सोमवार, 18 मई 2015

व्यंग्य: नौकरी बचाव यंत्र

"भाई जिले।"
"हाँ बोल भाई नफे।"
आज ड्यूटी करण आया अक पिकनिक मनाण?”
(आज ड्यूटी करने आया है या फिर पिकनिक मनाने?)
"भाई फ़िलहाल तो ड्यूटी करने ही आया हूँ।"
"ड्यूटी करण आया तो भाभ्भी कू मोटर साइकिल पे पीछ्छे क्यूँ टांग राखा है?”
(ड्यूटी करने आया है तो भाभी को मोटर साइकिल पे पीछे क्यों टाँग रखा है?)
"तेरी भाभी मानी ही नहीं और साथ चली आई।"
"इतने दिनों ते कदी न आई आज कूकर आगी? कहीं तझे भी भी तो बड़े साहबों वाला चस्का न लग गया?”
(इतने दिन से तो कभी आई नहीं तो आज कैसे साथ आ गई। कहीं तुझे भी तो बड़े साहबों वाला चस्का नहीं लग गया?)
"भाई तू कहना क्या चाहता हैबड़े साहबों वाला चस्का क्या होता है?"
"जैसे बड़े साहब सरकारी वाहनों का सदुपयोग अपणे सभी निजी कामों कु पूरा करण के लिए करते हैं वैसे ही आज तू भी अपणी सरकारी मोटर साइकिल का सदुपयोग करण के मूड में है।"
(जैसे बड़े साहब सरकारी वाहनों का सदुपयोग अपने सभी निजी कामों को पूरा करने के लिए करते हैं वैसे ही आज तू भी अपनी सरकारी मोटर साइकिल का सदुपयोग करने के मूड में है।)
"अरे नहीं भाई ऐसा कुछ नहीं है।"
"भाई इब सच बता भी दे कि भाभ्भी कु शॉपिंग करवाण कु साथ लाया न।"
(भाई अब तो सच बता दे कि भाभी को शॉपिंग करवाने के लिए साथ लाया है।)
"अरे भाई पुलिस की नौकरी में इतनी ज्यादा तनख्वाह मिलती है कि उसका एक हफ्ते में ही राम नाम सत्य हो जाता है और तू शॉपिंग की बात कर रहा है।"
"तो फेर माजरा के है?"
(तो फिर माजरा क्या है?)
"अपनी भाभी से ही पूछ ले कि क्या माजरा है?"
"ठीक है भाभ्भी तम ही बता दो अक आज क्यूँ अपने पति का पिंड न छोड़री?"
(ठीक है भाभीजी आप ही बता दो कि आज क्यों अपने पति का पिंड नहीं छोड़ रही हो?) 
"भाई साहब कोई भाग के तो आई नहीं हूँ जो इनका पिंड छोड़ दूँ। पूरे सात फेरे पड़ने के बाद और अपने माँ-बाप की आर्थिक रूप से कमर तोड़ने के बाद इनके घर आई थी। अब तो इनका पिंड चिता पर लेटने के बाद ही छूटेगा।"
"अरे भाभ्भी नाराज मतना हो। मैं तो बस नू पूछ रहा था अक इतणे सालों तक तो आप कभी जिले के साथ बाजार भी न गईं फिर आज भला के हो गया जो इसके पीछे टँगी डोल रही हो?"
(अरे भाभीजी नाराज मत हो। मैं तो बस ये पूछ रहा था कि इतने सालों तक तो आप कभी जिले के साथ बाजार भी नहीं गईं फिर आज भला क्या हो गया जो इसके पीछे टँगी डोल रही हो?)
"भाई साहब अपना और अपने परिवार का भविष्य बचाने की खातिर इनके साथ आई हुई हूँ।"
“भाभ्भी इब तो दिमाग का दही से छाछ बण गिया। ज्यादा पहेली मत बुझाओ अर सीधे-सीधे शब्दों में मेरी उलझण सुलझा दयो।)
(भाभी अब तो दिमाग का दही से छाछ बन गया। ज्यादा पहेली मत बुझाओ और सीधे-सीधे शब्दों में मेरी उलझन सुलझा दो।"
"भाई साब आपने बीते दिनों की दुर्घटनाएँ तो देखी और सुनी ही होंगी।"
"भाभ्भी इब दिल्ली में तो रोज ही ढेर सारी घटनाएँ अर दुर्घटनाएँ घटती रहबे हैं। वैसे आप किन दुर्घटनाओं की बात कररी?"
(अब भाभी दिल्ली में तो रोज ही ढेर सारी घटनाएँ और दुर्घटनाएँ घटती रहती हैं। वैसे आप किन दुर्घटनाओं की बात कर रही हैं?)
 "मैं पुलिसवालों के साथ घटी दुर्घटनाओं की बात कर रही हूँ। जो अभी हाल ही घटीं।"
"कौण सी वालीं?"
(कौन सी वालीं?)
"इतनी जल्दी भूल गएबीते दिनों एक हवलदार को एक चुड़ैल ने ईंटें मारीं और झूठे आरोप लगाकर जेल भिजवा दिया और एक और चुड़ैल ने एक थानेदार को सरेआम झापड़ रसीद दिया।"
"अच्छा वो दुर्घटनाएँ वो तो मझे अच्छी तरह याद हैं। पर उनसे आपका के लेणा-देणा?"
(अच्छा वो दुर्घटनाएँ वो तो मुझे अच्छी तरह याद हैं। पर उनसे आपका क्या लेना-देना?) 
 "लेना-देना क्यों नहीं हैमेरे पति भी पुलिस में ही हैं। क्या जाने कब कोई चुड़ैल मेरे पति के गले पड़ जाए और इनके जेल जाने की नौबत आ जाए। फिर हमारा परिवार तो भूखों मर जायेगा। एक नौकरी ही तो सहारा है हमारा। इसलिए मैं इनके साथ ही ड्यूटी पर रहूँगी और जो भी चुड़ैल इनसे उलझेगी उस सूपनखा से मैं निपटूँगी।"
"अरे इब मैं समझा।"
(अरे अब मैं समझा।)
"क्या समझे?"
"यही कि जिले भाभ्भी के रूप में अपणे साथ नौकरी बचाव यंत्र लेकर घूमरा है। अच्छा भाई जिले मैं तो चला।"
(यही कि जिले भाभी के रूप में अपने साथ नौकरी बचाव यंत्र लेकर घूम रहा है। अच्छा भाई जिले मैं तो चला।)
"अरे नफे कहाँ को चला?"
"अपणा नौकरी बचाव यंत्र लाण कि निया।"
(अपना नौकरी बचाव यंत्र लाने को।)

लेखक : सुमित प्रताप सिंह
इटावा, दिल्ली, भारत 

चित्र गूगल से साभार 

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