शनिवार, 4 अप्रैल 2015

समझदार (लघु कथा)


संजना अपनी सहेली कविता से काफी दिनों बाद मिली थी। कविता अपनी सहेली संजना के लिए रसोई में चाय बनाने में व्यस्त थी और संजना कविता के दो साल के बेटे चिंटू के साथ बतिया रही थी। चिंटू अपनी तोतली बोली में उससे बातें करने में मस्त था।
संजना से बात करते हुए अचानक चिंटू बोला, "आंटी ये पपीता फ्लिज में रख दो।"
"
क्यों बेटा फ्रिज में क्यों रख देंक्यों न इसे काटकर आपको खिला दें?" संजना ने प्यार से चिंटू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।"
चिंटू बोला, "आंटी इछ पपीते को चूहे ने कात कर खलाब कर दिया है। इछलिये अगल हम इछे खाएंगे तो बीमाल पड़ जाएँगे।"
तभी कविता चाय लेकर आ जाती है।
"
देखा मेरा बेटा कितना समझदार हो गया है।" कविता मुस्कुराते हुए बोली।
संजना ने हँसते हुए कहा, "हाँ इसकी बातों से लग तो ऐसा ही रहा है। अच्छा चिंटू बेटा जब ये पपीता ख़राब हो ही गया है तो आप इसे फ्रिज में क्यों रखवा रहे हैं?"
"
आंटी हमाली नौकलानी जब काम कलने आएगी तो हम उछको ये पपीता दे देंगे। इछे उछका छोता बेता खा लेगा।" चिंटू गंभीर होकर बोला।
संजना ने हैरान होकर कहा, "कविता तेरा बेटा तो कुछ ज्यादा ही समझदार हो गया है।"
*चित्र गूगल से साभार 

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