जी अपना सिर पकड़े बैठे हुए थे। उनके दिमाग में बार-बार ‘तलाक़ तलाक़ तलाक़’ की तेज आवाज गूँज रही थी। जब उनसे बर्दाश्त न हुआ तो अपने दोनों हाथों को आसमान की ओर उठाकर चीखते हुए बोले, “या अल्लाह अब हमारे क़ौमी मसले का फैसला ये मुआँ कोर्ट करेगा। जो पाक काम 1400 साल से होता चला रहा था उसपर कोर्ट का यूँ कानून हथौड़ा चला देना कहाँ का इंसाफ है?” “सही कह रह रहे हो भाई जान! ये सुप्रीम कोर्ट की सरासर नाइंसाफी है।” मुल्ला जी ने अपनी दाढ़ी को खुजाते हुए सामने नज़र डाली तो देखा कि उनके सामने उनके शुभचिंतक काफ़िर लल्ला जी खड़े हुए थे। लल्ला जी दूसरे मजहब के होने के कारण मुल्ला जी की नज़रों में हमेशा काफ़िर ही रहे लेकिन काफ़िर होकर वो भी उनके हर सुख-दुःख में हमेशा संग रहे। चाहे तलाक़ का मसला हो या हलाला हो या फिर मुताह का मामला हो काफ़िर लल्ला जी ने हर बात में मुल्ला जी और उनकी क़ौम का दिलोजान से समर्थन किया। असल में काफ़िर लल्ला जी अपने दल के प्रति बड़े वफादार हैं और उनका दल मुल्ला जी और उनकी क़ौम के सहारे ही देश की सत्ता सुख भोगता रहा है। अपने दल की कृपा से लल्ला जी भी जीवन के सारे सुख और आराम लेते हुए जीने का मजा लेते रहे हैं। काफ़िर लल्ला जी को सामने देख मुल्ला जी एक पल को खुश होते हैं और अचानक ही दुःख के मारे माँ-बहिन की गालियों की खेप निकलना शुरू कर देते हैं। काफ़िर लल्ला जी समझ जाते हैं कि मुल्ला जी इतनी मनमोहक गालियाँ किसको समर्पित कर रहे हैं। वो उनके पास आते हैं और उनके हाथों को अपने हाथ में लेकर उन्हें सांत्वना देते हुए समझाते हैं कि जो भी हुआ बहुत गलत हुआ तथा उन्हें सुझाव देते कि इस गलत फैसले के खिलाफ पूरी क़ौम को अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए। मुल्ला जी को काफ़िर लल्ला जी की बातें सुनकर अचानक जोश आ जाता है और उनका खून गुस्से के मारे उबाल मारने लगता है। वो बुलंद आवाज में ‘हमारी क़ौम हमारा कानून’ का नारा लगाते हैं। उनके शुभचिंतक काफ़िर लल्ला जी उनका साथ देते हैं तथा इस गलत फैसले का समर्थन देने के लिए अपने धर्मवालों का मजाक उड़ाते हैं और उनपर कटाक्ष से भरे हुए अनेकों जुमले उछालते हैं। उधर मुल्ला जी की अम्मी और बहिनें उन्हें समझाती हैं कि इस फैसले से उनके परिवार और क़ौम की औरतों का भी भला होगा और उनकी जिंदगी नर्क नहीं बन पाएगी। मुल्ला जी ये सुनकर अपनी टोपी उतारकर अपने सिर पर हाथ फेरते हुए गहरी सोच में डूब जाते हैं। सोचते-सोचते वो एक पल को बुर्के के भीतर मुँह छिपाए हँस रहीं अपनी बेगम को झल्लाहट में देखते हैं और दूसरे ही पल पड़ोस में रहनेवाली हुश्न में हूर को भी मात देनेवाली रेशमा को हसरत भरी निगाहों से देखते हुए ठंडी-ठंडी आहें भरने लगते हैं। रेशमा के लिए लार टपकाते मुल्ला जी को उनके मोहल्ले में रहनेवाले उनकी क़ौमवाले समझदार लोग भी उन्हें कोर्ट के फैसले के फायदे गिनाने लगते हैं। उनके शुभचिंतक काफ़िर लल्ला जी भी बहती हवा का रुख भाँपकर और अपने-आपको एकदम से उसके अनुसार ढालकर मुल्ला जी को कोर्ट के फैसले के उजले पक्ष के बारे में विस्तार से बताने लगते हैं। ये देख मुल्ला जी अपने मुँह में भरी पान की पीक एक ओर थूकते हैं और अपना सिर खुजाते हुए काफ़िर लल्ला जी को घूरकर देखते हुए सोचने लगते हैं, “ये साला लल्ला जी हमारा शुभचिंतक है या फिर खुदचिंतक?”

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

व्यंग्य : जीना इसी को कहते हैं

भाई जिले!
हाँ बोल भाई नफे!
आज कैसे उदास हो बैठा है?
कुछ नहीं भाई बस इस जीवन से निराश हो गया हूँ।
वो क्यों भला?
भाई सारी जमा पूंजी लगाकर एक धंधा शुरू किया था पर वो जमा नहीं। सारा पैसा डूब गया। अब समझ में नहीं आता कि क्या करूँ।
तो इसमें इतना निराश क्यों होता हैथोड़ी कोशिश और मेहनत कर सब ठीक हो जाएगा।
भाई अगर तू मेरी जगह होता तो अब तक किसी पेड़ पर लटक चुका होता 
- भाई इतना भी सिरफिरा नहीं हूँ, जो पेड़ पर लटककर अपनी कीमती जान दे दूँ और न ही मैं उन लोगों जितना महान नहीं हूँ, जो आए दिन जरा सी परेशानी या मुसीबत आनेपर इस अनमोल जीवन का राम नाम सत्य कर डालते हैं। मेरा मानना है कि कई योनियों के बाद नसीब हुआ ये मानव जीवन यूँ एक पल में गँवाने के लिए नहीं है जब तक कि इसके पीछे कोई नेक उद्देश्य न हो।
- नफे तू भी कहाँ मेरे और मेरे जैसे लोगों के दुखों को सुन भावुक हो उठा। खैर तू मेरी छोड़ अपनी सुना। आज तेरे चेहरे पर बड़ी रौनक लग रही है। कहाँ से आ रहा है?
भाई आज इंडिया गेट की सैर करके आ रहा हूँ।
अरे वाह तो क्या-क्या देखा वहाँ?
वहाँ अंग्रेजों की सेवा करते हुए प्रथम विश्व युद्ध और अफगान युद्धों में मारे गए 90,000 अंग्रेज भक्त भारतीय सैनिकों की याद में अंग्रेजों द्वारा बनवाया गया युद्ध स्मारक रुपी इंडिया गेट देखाइसकी मेहराब के नीचे स्थित आजादी के बाद स्थापित की गई अमर जवान ज्योति को सादर नमन कियाइंडिया गेट के इर्द-गिर्द घूमते हुए पानी पूरी खायी और जिले सिंह से मुलाकात की।
अरे भाई मैं वहाँ कहाँ मिल गया जबकि मैं तो कल दुखी हो अपना सिर पकड़े हुए घर पर ही पड़ा रहा।
भाई वो जिले सिंह कोई और था। हमें देखते ही पुकारकर अपने पास बुला लिया। गुब्बारे बेच रहा था। अब से कुछ साल पहले नाई का काम करता था। दिल्ली के एंड्रूज गंज इलाके में मालिक सनी की दुकान में जिले सिंह नौकर नहीं बल्कि मालिक की तरह काम करता था। बहुत ही हाजिर जवाब था। अपने ग्राहक के बालों को काटते हुए उनका खूब मनोरंजन करता रहता था और साथ ही साथ अपने मालिक सनी की खिंचाई भी करता रहता था।
फिर वो गुब्बारे क्यों बेचने लगा?
उसके मालिक को रोज शराब पीने की बुरी आदत थी। जिले ने उसे बहुत समझाया पर वो नहीं माना। सनी भी उन भले लोगों में से एक था जो नेक सलाह को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकालना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। और एक दिन वो भी आया जब शराबखोरी ने सनी का एक्सीडेंट करवा दिया और सनी अपने परिवारअपनी दुकान और जिले सिंह को छोड़कर हमेशा के लिए चला गया।
- ओहो ये तो बहुत दुखद हुआ। अच्छा फिर जिले का क्या हुआ?
- जिले अच्छा कारीगर था पर उसे कहीं काम नहीं मिला।
- क्यों भई अच्छे कारीगर को तो काम मिलने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए थी।
- भाई जिले सिंह खरी बात कहनेवाला खरा इंसान ठहरा और आज के जमाने में खरी-खरी कहनेवालों को बिलकुल भी पसंद नहीं किया जाता। और फिर उसकी उम्र और बालों में आ रही सफेदी भी उसके काम मिलने के आड़े आ गयी।
और वो बेचारा इंडिया गेट पर गुब्बारे बेचने लगा।
हाँ पर वो निराश नहीं था। उसके भीतर जिंदगी को जीने का जज्बा दिखाई दे रहा था। वो और लोगों की तरह निराशा से अपना जीवन बर्बाद करने की बजाय मेहनत करके अपने और अपने परिवार की गुजर-बसर करने के लिए प्रयासरत है और कुला मिलाकर खुश है। वैसे दोस्त एक बात कहूँ जीना इसी को कहते हैं।
बात तो तू ठीक कह रहा है भाई। उस जिले सिंह ने इस जिले सिंह को सबक दिया है। जिले सिंह को ये तेरा दोस्त अपनी प्रेरणा बनाएगा और जिंदगी को पूरी हिम्मत से लड़ते हुए जिएगा।
अब आया न लाइन पर।
हाँ भाई बेशक देर से आया पर दुरुस्त आया।  है कि नहीं?
बिलकुल भाई!

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

शनिवार, 10 जून 2017

व्यंग्य : अन्नदाता का दुःख

इन दिनों अन्नदाता हैरान और परेशान हैं। उनकी हैरानी और परेशानी जायज है। वो उन कामों के लिए देश-विदेश में बदनाम हो रहे हैं, जिनको उन्होंने किया ही नहीं। उन्हें उत्पात और विध्वंश का दोषी ठहराया जा रहा है। अन्नदाता कभी उत्पात और विध्वंश करने की सोच ही नहीं सकते। वो तो इतना कर सकते हैं कि जब सहना उनके वश में न हो तो वो किसी पेड़ की डाली पर चुपचाप लटककर अथवा विषपान करके अपनी इहलीला का अंत कर लेंगे। पर उत्पात और विध्वंश करन उनके शब्दकोश में नहीं है। उन्हें सिर्फ सृजन करना आता है। उनके सृजन के फलस्वरूप ही इस संसार का पेट भर रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो संसार अन्नदाताओं के कारण ही पल रहा है,लेकिन फिर भी  संसार को अन्नदाताओं का होना खल रहा है। हर ओर से उम्मीद खोने के बाद राजनीतिक तूफान में अपनी राजनीति की नौका डुबो चुके लोगों ने अन्नदाताओं का सहारा ले फिर से नदी की धारा में अपनी नौका खेवने की भरकस कोशिश शुरू कर दी है। इसके लिए वे किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं। उनके गुंडों ने अन्नदाताओं का भेष धरकर देश में जगह-जगह विनाशलीला आरंभ कर दी है। कभी वो बहरूपिए चूहों को खाने का दिखावा करते हैं तो कभी नरमुंडों के संग फैशनेबल पोज़ देते हैं। कभी किसानों की दुर्दशा का रोना रोकर लूटपाट का सहारा लेते हैं तो कभी आगजनी कर अपने गुस्से का इजहार करते हैं। अब फिर से वो मैदान में हैं। उनके द्वारा दूध किसी भूखे के पेट में जाने की बजाय सड़कों पर बहाया गया। बसें और गाड़ियाँ फूँककर विरोध दर्शाने का ड्रामा रचा गया। लूटपाट और मारपीट का सहारा ले आंदोलन को चमकाने की भरपूर कोशिश हुई। अन्नदाताओं के कंधों का सहारा ले अपनी किस्मत चमकाने का प्रयास करनेवाले राजनीति के बाजीगर नित नई बाजी चल रहे हैं और देश और समाज को छल रहे हैं। उनका क्रोध उचित है। इतने सालों से देश में राम राज्य चल रहा था और एक दिन एक व्यक्ति आया और उसने आकर अचानक उस रामराज्य का दी एंड कर दिया। तथाकथित बुद्धिजीवी सामूहिक रूप से रामराज्य के फिर से लौटने की प्रार्थना आए दिन करते रहते हैं। उस राम राज्य की वापसी के लिए संग्राम जरूरी है और उस संग्राम को लड़ने की जिम्मेवारी किसान का भेष धरे बहरूपियों ने संभाली है। उन बहरूपियों की डोर राजनीति के बाजीगरों के हाथों में हैं। जैसे-जैसे  बहरूपियों का उत्पात बढ़ता जा रहा हैवैसे-वैसे ही अन्नदाताओं का दिल भय से धड़कने लग रहा है। वो उन बहरूपियों की लच्छेदार बातों में फँसकर बेमौत मारे जा रहे हैं। उनकी लाश पर राजनीति करनेवालों की बाँछें खिल उठी हैं। वो ब्रांडेड कपड़े पहने हुए शुद्ध पौष्टिक भोजन और बिसलेरी की बोतल अपनी काँख में दबाए हुए मोटरसाइकिल पर बिना हेलमेट पहने व ट्रिपल राइडिंग करते हुए अन्नदाताओं के दुखों और परेशानियों को हरने के दावे के साथ उनके बीच पधार चुके हैं। अब शायद अन्नदाताओं के दुःख और परेशानी दूर होने का वक़्त आ गया। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि उनके दुःख और परेशानी सुरसा जैसा विशाल आकार लेने को अग्रसर हो रहे हों।    
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
चित्र गूगल से साभार 

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

व्यंग्य : मुस्कुराइए फिर से इलेक्शन हैं


   कूंचे, गलियां और मोहल्ले फिर से गुलज़ार होने लगे हैं। वो फिर से टोली बनाकर दरवाजे-दरवाजे जाकर अपनी हाजिरी दर्ज करवा रहे हैं। पाँच साल पहले चोट खाए हुए लोग नज़रें उठाकर खोज रहें हैं कि शायद कोई जाना-पहचाना चेहरा मिल जाए तो उसे कुछ पलों के लिए गरियाकर अपने दिल की भड़ास निकाल लें। पर उन्हें जाना-पहचाना कोई चेहरा नहीं दिखता बल्कि उन्हें दीखता है एक बिलकुल ताज़ा-तरीन चेहरा जो न तोड़नेवाले अनेकों वादे अपने संग लिए हुए नमस्कार मुद्रा में सामने खड़ा हुआ है। पहली बार तो नज़र उठाकर उसे एक पल को देखा तो वो चेहरा अनजाना सा लगा था लेकिन फिर गौर से देखने पर उनकी सूरत कुछ जानी-पहचानी सी लगने लगती है। अचानक याद आता है कि ये सूरत तो उनसे मिलती-जुलती है जिन्होंने पाँच साल पहले इसी प्रकार अपने दिव्य दर्शन दिए थे और उसके बाद ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सिर से सींग। पाँच सालों तक उन्होंने ‘उल्लू बनाओ अभियान’ को सुचारू रूप से चलाया। इस बार जब उन्हें इस अभियान की कमान नहीं सौंपी गई तो वे अपने भतीजेभांजे या फिर कुछ दूर के रिश्तेदार के माध्यम से इस अभियान को सुचारू रूप से चालू रखने के लिए लोगों के बीच फिर से मौजूद हैं। ‘उल्लू बनाओ अभियान’ का वर्तमान प्रतिनिधि और उनके सगे-संबंधी काफी जुझारू हैं। ये उनका जुझारूपन ही जो इतने सिर-फुटव्वल के बाद भी प्रतिनिधित्व प्राप्त करने का जुगाड़ कर लिया । हम उन्हें सम्मानपूर्वक ‘जुगाड़ी’ शब्द से भी सुशोभित कर सकते हैं। वो लुटे-पिटे जनों की चरण वंदना कर उनको देव होने की फिर से अनुभूति कराते हैं और इस अनुभूति के बदले में उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की तीव्र इच्छा रखते हैं। जब उन्हें लगता है कि इस बार देव हठ करने पर उतारू हैं तो वो उनके समक्ष सुरा सहित विभिन्न मनभावन उपहार चढ़ावे के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इतना सब पाकर देव एकदम से खिल उठते हैं। वो आशा और विश्वास के साथ मुस्कुराते हैं। उनके संग कूंचों, गली-मोहल्लों और नाले-नालियों के इर्द-गिर्द सड़ांध मारता हुआ कूड़ा-करकट भी मुस्कुराता है। मच्छर और मक्खियाँ झूमते हुए नृत्य करते हैं। बीमारियाँ उम्मीद भरी निगाहों संग अंगड़ाई लेते हुए मुस्कुराती हैं। आस-पास का वातावरण भी गंधाते हुए मुस्कुराता है। तभी बिजली कड़कती है और आसमान से लखनवी अंदाज में आवाज गूँजती है 'मुस्कुराइए फिर से इलेक्शन हैं।" 

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 


कार्टून गूगल से साभार 

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

व्यंग्य : रोमियो तुम कब आओगे




     जकल बहुत परेशान हैं वो और काफी नाराज भी। वो चिंता में डूबकर विचार कर रहे हैं कि आखिर क्यों उन्हें शिकार बनाकर उन पर शिकंजा कसा रहा है। अभी तक तो कितने निश्चिन्त थे वे सब। न कोई रोक-टोक थी और न ही कोई बंधन था। बस उनकी मनमर्जी चलती थी। प्यार के नाम पर एक तो अय्याशी करने का मौका मिलता था ऊपर से ये सब करने के बदले जन्नत का दरवाजा खुलने का वादा भी। इस नेक काम में उन्हें बड़े-बड़ों का पूरा समर्थन और संरक्षण भी प्राप्त था। जिंदगी कितने मजे से बीत रही थी और अचानक यूँ मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। उन्हें रोमियो बता उनके खिलाफ बाकायदा अभियान चलाकर उनके प्रेम के धंधे को दफ़न करने की गहरी साजिश रची गयी। इस बार उनके आकाओं की चिल्ल-पौं भी कुछ काम न आ सकी। उनके शुभचिंतक चीखते रहे, चिल्लाते रहे और वो रोमियो को अपने  जाल में फँसाते रहे। वैसे तो ये लोग पश्चिमी संस्कृति को पानी पी-पीकर कोसते रहते हैं, पर अभियान चलाया तो पश्चिम के प्रेमी रोमियो के नाम पर। क्या मजनू और राँझे के प्यार में कोई कमी थी? क्या उन्होंने प्यार की खातिर क़ुरबानी नहीं दी थी? कम से कम मजनू और राँझे के नाम पर अभियान चलता तो उन पर सांप्रदायिक होने का दोष तो मढ़ा जा सकता था। पर नहीं उनके आदर्श तो पश्चिमवाले जो ठहरे। ये सोचते हुए वो अपने माथे पर चन्दन का तिलक लगाते हैं, अपने हाथों में पवित्र कलावा बाँधते हैं, हिन्दू देवी-देवताओं के लॉकेट गले में टाँगते हैं और पूरी तैयारी के साथ मँहगे कपड़े पहनकर अपनी फंडेड चमचमाती बाइक पर किक मारकर अपने इश्क़ मिशन पर रवाना हो जाते हैं। ये देखकर रोमियो-जूलियट, लैला-मजनू, हीर-राँझा प्रेम में क़ुर्बान हुए बाकी प्रेमी-प्रेमिकाओं संग मुस्कुराते हैं। पर उनकी मुस्कराहट में दुःख भरी उदासी है। वो आधुनिक रोमियो को धिक्कार रहे हैं। पर आधुनिक रोमियो इन सब बातों से बेपरवाह हैं। उन्हें तो बस उनके प्यार में फँसी हुईं मुर्गियाँ दिखाई दे रही हैं जिनको हलाल करना ही उनका मकसद है। उनका इंतज़ार उनके मकड़जाल  में फँसी हुईं अकलमंद आधुनिक जुलियटें पलकें बिछाकर कर रही हैं। उनके संग-संग अपने-अपने लट्ठ को तेल पिलाकर तैयार कर रोमियो की राह तकते हुए एंटी रोमियो स्क्वैड के सभी जवान बार-बार एक ही सवाल कर रहे हैं 'रोमियो! तुम कब आओगे?"
लेखक : सुमित प्रताप सिंह
कार्टून गूगल से साभार 

सोमवार, 27 मार्च 2017

हास्य व्यंग्य : म्हारे गुटखेबाज किसी पिकासो से कम न हैं


     पने देश में कला की तो कोई कद्र ही नहीं है। आए दिन कोई न कोई ऐसा सरकारी फरमान जारी होता रहता है, जो कला का मानमर्दन करने को तत्पर रहता है। अब गुटखेबाज कलासेवी जीवों को ही ले लीजिए। कलासेवा की खातिर कड़ी और ज़हरीली चेतावनी का सन्देश पढ़ने के बावजूद भी अपने मुँह में नुकसानदायक ज़हरीला गुटखा गटकने वाले महान जीवों का त्याग भला वे लोग कहाँ समझेंगे, जिन्होंने कभी भी गुटखा छूने का साहस ही न किया हो। गुटखा को मुँह में धरकर पिच-पिच की ध्वनि का घोष करते हुए दफ्तर से लेकर पुरातत्व के महत्त्व की इमारत तक को पिचकारी मारकर भाँति-भाँति प्रकार की कलाकृतियों का निर्माण करनेवाले कलाकारों के परिश्रम का कुछ तो ध्यान रखना चाहिए। सरकारी-गैरसरकारी दफ्तरों की सीढियाँ, दरवाजे व शौचालय की सुंदरता इन कलासेवकों के दम पर ही टिकी हुई है। इनके द्वारा ऐतिहासिक इमारतों पर गुटखा खाकर मुँह में गंभीर गुटखा मंथन के उपरांत उपजे अनोखे रंग के द्रव्य द्वारा ऐसी अनोखी कलाकृतियों  का निर्माण किया जाता है, कि जिन्हें देखकर बड़े-बड़े चित्रकार भी दाँतों तले उँगलियाँ दबाने को विवश हो जाते हैं। देशी-विदेशी पर्यटक तो इन कलाकृतियों को देखकर इन्हें निर्मित करनेवाले गुटखेबाज कलासेवियों की कलाकारी के आगे नतमस्तक हो उठते हैं। कोई माने या न माने लेकिन घूमकर वापस लौटने पर पर्यटकों के मन-मस्तिष्क पर ऐतिहासिक इमारतों अथवा स्थलों की छवि बेशक न रहे पर गुटखेबाज कलासेवियों द्वारा प्रयत्नपूर्वक निर्मित की गईं अद्भुत कलाकृतियों की मनमोहक छवि गहराई से पैठ बना लेती हैं। यदि इन कलासेवियों की कला की प्रशंसा एक वाक्य में करें तो ‘म्हारे गुटखेबाज चित्रकारी में किसी पिकासो से कम न हैं’। गुटखेबाज कलासेवियों द्वारा विकसित की गई इस अनोखी भित्ति चित्रकला को संरक्षित करने की ओर हमें गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। यदि सरकार इस पुनीत कार्य को करने में उदासीनता दिखाती है तो स्वयंसेवी संगठनों एवं भले लोगों को मदद के लिए आगे बढ़कर आना चाहिए। वरना ऐसी अद्भुत भित्ति चित्रकला के विलुप्त होने की पूरी-पूरी संभावना है। इसके विलुप्त होने से गुटखेबाज कलासेवियों द्वारा सालों-साल से निरंतर किया जा रहा कठोर परिश्रम माटी में मिल जाएगा। इसलिए गुटखा, पान और तंबाकू सेवन पर प्रतिबंधरुपी कटार चलाकर इस कला को नष्ट करने का प्रयास बहुत ही निंदनीय है और हम सभी कलाप्रेमी एक मत से इस फैसले की कड़ी से कड़ी निंदा करते हैं।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

शनिवार, 18 मार्च 2017

व्यंग्य : इन दिनों


    न दिनों जाने क्या हो रहा है। मतलब कि इन दिनों कुछ अजीब सा ही हो रहा है। इन दिनों देश की सबसे ईमानदारी पार्टी को उसकी ईमानदारी के बदले में जनता ने फिर से ठेंगा दिखा दिया। जनता ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि उस पार्टी ने देश के लिए कितना कुछ किया था। देश के स्वतंत्र होने के बाद से ही उसके द्वारा कर्मठता से किए गए कार्यों से पूरे विश्व में देश की चर्चा हुई। उन विशेष कार्यों पर नज़र दौड़ाई जाए तो इसके द्वारा अल्पसंख्यकों पर इतनी कृपा की गयी कि वो वोट बैंक बनने से ज्यादा आगे बढ़ ही नहीं पाए। इस वोट बैंक के सहारे उसने खूब मजे काटे पर इन दिनों इस परंपरागत वोट बैंक ने भी इसका बैंड बजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। देश के संसाधनों का सदुपयोग करते हुए घोटालों की जमकर खेती की गयी और फसल से जो आय हुई उसे स्विस बैंक के चरणों में अर्पित कर दिया गया। देश के विकास का नारा देते-देते अपने परिवार की वंशबेल में पानी देकर पोषित किया जाता रहा। पर वो कहते हैं न कि किसी भी बात की होती है तो हद पार हुई और उसी वंशबेल से एक अनुपयोगी पौधा उपज गया जिसने अपने पुरखों के परिश्रम का राम नाम सत्य कर डाला। उस पौधे की संगत में आकर कुछ नए पौधे, जो जोश में आकर खुद को वटवृक्ष समझकर उछल रहे थे, वो भी अपना तिया-पाँचा करवा बैठे। अब क्या करें इन दिनों देश में ऐसी आंधी चल रही है जो देश के लिए अनुपयोगी पौधों व वृक्षों को जड़ से हिलाकर अपनी अंतिम साँसे गिनते हुए अपना शेष जीवन बिताने को विवश किए हुए है। इस आँधी ने सिर्फ राजनीति की वंशबेल को ही बेजान नहीं किया, बल्कि इसके परमप्रिय समर्थकों, जिन्हें लोग भूलवश चमचा समझ लेते हैं, का भविष्य भी दाँव पर लगा दिया। बीते दिनों इन परमप्रिय समर्थकों ने असहिष्णुता राग गाते हुए पुरस्कार वापसी अभियान चलाया था ताकि इस माध्यम द्वारा ही उस आँधी को रोका जा सके और उनके पापी पेट पर लात न पड़े। पर आँधी इतनी बेरहम निकली कि उसकी रफ़्तार के आगे उन परमप्रिय समर्थकों की भी कुछ न चली। फलस्वरूप इन दिनों परमप्रिय समर्थक अपने भविष्य को अंधकारमय पाते हुए सुबकने को विवश हैं। ऐसे गर्म माहौल में भी एक ये सर्दी है जो जाने का नाम नहीं ले रही। लगता है कि सर्दी ने भी ये सोच रखा है कि ये इन दिनों आँधी के मारे उन बेचारों को सर्द-गर्म की सौगात देकर उनके अंजर-पंजर ढीले करते हुए ही रवाना होगी।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

लघुकथा : असली वैलेंटाइन

      

      रोहित को खिड़की में दूरबीन से दूसरी बिल्डिंग में झाँकते हुए देखकर जतिन ने पूछा, “अबे साले किसके बाथरूम की जासूसी हो रही है?”

“साले इतना भी कमीना मत समझ। मैं तो अखिल के घर पर निगाह टिकाए हुए हूँ।” रोहित दूरबीन में ही खोया हुआ बोला।
“अखिल की जासूसी? अबे तुझे और कोई शिकार नहीं मिला जो उस शरीफ लड़के के पीछे पड़ गया।” जतिन ने नाराजगी जताई।
“भाई हर शरीफ के दिल में एक कमीना भी छिपा हुआ बैठा होता है।” रोहित ने बिना दूरबीन से संधिविच्छेद किए अपनी राय रखी।
जतिन के कुछ समझ में नहीं आया, “अबे ज्यादा कंफ्यूज मत कर, बात क्या है वो बता।”
“आज अखिल ने फूलवाले बुड्ढे से दो गुलाब खरीदे हैं।” रोहित कुटिल मुस्कान के साथ बोला।
जतिन ने हैरान हो कहा, “एक नहीं वो भी दो-दो गुलाब। मतलब कि लड़कियों से दूर भागने वाला लड़का आज वैलेंटाइन डे दो-दो लड़कियों के साथ मनायेगा!”
"यही तो पता करना है।" और रोहित फिर दूरबीन में खो गया, “अरे वाह! आज तो बंदे का ड्रेसिंग सेंस देखने लायक है। ये लो जी वैलेंटाइन डे मनाने के लिए बंदा अपने माँ-बाप के पैर छूकर आशीर्वाद भी ले रहा है। अरे ये क्या अखिल ने तो एक-एक करके दोनों गुलाब अपने मम्मी-डैडी को दे दिए।” रोहित हैरान हो अपना सिर खुजाने लगा।
“अच्छा तो ये बात है। मतलब कि अखिल के मम्मी-डैडी ही हैं उसके असली वैलेंटाइन।” जतिन ने मुस्कुराते हुए कहा।
लेखक - सुमित प्रताप सिंह

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

पुस्तक समीक्षा : सहिष्णुता की खोज

       इन दिनों अन्य विधाओं के अलावा व्यंग्य पर ज्यादा काम हो रहा है। यह खबर व्यंग्य यात्रियों के लिए अच्छी हो सकती है, क्योंकि व्यंग्य ही साहित्य में ऐसा धारदार हथियार है जो विसंगतियों, विद्रपताओं को एक झटके में ठीक करने का सामर्थ रखता है । साहित्य में सहिष्णुता की खोज तो पुरातन काल से होती चली आ रही है। सुमित ने भी इस खोज को ऐसे समय जारी रखा जब देश में असहिष्णुता का माहौल निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा था। सुमित ने अपने अभिकथन में लिखा है कि नफे और जिले के काल्पनिक पात्र के माध्यम से खोज जारी रखी। व्यंग्य में ऐसे कथोपकथन वाले पात्रों के माध्यम से चोट करने का अच्छा प्रयास है ।
युवा व्यंग्यकार सुमित ने आधुनिक घटनाओं का समावेश अपने संग्रह में किया है चाहे वह साइबर युग के राजा, एक पत्र साक्षी और सिंधू के नाम, एक पत्र माइकल फेल्प्स के नाम, वायरल होने की चाहत या एक पत्र सन्नी लियाॅन के नाम जैसे एक से बढ़कर एक शीर्षकों के साथ घटित तथ्यों पर कटाक्ष किया है। जिसमें एक पत्र आमिर खान के नाम से तत्समय की परिस्थितियों पर बेबाक व्यंग्य किया है। असहिष्णुता की बात कहकर आमिर खान ने ही विवाद को जन्म दिया था और उनके इस विवाद को लेखक ने बड़ी ही संजीदगी से पकड़ लिया। इसके अतिरिक्त क्षणिक लाभ लेनेवाले बुद्धिजीवियों द्वारा लौटाए जा रहे सम्मान ढकोसले को भी उन्होंने सार्थक रूप से फोकस किया है।
इस व्यंग्य संग्रह में सामाजिक और ऐतिहासिक पात्रों का भी संयोजन किया है कंस का प्रतिशोध, आरक्षण महाराज, सच्ची श्रद्धांजलि, फूफा बनाने की परम्परा अच्छे व्यंग्यों में माने जा सकते है । एक बात और सुमित पक्के पुलिसवाले हैं इसीलिए समाज में घटित होनेवाली किसी भी घटना को उसी निगाह से देखकर वे व्यंग्य के सांचे में ढाल लेते हैं। यह उनका सराहनीय कौशल है। ठीक उसी प्रकार पुलिस समाज की पहरेदार होती है और व्यंग्यकार भी समाज का पहरेदार होता है । सुमित दोनों में सामंजस्य या यूँ कहें कि सहिष्णुता का भाव बनाकर चल रहे हैं। थूकाचाटी, गंदी बात, काश! हम भी सम्मान लौटा पाते, अगले जनम में मोहे ठुल्ला ही कीजो, एक पत्र रायते के नाम, नौकरी बचाव यंत्र, एनकांउटर, भैया आँखों से घर तक छोड़के आओगे आदि मुकम्मल व्यंग्य है। सुमित महानगरीय सभ्यता में विगलित होती परम्पराओं एवं सामाजिक सरोकारों को अपनी पैनी निगाह से पकडने का सार्थक प्रयास कऱ रहे है। जहाँ व्यंग्य में चारित्रिक एवं परिवेश गत परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए लक्ष्य पर चोट की है, वहाँ ऐसे पात्रों को सिवाय मन-मसोसकर रहने के अतिरिक्त और विचार करने के अलावा कुछ नहीं बचता, तभी तो व्यंग्यकार को समाज-सुधारक भी कहा गया है।
पुस्तक : सहिष्णुता की खोज
लेखक: श्री सुमित प्रताप सिंह
समीक्षक - श्री रमाकान्त ताम्रकार, जबलपुर, म.प्र.
प्रकाशक: सी.पी. हाउस, रामा विहार, दिल्ली
पृष्ठ : 119
मूल्य : 160/-

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