शनिवार, 30 अप्रैल 2016

व्यंग्य : उनके जन्मदिवस पर


    ज हमारी सांसद का जन्मदिवस है। अब आप सोचेंगे कि मैं बहुत जागरूक मतदाता हूँ जो अपनी सांसद के जन्म की तिथि तक याद रखता है। ऐसा कुछ भी सोचकर आप सिर्फ और सिर्फ अपने मस्तिष्क की ऊर्जा ही नष्ट करेंगे। मैं भी उसी अधिकांशतः भारतीय जनता का एक अंश हूँ जिसके बाप-दादाओं ने जागरूक शब्द से शायद जानबूझकर दुश्मनी रखी। जिसका फल ये मिला कि दुनिया के बाकी देश तरक्की कर गए और हमारा देश तरक्की की खोज में अब तक घूम रहा है।
अच्छा अब आपको बातों में अधिक न उलझाकर सीधे-सीधे बता ही दूँ कि मुझे अपनी सांसद के जन्मदिन की तिथि कैसे मालूम हुई। असल में मैं अपने संसदीय क्षेत्र में बहुत दिनों बाद चहलकदमी करने गया था तो मुझे जगह-जगह सांसद महोदया को उनके जन्मदिन की बधाई देते हुए पोस्टर मुस्कुराते हुए मिले। उन पोस्टरों में हमारी सांसद महोदया का मुस्कुराता हुआ एक विशाल सा चित्र था और उन्हीं के ठीक नीचे उन पोस्टरों को संसदीय क्षेत्र की जनता तक पहुँचाने का पावन कार्य करनेवाले सांसद महोदया के दल के कुछ भले सेवकों के चित्र भी मुस्कुरा और खिलखिला रहे थे। मैं उन पोस्टरों को देखकर मुस्कुरा दिया। पोस्टर भी मुझे देखकर मुस्कुरा दिए। मुझे लगा कि शायद पोस्टर कहना चाह रहे थे कि हे मतदाता अपने सांसद के अपने संसदीय क्षेत्र में न दिखाई देने की शिकायत दूर कर और पोस्टर के माध्यम से उनके दिव्य दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त कर। और मैंने झट से पोस्टर के माध्यम से अपने क्षेत्र में प्रकट हुईं सांसद महोदया को नमन करते हुए जन्मदिन की शुभकामनायें दे डालीं।
वैसे मैंने अपने क्षेत्र के निवासियों की भाँति अपने विधायक को भी तस्वीरों में ही देखा है। विधायक जी सांसद महोदया के विरोधी दल के हैं, लेकिन उन दोनों में एक बात सामान्य है। वो दोनों ही अपने-अपने कर्मक्षेत्र से दूर रहने का आनंद उठाते रहते हैं। हमारे एक निगम पार्षद भी हैं। उनका दल सांसद व विधायक के दल का घोर विरोधी है और उनके दल का शीर्ष नेतृत्व पानी पी-पीकर सांसद व विधायक के दलों को दिन-रात कोसता रहता है और राजनीतिक तूफ़ान में खंडहर हुए अपने महल की दिन-रात मरम्मत करता रहता है। हमारे पार्षद जी हमारी सांसद और हमारे विधायक से थोड़ा हटकर हैं। वो अक्सर दिखते रहते हैं। हमारे क्षेत्र की झोपड़पट्टी में तो वो आए दिन समय-असमय प्रकट होते रहते हैं। बाकी जगह वो कभी-कभार ही जाते हैं। बात ये है कि वोट रुपी धन का अकूत भंडार झोपड़पट्टी में ही मिल सकता है इसलिए वो यहाँ हाजिरी लगाना कभी नहीं भूलते। उनकी नियमित हाजिरी का सबूत देती हुईं यहाँ कुछ वर्षों में अचानक से बढ़ी झुग्गियों की संख्या व फुटपाथ की छाती पर मूँग दलती हुईं सैकड़ों रेहड़ियाँ मिल जाती हैं। पार्षद जी के मतानुसार  झोपड़पट्टी का वोट रुपी खजाना उनके दल का पारंपरिक खजाना है। जबकि समय के फेर ने इस खजाने के मालिकों का दिमाग भी लोमड़ी सा कर दिया है और हो सकता है कि आनेवाले समय में ये पारंपरिक खजाना जाने किसके हाथों स्वयं ही लुट जाए और लुटते हुए बेशर्मी से खिलखिलाए?
                                         
लेखक : सुमित प्रताप सिंह


मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

पुस्तक समीक्षा : सावधान! अब पुलिस मंच पर भी है


‘सावधान! पुलिस मंच पर है’  यह सुनकर पाठकगण डरें नहीं, क्योंकि यह मात्र एक पुस्तक का नाम है,  जो कि व्यंग्य कविताओं का संग्रह है और इसके रचनाकार हैं युवा कवि और लेखक सुमित प्रताप सिंह। इस कविता संग्रह में कटाक्ष करती हुईं  कुछ कविताएँ खड़ी बोली हिन्दी की हैं और कुछ कविताएँ  ग्रामीण भाषा के लबादे में हैं।   इस संग्रह में संकलित  व्यंग्य कविताएँ काफी रोचक और सजीव हैं कि पढ़ते हुए मानस पटल पर एक छायाचित्र खींचने में सफल होती हैं। अधिकतर कविताएँ सामाजिक विषयों पर आधारित है। मुसीबतों के आने पर पर हमारा समाज पुलिस पर ही आश्रित होता है। कवि के अनुसार पुलिस की भूमिका और कर्तव्य इस कदर बढ़ चुके हैं, कि पुलिस को अब मंचों को भी सम्भालना होगाऔर उसकी मर्यादा की रक्षा के लिए तत्पर रहना पड़ेगा। इस संग्रह की पहली कविता लोक सभा चुनाव के दौरान लिखी गयी थी। कवि ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से देश के अच्छे भविष्य की उम्मीद की आशा के साथ इस कविता को लिखा है। हालांकि पहली कविता से मोदी विरोधी थोड़े और नाराज हो सकते हैं, क्योंकि उनकी नाराजगी तभी से आरंभ हो चुकी होगी जब उन्होंने पुस्तक का समर्पण पृष्ठ खोलकर देखा होगा, क्योंकि कवि ने अपने इस कविता संग्रह को देश के प्रधानसेवक श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को सादर समर्पित किया है।
           कविता संग्रह की दूसरी कविता "कवि घंटाल" आज के लेखक समुदाय पर करारा प्रहार करती है। आज का लेखक क्या सोचता है उसकी मानसिकता कैसी है? वह खुद में स्वयंभू है और सम्मान पाने के लिये किस तरह से सांठ-गांठ करता है इस पर एक दृष्टि कविता की निम्न पंक्तियों के माध्यम से डालिएगा : -
"हमने लिख लईं कविता चार
अब करनो है इनको प्रचार
दुय-चार हमें सम्मान दिलाय देओ
किनके पांव छूने बताय देओ
मालिश करनी तो बऊ करएँ
पदमश्री तक हम नहीं टरएँ
आओ एक- दूजे की पीठ खुजाएँ
मिल-जुल के आगे बढ़ जाएँ।
यकीनन उपरोक्त पंक्तियाँ आज के परिप्रेक्ष्य में एक ऐसी सच्चाई है जिसको समाज जानते हुए भी स्वीकार करने से परहेज करता है। इस संग्रह की यह कविता मुझे बेहद पसंद आयी। चूंकि कवि पुलिस विभाग में कार्यरत है तो इसकी रचनाओं में इसका असर भी दिखता है। कवि समाज और पुलिस दोनों की भूमिकाओं को तीसरी नजर से देखता और कम शब्दों में तीखे बाण तानता हुआ दिखा। कवि का पुलिसिया अनुभव भी इसकी कविताओं जगह बनाने में कामयाबी पाता है। जहाँ ये कविता के माध्यम से जेबकतरों से डरवाने के साथ-साथ सतर्क भी करता है। कवि कटाक्ष करने हेतु कहीं देवदास बन बैठा है तो कहीं बिंदास लड़का। असहिष्णुता की आड़ में राजनीति करने वाले साहित्यकार भी कवि की व्यंग्य दृष्टि  से बच नहीं पाए। सम्मान लौटाने की उत्कंठा इतनी कि उसके मन में विचार आता है : -
"हम अपुरस्कृत लोग
दुख व पीड़ा से
उदास और बेचैन हो
अक्सर छटपटाते
काश!
हम भी सम्मान लौटा पाते।
इन पंक्तियों को पढ़कर कवि की मानसिक छटपटाहट को महसूस कर सकता है कि वह क्या सोचता है? कविताओं के अगले क्रम में ही एक कविता शीर्षक है "विनती सुन लो भगवान" जो कि देश में मँहगाई की समस्या पर लिखी गई है। टमाटर और प्याज के बढ़ते दामों से कवि इतना प्रभावित है कि वह अगले जनम खुद ही टमाटर और प्याज बनने की प्रार्थना भगवान से कर बैठता है।
           संग्रह की एक कविता " होली तो हो ली" समाज व हमारे तीज-त्यौहारों पर  सोशल मीडिया किस तरह से काबिज़ हो चुका है इस पर कवि ने इस कविता के द्वारा जोरदार व्यंग्य कसा है। यह एक ऐसा कविता संग्रह हैं जिसमें पाठक को हर क्षेत्र व विषय पर हँसातीं और गुदगुदातीं रचनाएँ मौजूद हैं। चूंकि व्यंग्य एक ऐसी विधा है जिसके माध्यम से बड़े से बड़े गम्भीर मुद्दों पर चोटिल प्रहार किया जाता है । कवि ने समाज में व्याप्त छोटे-छोटे मुद्दों को भी बड़ी संजीदगी से उठाया  है और उठाकर आराम -आराम से धो-धो कर पछाड़ा है। अलबत्ता  इस संग्रह को मैं व्यंग्य कविताओं का मिक्स वेजिटेबल नाम देती हूँ जो थोड़ा मीठा-नमकीन और थोड़ा तीखा है। जिसको पढ़कर आपको भी उतना ही आनंद आयेगा जितना कि मुझे आया। समाज में व्याप्त अनियमितताओं, कुरीतियों व विद्रूपता को इस कविता संग्रह में इतने अच्छे ढंग से रखा गया है कि पाठकगण का ध्यान संग्रह पढ़ने के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर विचार- विमर्श के लिए बाध्य करेगा है। सुमित प्रताप सिंह को इस कविता संग्रह हेतु हार्दिक बधाई एवं उज्जवल भविष्य हेतु शुभकामनाएँ!
पुस्तक -  सावधान!पुलिस मंच पर है।
लेखक-   सुमित प्रताप सिंह
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, उ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य -  200 रुपए
समीक्षक - शशि पाण्डेय, नई दिल्ली।
इस पुस्तक को आप निम्न लिंक पर क्लिक करके Online भी मँगवा सकते हैं : -

रविवार, 24 अप्रैल 2016

व्यंग्य : भेड़िया आया


    पुलिस कंट्रोल रूम में ड्यूटी पर चाय की चुस्कियाँ लेते हुए जिले अपने सहकर्मी नफे से बोला, "भाई नफे! वो औरत कौन सी थी जो आए दिन झूठी कॉल करके हम पुलिसवालों का जीना हराम किए हुए थी?"
"
अरे भाई जिले! तूने भी सुबह-सवेरे किस मनहूस का जिक्र छेड़ दिया। उस औरत ने तो 100 नंबर को गॉसिप करने वाला नंबर बना लिया था। सुबह-शाम जब जी करे फोन मिला देती थी।" नफे ने नाराजगी से कहा।
जिले ने समझाया, "भाई शायद उसके दिमाग में कोई दिक्कत रही होगी?"
"
मुझे तो वो सनकी और पागल ही लगती है। कभी-कभी तो वो हम पुलिसवालों को इतनी गन्दी और भद्दी गालियाँ बकती है कि किसी को बताने में भी शर्म आती है।" नफे गुस्से में बोला।
जिले ने चाय का आखिरी घूँट सुड़कते हुए कहा, "भाई वो औरत ही क्यों पब्लिक में बहुत से ऐसे सिरफिरे हैं जो किसी न किसी बहाने 100 नंबर मिलाकर पुलिस की माँ-बहन एक करने से गुरेज नहीं करते हैं। जैसे कि हम उनकी भैंस चुराकर ले आए हों। इन सिरफिरों को ऐसा लगता है जैसे कि सारे ऐब हम पुलिसवालों में ही भरे हुए हैं और ये तो साक्षात् संत के रूप में ही इस धरती पर उतरें हैं। भाई अगर 100 नंबर पर कॉल करने के पैसे कटने लगें तो इनका एक भी फोन न आए।"
"
सही कहा भाई। और यही बात परसों मैंने उसको बोली भी थी कि मैडम फ्री की कॉल है इसलिए तुम भी मजे ले रही हो। कभी इस बारे में सोचना कि जब तुम्हें वाकई में पुलिस की जरुरत पड़ेगी न तब पुलिस ये सोचकर तुम्हारी मदद को नहीं आएगी कि ये औरत तो झूठी कॉल करके फिरकी लेती है। और हाँ मैंने उसे बचपन में सुनी भेड़िया आया भेड़िया आया चिल्लाने वाले झूठे बच्चे की कहानी भी सुनाई थी और उस कहानी से उसको सबक लेने को कहा था।" नफे ने बताया।
जिले ने गंभीर हो पूछा, “तो भाई उस औरत ने उस झूठे लड़के की कहानी से सबक लिया या नहीं?”
नफे मंद-मंद मुस्कुराया, "सबक! भाई ये शब्द किसी जमाने में हमारे शब्दकोष में हुआ करता था, लेकिन अब तो इस शब्द से शायद इस युग के प्राणियों ने दुश्मनी मोल ले ली है और खासकर इस शहर के लोगों ने।“
जिले ने झल्लाते हुए कहा, “भाई मेरी तो समझ में नहीं आता कि ये लोग हमसे ऐसा व्यवहार करते क्यों है?"
"
भाई इन लोगों ने अपने दिमाग में एक ही बात भर रखी है कि पुलिसवाले ठीक नहीं होते। देखा जाए तो हर विभाग में अच्छे और बुरे लोग मौजूद हैं। इसमें पुलिस ही अपवाद नहीं हैं।" नफे शिकायती लहजे में बोला।
जिले बोला, "भाई बात तो तेरी ठीक है। इन लोगों का पुलिस के प्रति ये उदासीन रवैया अपराधियों के हौसले बुलंद किए हुए है। अपराधी इन लोगों की आड़ में पुलिसवालों के साथ मारपीट तक करने से बाज नहीं आते।"
"
और जब अपराधियों के साथ पुलिस कड़ी कार्यवाही करे तो ये लोग ही उनके रक्षक बनकर खड़े हो जाते हैं।" नफे ने कहा।
जिले नफे की बात का समर्थन करते हुए, "फिर एक दिन ऐसा भी आता है जब ये अपराधी ही अपने रक्षक बने इन लोगों की ऐसी-तैसी करने से बाज नहीं आते।"
"
तब ये भले लोग ही अपनी छाती पीटते हुए शिकायत करते हैं कि पुलिस अपराधियों को संरक्षण देती है। अब ये और बात है कि जनता में मौजूद ये भले लोग ही ही पुलिस के हाथ बाँधने के लिए उत्तरदायी है।" नफे खिलखिलाया।
जिले बोला, "अब ये बात इन भले लोगों को भला कौन समझाए?"
"
भाई वक़्त की मार कभी न कभी अपने आप समझा देगी।" नफे ने घोषणा की।
जिले ने पूछा, "खैर छोड़ इस बात को। तू ये बता कि कल रात को उस औरत का फिर से फोन आया था या नहीं?"
"
आया था। भाई कुत्ते की पूछ कभी सीधी हुई है? कल वो खूब फोन मिलाती रही पर मैंने उसका फोन उठाया ही नहीं। परसों उसने गालियों की इतनी खेप दे दी थी कि कई दिनों का कोटा पूरा हो गया था। और यार वैसे भी कल मेरा जन्मदिन था और अपने जन्मदिन पर उस पागल औरत की भद्दी गालियाँ काहे को सुनता?" नफे ने बेफिक्री से कहा।
जिले बोला, "भाई तेरी बात सही निकली। कल वाकई में भेड़िया आ गया।"
"
मैं तेरी बात का मतलब नहीं समझा।" नफे ने हैरान हो कहा।
जिले ने गंभीर हो बताया, "कल रात उस औरत के घर में घुसकर कुछ लोगों ने लूटपाट की और उसे जान से मार दिया। ये देख अख़बार में उस औरत के घर हुई लूटपाट की खबर छपी हुई है।"
यह सुन नफे ने जिले से हड़बड़ाहट में अख़बार लिया और बेचैनी से अख़बार में छपी उस खबर को पढ़ने लगा।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

कुछ अनोखी है ‘सावधान पुलिस मंच पर है’


सावधान पुलिस मंच पर हैजितना अनोखा इस पुस्तक का नाम है, उतनी ही सावधानी रचनाकार ने कविताओं के चयन में की है। सुमित प्रताप सिंह अब सिर्फ नाम नहीं, अपितु व्यंग्य जगत में युवा रचनाकारों में जाना-माना चेहरा बन चुका है और यह बात कहने में मुझे कतई संकोच महसूस नहीं हो रहा है। मैं सुमित को तबसे जानती हूं, जब उनकी पहली किताब पुलिस की ट्रैनिंग, मुसीबतो की रेनिंगप्रकाशित हुई थी। आज इस बात को करीब 10 साल हो गए हैं और तब से लेकर अब तक सुमित की लेखन शैली में जो बदलाव आया है उसे देख मुझे हर्ष की अनुभूति होती है। अपनी रचनाओं में व्यंग्य के स्तर को सुमित ने किस स्तर पर पहुंच दिया है, उसका अंदाजा सावधान पुलिस मंच पर हैको पढ़कर सहज लगाया जा सकता है।
सुमित की शुरू से खासियत रही है कि वो हमारे आसपास हो रहे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देखते व परखते हैं और फिर उसे कविता, कहानी अथवा व्यंग्य के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। सावधान पुलिस मंच पर हैमें भी उन्होंने कुछ ऐसा ही करने का प्रयास किया है, जिसमें वो काफी हद तक सफल भी हुए हैं। कहीं उन्होंने गंभीर विषय को चुटीले अंदाज में कहकर एक तरफ तो उस पर कटाक्ष करते हैं तो दूसरी तरफ पाठक को उस विषय पर सोचने को लिए विवश करते हैं। इस काव्य संग्रह की भाषाशैली भी ऐसी है, जो पाठकों को अपने साथ जोड़े रखने में मदद करती है, साथ ही उनकी कविताओं का मर्म को समझने में दिमाग के घोड़े नहीं दौड़ाने पड़ते। अगर युवाओं की बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि उनका साहित्य खासकर हिंदी कविताओं से मोह भंग हो रहा है, लेकिन सुमित सावधान पुलिस मंच पर हैके जरिए युवाओं को एक बार फिर से इससे जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। अब इस जरा इस कविता पर गौर कीजिए
तू लड़की झकास, अपुन लड़का बिंदास,
तेरी आंखें कुछ खास, अपुन हो गया खल्लास।
बड़ी मस्त तेरी बोली, तुझे देख नीयत डोली,
मेरे दिल की खाली खोली, आ खेलें प्यार की होली।
तू पाव अपुन वड़ा, तेरे वेट में कबसे खड़ा,
तेरे वास्ते सबसे लड़ा, तुझ बिन लाइफ बिल्कुल सड़ा।
अब इस भाषा शैली को आप क्या कहेंगे। बेशक इस कविता में जो वाक्य विन्यास है और जिन शब्दों का प्रयोग किया गया है, संभवत: वो हिंदी साहित्य के मानकों पर इतर हो, लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इससे युवा वर्ग जरूर आकर्षित होगा और कविता पढ़ने पर मजबूर होगा। इसे पढ़कर वह यही सोचेगा कि अरे ये तो मेरे ही शब्द और भावनाएं हैं और अगर रचाकार ऐसा करने में सफल होता है तो यह न सिर्फ उसकी, अपितु हिंदी साहित्य जगत की जीत होगी। अगर युवा पीढ़ी इस माध्यम से एक बार फिर हिंदी कविता व कहानियों की ओर आकर्षित होती है तो उसमें हर्ज ही क्या है। बड़े बुजुर्ग कहते भी हैं कि अगर हाजमा खराब हो तो कुछ हल्का-फुल्का आजमाना चाहिए। सुमित इस कॉम्बो पैकेज में यही करने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह के प्रयोग कई वरिष्ठ लेखक भी कर चुके हैं और वो उसमें सफल भी रहे हैं।
इस काव्य संग्रह से प्रभावित होने के और भी कई कारण रहे हैं। उनमें से एक यह है कि सुमित ने इस समाज में खत्म होती जा रही संवेदना को झकझोरने का प्रयास किया है। उसकी एक बानगी अच्छा है बकरापनकविता में झलकती है। इस कविता की निम्न पंक्तियों पर ध्यान दें : -
अबे ओ गुच्चन!
तूने बना डाला मुझे रंडवा,
मेरे सामने ही बेचा
मेरी बकरी रानी का एक-एक खंडवा,
आ आ मुझे काट,
जितने चाहे टुकड़ों में ले बांट,
तभी पड़ोस के फ़ज़लू ने आकर बताया,
इलाके में हो गया है दंगा,
सेना ने कस लिया शिंकजा,
मुसलमानों ने मंदिरों में और
हिंदुओं ने मस्जिदों में लगा दी है आग,
यह सुन गुच्चन की दुष्ट आत्मा गई जाग,
उसने अपने बचपन के यार,
सूरज पंडित को जाकर दो भागों में बांट दिया,
सूरज के बेटे ने आकर,
गुच्चन को बीच से काट दिया।
आगे की पंक्तियां देखिए कैसे लेखक शून्यहीन हो चुके समाज पर चोट करता है : -
अब मुझे दुख नहीं कि मैं बकरा पैदा हुआ,
हम इन इंसानों से अच्छे हैं,
इनसे कई गुना सच्चे हैं,
कभी कोई बकरा या मुर्गा,
किसी दूसरे बकरे या मुर्गे को
काटता, लूटता या जलाता नहीं,
आज मुझे हुआ यह अहसास है,
मुझे अपने बकरेपन पर नाज है।
सुमित ने इस कविता के जरिए खंड-खंड होते सामाजिक मुद्दों को इतनी सहजता व सरलता से उठाया है कि हमें सोचने पर विवश हो जाते हैं हम किस तरह की दुनिया का निर्माण कर रहे हैं और आने वाली पीढ़ी को विरासत में क्या देकर जाने वाले हैं। इस कविता ने मेरे वजूद पर सवाल खड़ा कर दिया तथा साथ ही साथ सामाजिक मूल्यों को समझने की एक नई शक्ति दी। इतना ही यह उन लोगों के गाल पर करारा तमाचा है जो कहने को तो इंसान हैं, लेकिन व्यवहार के मामले में बकरापन उनसे कहीं बेहतर है। यहां मैं ये जरूर कहना चाहूंगा कि अगर हम सभी इंसानीयत न सही बकरेपन पर ही उतर आए तो शायद एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकें।
एक और कविता का जिक्र करने से खुद को नहीं रोक पा रही हूं। आओ जलाएं रावणपननामक कविता मुझे इसलिए भी प्रिय है, क्योंकि हम कभी अपने अंदर की मैल व बुराइयों को उजागर नहीं होने देते और फिर धीरे-धीरे वो हम पर इतना हावी हो जाती है कि हम उसके हाथों कठपुतली बन जाते हैं।
जरा निम्न पंक्तियों पर गौर करें : -
हमने एक सेठजी से पूछा
राम ने रावण को क्यों मारा?
लालाजी कुछ कहिए,
सेठजी इतराकर बोले- रावण था बड़ा घमंडी,
इसलिए राम से मारा गया पाखंडी।
इतना कहकर सेठजी ने
अपने बगल में खड़े
फटेहाल मानव को घूरा और
अपने शाही कपड़ों पर इतराते हुए
भीड़ में गुम हो गए।
अब इन पंक्तियों पर ध्यान दें : -
अबकी बार हमने मुल्ला जी से पूछा,
जनाब राम ने रावण को हलाक क्यों किया?
मुल्लाजी अपना पान से भरा
मुंह खाली करते हुए बोले
हुजूर जहां तक हमने
अपने हिंदू दोस्तों से सुना है कि
रावण था बड़ा लालची और
करता था लंका पर राज
जनाब राम ने उसे मारकर ठीक किया।
यह कहते-कहते मुल्लाजी की नजर
अपने पैर के बगल में पड़े
एक रुपये के सिक्के पर पड़ गई
वहीं मुल्ला जी की नीयत बिगड़ गई,
जूता का फीता बांधने के बहाने नीचे झुके
और रुपया उठाने के बाद
वहां एक पल भी नहीं रुके।

सुमित की लेखनी उसी प्रकार है, जो हमारा मनोरंजन तो करती है, साथ ही उस पथ प्रदर्शक की तरह भी है, जो राह भटक चुके दृष्टिहीन का हाथ पकड़ पथ प्रदर्शन करती है। साथ ही मुझे यह कहने में भी बिलकुल हिचक महसूस नहीं हो रही कि यह तो सुमित के लिए प्रारंभ भर है। अभी तो उन्हें लंबा सफर तय करना है। साथ ही हिंदी व्यंग्य का स्तर इतना ऊंचा करना है कि वो आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल कायम कर सके।

पुस्तक - सावधान! पुलिस मंच पर है।
लेखक- सुमित प्रताप सिंह
प्रकाशक- हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर, उ.प्र.
पृष्ठ - 104
मूल्य - 200 रुपये
समीक्षक : दीपा जोशी, रोहिणी, दिल्ली।


रविवार, 17 अप्रैल 2016

बाबा के चरण



"दद्दू गजब हो गया।" घीसू भागता हुआ आया।
दद्दू ने घबराते हुए पूछा, "क्या हुआ बेटा?"
"
दद्दू बाबा के चरणों में जगह-जगह छेद हो गए हैं।" घीसू ने दुखी हो बताया।
दद्दू भी दुखी हो गए, "बेटा अभी कुछ रोज पहले तो बाबा के चरण ठीक-ठाक थे। ये अचानक छेद कैसे हो गए।"
"
दद्दू बाबा के जन्मदिन पर उनकी मूर्ति के सामने पूरे दिन भक्तों की भीड़ लगी रही। हर कोई अपने को बाबा का सबसे बड़ा भक्त सिद्ध करने की होड़ में  था।" घीसू बोला।
दद्दू मुस्कुराए, "अच्छा ऐसी बात है?"
"
हाँ दद्दू! इस होड़ में हर कोई बाबा के चरण चाटना शुरू करता था तो तब तक चाटता ही रहता था जब तक कि लाइन में लगा दूसरा भक्त अपनी बारी की याद न दिलाए।"
दद्दू ने पूछा, "पुराने भक्त ही आए थे या फिर कुछ नए भी?"
"
पुराने भक्त तो सबसे पहले आए और सबसे बाद में ही गए। कुछेक नए भक्त भी आए थे पर पुराने भक्तों ने अपने पुराने होने के कारण बाबा पर अपना अधिकार दिखा उन्हें बाबा के चरण छूते ही एक ओर बिठा दिया और खुद बार-बार बाबा के चरण चाटने में लगे रहे।" घीसू बोला।
दद्दू ने समझाया, "तो बेटा उन्हें बोलना था न कि बाबा के चरणों को आराम से चाटें। अगर तुम्हारी बात नहीं मान रहे थे तो मुझे ही बुला लेते।"
"
मैंने उन्हें बोला था पर उन्होंने मुझे डपट दिया और बोले कि वो लोग हम लोगों के कल्याण के लिए कार्य आरम्भ करने के लिए बाबा का आशीर्वाद ले रहे हैं। और रही बात आपको बुलाने की तो आपकी तबियत वैसे भी ठीक नहीं थी ऊपर से अगर आप बाबा के भक्तों की हरकतें देख लेते तो जाने क्या होता?" घीसू बोला।
दद्दू ने तंज कसा, "इतने दशक बीत गए अब तक तो हम लोगों का उन्होंने कल्याण नहीं किया अब क्या ख़ाक करेंगे। अच्छा हमारी सबसे बड़ी शुभचिंतक आयीं थीं या नहीं?"
"
आयीं थीं और चीख-चीखकर सभी भक्तों से कह रहीं थीं कि बाबा सिर्फ और सिर्फ उनके हैं। लेकिन उनके भारी बटुए ने उन्हें अधिक देर संघर्ष नहीं करने दिया। सो विवश हो बाबा के बगल में वो स्वयं भी इस आस से अपना बटुआ खोलकर बुत बनकर खड़ी हो गयीं कि शायद कोई भक्त आकर उनके बटुए में दक्षिणा डालकर उनके भी चरण चाट ले।"
दद्दू यह सुन खिलखिला उठे, "हा हा हा वो भरे बटुए और बुत के बिना शायद रह भी नहीं सकतीं। खैर चल उठ अपना काम शुरू करते हैं।"
"
कौन सा काम दद्दू?" घीसू ने हैरानी से पूछा।
दद्दू ने तसला उठाया और उसे सिर पर रखते हुए बोले, "गाँव के किसी घर से कुछ सीमेंट माँगकर लाते हैं, ताकि बाबा के पैरों में हुए छेदों को भरा जा सके जिससे कि बाबा के भक्त अगली बार भी उनके चरण पूरे भक्ति भाव से चाट सकें।"
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 

रविवार, 10 अप्रैल 2016

मेरे जन्मदिन का तोहफा


    ज मेरा जन्मदिन है औरों की तरह मैं प्रफुल्लित नहीं हूँ, कि आज मेरा जन्मदिन है मैं औरों की भांति यह भी नहीं सोच रहा कि मैं कोई महान व्यक्ति हूँ इसलिए सभी को मेरा जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाना चाहिए और मेरे घर का कम से कम एक कमरा तो तोहफों से भर देना चाहिए, न ही मेरे मन में आत्ममोही भले मानवों की तरह ये ख्याल आ रहा है, कि भविष्य में मेरे सम्मान में फर्लो मारने के लिए मेरे जन्मदिन पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाए सच कहूँ आज जब मैं सुबह सोकर उठा तो मैं बहुत उदास था अब उदास होता भी क्यों न अरे भाई आज के दिन मैं एक साल और पुराना हो गया हूँ बेशक लोग इस गम को छुपा जाते हों और ऊपरी मन से अपने जन्मदिवस पर हो-हल्ला करते हों पर मुझसे ये नहीं हो पाया सुबह उबासी लेते हुए जब मैंने आइना देखा तो मेरे सिर में से झांकते दो-तीन सफ़ेद बालों ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया, कि मैं एक साल और पुराना हो गया हूँ इसलिए मैं शौच इत्यादि से निवृत होकर पार्क की ओर भागा और वहाँ तन्मयता से योग व प्राणायाम किया यह मेरे पुराने होने से लड़ने का एक छोटा सा प्रयास था इसके बाद मैंने सरकार द्वारा पार्क में जनता की सेहत सुधारने के लिए स्थापित किये गए ओपन जिम में अपनी सेहत सुधारने का प्रयास करने के विषय में सोचा, पर वहाँ मशीनों के पुर्जे गायब मिले मशीनों के पुर्जे शायद किसी बेचारे की आर्थिक सेहत सुधारने के काम आ गए थे और मजे की बात ये थी कि इससे पार्क के चौकीदार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा था पार्क से आकर स्वयं को पौष्टिक आहार से परिपूर्ण किया फिर सोचा कि आज अपने इक्के-दुक्के सफ़ेद बालों को कालिमा प्रदान की जाए, सो सैलून की राह पकड़ी राह में दसों से सैकड़ों की संख्या पा चुकीं झुग्गियों को देखा तो मन ने विचार किया कि कितने खुशनसीब हैं ये लोग जो समय-समय पर सरकार से नए-नए तोहफे पाते रहते हैं चाहे किसी भी दल की सरकार बने पर इनको तोहफे मिलने निश्चित हैं झोपड़ियों के खिड़की-दरवाजों से झांकते हुए अत्याधुनिक सुख-सुविधा के सामान शायद मुझे जीभ चिढ़ा रहे थे और मुझे मध्यमवर्गीय आम आदमी की योनि में रहने के लिए बार-बार धिक्कार रहे थे झुग्गियों के साम्राज्य की सीमा समाप्त होने के बाद इलाके की मार्किट का क्षेत्र शुरू होता है बचपन में कितना खाली-खाली सा लगता था यह क्षेत्र, लेकिन अब इसमें इतनी बसें और इतनी टैक्सियां खड़ी मिल जायेंगीं, कि संभलकर चलने में ही अपनी भलाई लगती है हालाँकि क्षेत्र की जनता ने समय-समय पर झुग्गियों, बसों एवं टैक्सियों की बढती संख्या के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की है, किन्तु हुआ कुछ भी नहीं झुग्गीवालों के वोटरुपी तोहफे व टूर-ट्रेवल्स द्वारा संबंधित माननीयों की सेवा में निरंतर अर्पित किये जानेवाले मनमोहक उपहारों ने जनता की आवाज को महत्वहीन बना दिया नतीजा ये है कि झुग्गियों में शराब बिक्री, नशे का व्यापार, वैश्यावृत्ति, जुए व सट्टेबाजी जैसे सुकार्य धड़ल्ले से चलते रहते हैं और इनसे हुई आमदनी का एक निश्चित भाग झुग्गीवासियों पर अपना वरदहस्त रखे हुए माननीयों तक बिना बाधित हुए समय से पहुँचता रहता है टूर-ट्रेवल्स वाले भी अपनी नियमित सेवाएं देकर माननीय महोदयों को प्रसन्न रखते हैं बहरहाल सैलून में बाल कटवाकर सफ़ेद बालों को कालिमा प्रदान करने की योजना इसलिए रद्द करनी पड़ी क्योंकि जेब पर ज्यादा बोझ डालना उचित नहीं लगा बाल कटवाकर घर को आ रहा था तो एक दुकान की ओर नज़र गयी कभी वहाँ सिन्धी स्टोर हुआ करता था मेरा और मेरे साथियों के बचपन कुछ भाग इस सिन्धी स्टोर को चलानेवाले सिन्धी अंकल से किराये पर कॉमिक्स लेकर इसके बगल की सीढ़ियों में बैठकर कॉमिक्स पढ़ते हुए ही बीतता था यहीं हम चाचा चौधरी, साबू, राका, बिल्लू, पिंकी, गब्दू, नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव की काल्पनिक दुनिया में सैर किया करते थे अब सिन्धी स्टोर की जगह एक मोबाइल फोन स्टोर खुल गया था अब समय बदल गया है और आज के बच्चे स्मार्ट हो गए है तथा वे कॉमिक्स जैसी फालतू किताबों को पढने के बजाय अपने-अपने स्मार्ट फ़ोनों में कुछ न कुछ स्मार्ट चीज देखना पसंद करने लगे हैं कभी-कभी लगता है कि शायद बदलता हुआ समय हमें ये सब तोहफे दे रहा है मुझे पता है कि आप सब भी मुझे स्नेह व प्रेमवश लाइक, कमेंट व शेयर रुपी तोहफा देंगे तथा मुझसे कुछ अधिक प्रेम करनेवाले आप में से कुछ महानुभाव मेरे इस लेख पर चुपचाप बस एक दृष्टि डालकर अपनी-अपनी राह निकल लेंगे इसलिए इन सब बातों की परवाह किये बिना मैंने स्वयं ही स्वयं को तोहफा देने का निश्चय किया है अपने पथ पर निरंतर बढ़ते हुए अपनी मंजिल पाने का संकल्प ही इस जन्मदिन पर मेरा स्वयं को अनमोल तोहफा है

लेखक : सुमित प्रताप सिंह


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