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रविवार, 19 जून 2016

लघु व्यंग्य : माफ़ कीजिएगा पिता जी


   ज मैं रोज की तरह जल्दी नहीं उठ पाया। मजबूरी थी। रात को देर रात ड्यूटी करके लौटा तो देर तक सोना लाजिमी था। मतलब कि मैं अपनी नींद पूरी कर रहा था ताकि ड्यूटी पर न ऊँघूं और कर्मठता से अपने कर्तव्य का पालन कर सकूँ। जब मैं देरी से उठा तो मैंने रोज की तरह अपने माता-पिता के चरण छुए। हर बार की तरह माता-पिता ने मुझे मन ही मन आशीर्वाद दिया। फिर मैं नित्य कर्म करने चला गया। नहा-धोकर माँ के हाथों का बना स्वादिष्ट भोजन कर कुछ जरुरी काम निपटाकर मैं ड्यूटी को रवाना हो गया। ड्यूटी पर पहुँचकर सहकर्मी से पता चला कि आज तो पिता दिवस यानि कि फादर्स डे है। मुझे बहुत अजीब लगा कि क्यों नहीं मैंने आज अपने पिता चरणों को विशेष प्रकार से छुआ जिससे उन्हें आभास हो पाता कि आज उनका दिन है। कम से कम उन्हें तो मुझे बताना बनता ही था कि आज पिता दिवस है। आज सब लोग पिता दिवस मनायेगें। कोई वृद्धाश्रम में जाकर अपनी व्यस्त जीवनचर्या में से कुछ अमूल्य क्षण निकालकर अपने पिता के साथ फादर्स डे मनाकर अपने पुत्र होने के फ़र्ज़ को निभायेगा तो कोई भला मानव आज घर के एक कोने में अपने जीवन के अंतिम दिन गुजार रहे पिता को एक दिन ताज़ा और स्वादिष्ट भोजन खिलाकर अपने अच्छे बेटे होने का सबूत देते हुए मिल जाएगा। एक-दो सुसंस्कारी संतानें ऐसी भी होंगीं जो पिता दिवस के पावन अवसर का सदुपयोग करते हुए अपने पिता का अंगूठा इस्तेमाल कर उन्हें जमीन-जायजाद के झंझट से मुक्त कर पिता दिवस की सार्थकता सिद्ध करेंगीं। इन सबसे इतर मैं ड्यूटी करने के बाद आधी रात को घर पहुंचूंगा और सोते हुए पिता को जगाकर उनके चरण छूकर बोलूँगा, “माफ़ कीजिएगा पिता जी आज मैं पिता दिवस मनाना भूल गया।“ और मुझे यकीन है कि पिता जी मेरी इस बड़ी भूल पर मुझे माफ़ी देते हुए प्यार से मेरे सिर पर अपना हाथ फिरायेंगे। तब मैं खुश होकर अगले दिन ड्यूटी पर जाने के लिए बिस्तर पर जाकर फिर से ढेर हो जाऊंगा। 

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

बुधवार, 15 जून 2016

व्यंग्य : कलियुग का तीर्थ


   तीर्थयात्रा आरम्भ हो चुकी है। सभी तीर्थयात्री अपना लोटा-बाल्टी और सामान-सट्टा लेकर तीर्थयात्रा को निकल चुके हैं। अन्य पारंपरिक तीर्थों से इतर यह तीर्थ कलियुग में विशेष स्थान रखता है। सत्ता को पाने के लिए सत्ताप्रेमी माननीय महोदयों के लिए यह दंडवत होने के लिए अतिप्रिय स्थल है। हम जैसे कमअक्ल प्राणी भूलवश अथवा अज्ञानता से इसे झोपड़पट्टी अथवा स्लम एरिया के नाम से बदनाम करते रहते हैंजबकि कलियुग का सबसे पसंदीदा तीर्थस्थान फ़िलवक़्त तो यही है। बहरहाल आरम्भ हो चुकी इस तीर्थयात्रा के पूर्ण होने की सभी कुर्सी रुपी मछली की आँख पर अर्जुन की भांति धनुष पर बाण से निशाना लगाए हुए भले मानुष कामना कर रहे हैंकि काश ये तीर्थ यात्रा सफल हो जाये और उनकी नैया पार हो जाए। पारंपरिक तीर्थ यात्रा से बिलकुल हटकर है ये तीर्थ यात्रा। असल में ये कलियुगी तीर्थयात्रा है। ये तीर्थयात्रियों के घर अथवा दफ्तर से आरम्भ होकर कलियुगी तीर्थस्थान पर जाकर ही समाप्त होती है। इस तीर्थयात्रा में शामिल होनेवाले तीर्थयात्रियों के हृदय में पारंपरिक तीर्थयात्रियों जैसा ही तीर्थस्थान के प्रति श्रद्धा भाव होता है और उसमें अनेकों सपने पलते हुए जवान होने की राह तक रहे होते हैं। अन्य तीर्थयात्राओं की तरह ये तीर्थयात्रा हर वर्ष या किसी निश्चित समय पर नहीं होती। ये तो हर पाँच साल में एक बार देश के विभिन्न स्थानों में आयोजित की जाती है। हाँ यदि कुछ गड़बड़ हो जाए तो ये जल्दी-जल्दी भी आयोजित होती रहती है। इस तीर्थ यात्रा में जो भी यात्री तीर्थस्थान और वहाँ निवास करनेवाले प्राणियों को अधिक से अधिक चढ़ावा चढ़ाएगा और अधिकाधिक  सेवा भाव प्रदर्शित करेगा कृपा उसी को प्राप्त हो पाएगी। हर तीर्थयात्री तीर्थस्थान में स्वयं को अन्य तीर्थयात्रियों से अधिक भक्त सिद्ध करने का प्रयास करेगा। देश में मौजूद अन्य तीर्थों को बेशक आँच आए अथवा उन्हें इस धरा में विलीन कर दिया जाए, लेकिन कलियुगी तीर्थ का कोई बाल-बाँका भी नहीं कर सकता। भक्तजन अपनी जान की परवाह किये बिना इस तीर्थ को बचाने की खातिर बुलडोजर के आगे तक लोटने को तत्पर रहते हैं। अब ये और बात है कि अपनी जान की सबसे अधिक परवाह इन्हें ही होती है। इनके लाख चाहने के बावजूद प्रकृति इनके तीर्थस्थानों पर विपदा भेजती रहती है। कभी-कभी भक्तजन भी प्रकृति का नाम लगाकर स्वयं भी विपदा उत्पन्न करते रहते हैं। इस बहाने उन्हें तीर्थयात्रा का अवसर प्राप्त हो जाता है। हालाँकि  कलियुगी तीर्थ के वासियों को वंचित कहा जाता हैकिन्तु इन वंचितों के चरण चाटनेवालों की संख्या को देखकर अक्सर मन में प्रश्न उछल-कूद मचाने लगता है कि वंचित कलियुगी तीर्थ के वासी हैं या फिर ये तीर्थयात्रीकुछ समय के लिए ही सही किन्तु तीर्थवासी वंचित से संचित और तीर्थयात्री संचित से वंचित की श्रेणी में परिवर्तित हो जाते हैं। यह अल्पका तीर्थ के निवासियों के लिए खुशनुमा होता है और एक अलग ही अनुभूति से भरा हुआ होता है। इस छोटे से काल में उनके इर्द-गिर्द दुःखपीड़ाअभाव एवं परेशानी जैसे कलियुगी गुण फटकने से भी हिचकते हैं। उनकी सारी कठिनाईयों एवं दिक्कतों को तीर्थयात्री अपने सिर-माथे पर ले लेते हैं। और फिर एक दिन ऐसा आता है जब तीर्थयात्री तीर्थ के निवासियों के पास संचित वोट नामक धन हथियाकर चंपत हो जाते हैं। इस प्रका तीर्थ के निवासी अचानक संचित से वंचित में परिवर्तित हो जाते हैं और लुटी-पिटी अवस्था में फिर से वंचित से संचित होने की प्रतीक्षा करते हुए आगामी अच्छे दिनों के दिवास्वप्न में खो जाते हैं।
 लेखक : सुमित प्रताप सिंह 


चित्र गूगल से साभार 

गुरुवार, 9 जून 2016

लघुकथा : वो सिपाही



   कार में जा रहे प्रेमी युगल में से प्रेमिका ने जब जून की तपती दोपहर में सड़क पर पिकेट पर खड़े सिपाही को देखा तो प्रेमी से कहा, "डार्लिंग देखो तो कितनी गर्मी हो रही है और ये सिपाही इस गर्मी में भी रोड पर खड़ा हुआ है।"
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डिअर ये अपनी ड्यूटी कर रहा है।" प्रेमी ने समझाया।
प्रेमिका बोली, "वो तो ठीक है। पर यार सोचो तो सही। टेम्परेचर 46° से ऊपर हो रखा है। न तो इसके आसपास पानी का इंतजाम है और न ही ऐसी कोई जगह जहाँ ये कुछ देर के लिए छाँव में जाकर सुस्ता ले। यार ये लोग इतनी गर्मी कैसे सह लेते हैं। अगर ए.सी. न हो तो मैं तो कुछ पलों में गर्मी के मारे मर ही जाऊँ।"
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स्वीट हार्ट जैसे हम लोग सुविधाओं के आदी हो चुके हैंवैसे ही ये पुलिसवाले दुविधाओं के आदी हो चुके हैं। खैर हम भी कहाँ इन फालतू लोगों के चक्कर में पड़ गए। वैसे एक बताऊँ आज तुम बहुत हॉट लग रही हो।" प्रेमी ने रोमांटिक होते हुए कार को तेजी से उस सिपाही के बगल से निकालते हुए कहा।
प्रेमिका हर बार की तरह शरमाई नहीं, बल्कि हॉट शब्द को सुनते ही उसको अपने सामने पसीने से सनी वर्दी पहनेगर्मी से तमतमाए चेहरे और प्यास से सूख रहे गले संग उस तपती दोपहर में जलती सड़क पर ड्यूटी दे रहा पीछे छूटा वो सिपाही नज़र याद आने लगा।


लेखक : सुमित प्रताप सिंह


बुधवार, 1 जून 2016

लघु व्यंग्य : तलाश



    गोवंश उदास हो तलाश कर रहा है असहिष्णुता का ढिंढोरा पीटनेवाले उन महानुभावों को जो पिछले दिनों कुछ अधिक ही सक्रिय रहे। वे खूब चीखे, चिल्लाए और विधवा विलाप कर अपनी छातियाँ पीटते हुए असहिष्णुता मन्त्र का जाप करते रहे। उन्होंने अपना सारा दमखम लगा दिया सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने में। अन्याय से मुँह फेरकर न्याय का नारा लगाते हुए ही उनके दिन और रात बीते। और आज जब सच सामने आया तो उन न्याय प्रेमियों में से कोई चूँ भी नहीं कर रहा है। सभी के सभी अपने-अपने बिलों में घुसकर मौन व्रत धारण किए हुए हैं। असहिष्णुता भी अपने प्रेमियों की तलाश में काफी दिनों से परेशान है। सहिष्णुता असहिष्णुता को ढाँढस बँधा रही है कि वो उदासी को त्याग दे क्योंकि वक़्त आने पर वे सभी महानुभाव अपने-अपने बिलों से बाहर निकलेंगे। तब फिर से असहिष्णुता की पूछ होगी। और उस समय सहिष्णुता को मृत घोषित कर उसको फिर से जीवित करने की माँग उठाने हेतु किसी सभा अथवा मार्च का आयोजन किया जाएगा। फिर उस सभा अथवा मार्च की सफलता के उपलक्ष में एक शानदार भोज का आयोजन किया जाएगा, जहाँ थालियों में गोवंश छिन्न-छिन्न रूप में मेजबानों की सेवा में ससम्मान प्रस्तुत किया जाएगा। यह देख असहिष्णुता अपनी तलाश सफल होने पर खिलखिलाएगी और सहिष्णुता बेबस हो गोवंश के गले से लगकर आँसू बहाएगी।



लेखक : सुमित प्रताप सिंह

चित्र गूगल से साभार 


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