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सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

मिस्ड कॉल

पको वो बीते दिन तो याद ही होंगे, जब मोबाइल फोन हमारे जीवन का अभिन्न अंग बना था। लैंडलाइन फोन के सहारे गुजर-बसर करनेवाले हम भोले और भाले जीवों के नीरस होते जा रहे जीवन में एक नई अनुभूति का अहसास करवाने आया था मोबाइल फोन और उसके साथ ही साथ आ धमकी थी मिस्ड कॉल। शुरूआती दौर में आउट-गोइंग व इनकमिंग के बहुत अधिक दाम लगते थे। इसलिए शान दिखाने के चक्कर में मोबाइल फोन मध्यवर्गीय भारतीय मानुष की जेब ढीली कर डालता थालेकिन हम भारतीय  तो ठहरे हर मुश्किल का हल निकालने में सिद्धहस्त। सो इस समस्या को भी दूर करने में हमने अधिक समय नहीं लगाया। अब लोग एक दूसरे से बतियाने के लिए मिस्ड कॉल का प्रयोग करने लगे। उधर से मिस्ड कॉल आती और इधर से सस्ते लैंडलाइन का सदुपयोग होना आरम्भ हो जाता। प्रेमी और प्रेमिकाओं की तो लव लाइफ मिस्ड कॉल से निकल पड़ी। मिस्ड कॉल ने प्रेम के पंछियों का भाग्य ही बना डाला। उधर से प्रेमिका मिस्ड कॉल मारती और इधर प्रेमी महोदय टेलीफोन की दुकान के कोने में बने फोन बूथ में लैंड लाइन से प्रेमिका को फोन मिलाकर उसमें खो जाते थे और अपनी जेब ढीली करवाते रहते थे 
हालाँकि मिस्ड कॉल का बाकी समाज को भी बहुत लाभ मिला। सड़कों पर अवैध रूप से विराजमान रेहड़ी-पटरी वाले मिस्ड कॉल मिलते ही अपना सामान-सट्टा लेकर रफू चक्कर हो जाते थे और नगर निगम वाले बचे हुए नाममात्र सामान से ही वजू करने को विवश होकर  जाते थे। चोरोंसटोरियों और उन जैसे अन्य भले मानुषों के लिए मिस्ड कॉल  वरदान जैसा कार्य करती थी। जैसे ही उनपर पुलिसिया धावे का अंदेशा होतातभी कहीं से मिस्ड कॉल आ जाती और वे तथाकथित भले मानुष झट से जाने कहाँ अदृश्य हो जाते और बेचारे पुलिसवालों का हाल साँप के गुज़र जाने पर लकीर पीटते रह जानेवाला हो जाता।

समय बदला टेलिकॉम कंपनियों की आपसी प्रतिद्वंदिता ने इनकमिंग कॉल मुफ्त करवा डाली और आउटगोइंग कॉल भी पहले के मुकाबले काफी सस्ती हो गईलेकिन मिस्ड कॉल का जलवा अभी बरक़रार है। हमपर तो इसकी विशेष तौर से कृपा रहती है। दोस्तयार व रिश्तेदार सभी मिस्ड कॉल नामक प्रेम हमें अक्सर प्रदान करते रहते हैं और हम उनके मिस्ड कॉल रुपी प्रेम का खामियाजा आउटगोइंग कॉल कर-करके भरते रहते हैं। लोग हैं कि अपना लाभ देखते हुए हमें मिस्ड कॉल की सेवा देते रहते हैं और एक हम हैं जो सर्वप्रेम का भाव दिल में बसाये हुए मिस्ड कॉल का जवाब दे-देकर लक्ष्मी मैया को हमसे धीमे-धीमे दूर करते रहते हैं । एक बार किसी काम व्यस्त थेकि एक दोस्त की मिस्ड कॉल आ गई। जब हमने उसे कॉल किया तो खिलखिलाते हुए बोला, "यार अब क्या बताएँ असल में महीने का आखिरी दिन हैइसलिए मोबाइल रिचार्ज नहीं करवा पाया सो मिस्ड कॉल करनी पड़ी"। मन तो हुआ कि उस दुष्ट से पूछ लें, कि यहाँ हमारा क्या महीने का पहला दिन हैइस दिन हमारा भी महीने का आखिरी दिन ही होता है और इस रोज हमारे वेतन का भी लगभग राम नाम सत्य हो चुका होता है। पर आदत से मजबूर जो ठहरे। माँ-बाप ने बचपन से ऐसी आदत डाल रखी हैकि किसी का दिल नहीं दुखाया जाता चाहे बेशक दूसरा हमारे दिल के हजार टुकड़े करके चला जाए। फिर यह सोचते हैं कि कभी वो भी दिन थे जब मिस्ड कॉल की प्रतीक्षा में हमारे पल कितनी बेचैनी और इंतज़ार में बीता करते थे। इसलिए मन मसोस कर इस मिस्ड कॉल नामक विपदा को झेलते रहते हैं। ये लो जी फिर से ससुरी मिस्ड कॉल आ गई। चलिए लगता है कि किसी गरीब ने इस तथाकथित अमीर को याद फ़रमाया है।
सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

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