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रविवार, 30 नवंबर 2014

लघु कथा : बराबरी


बस में काफी भीड़ थी। सलमा बस में अपनी सहेली के साथ महिला सीट पर बैठी हुई थी। वह बहुत देर से बस में खड़े हुए एक लड़के को देख रही थी। उस लड़के को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था कि वह बहुत ही थका हुआ था और थकान के मारे उससे खड़ा भी हुआ नहीं जा रहा था। 
अचानक सलमा ने उस लड़के को बुलाते हुए कहा, "भैया आप मेरी सीट पर आकर बैठ जाइए।"
"तू पागल हो गई है जो एक अनजान लड़के को सीट दे रही है।" सलमा की सहेली उसे डाँटते हुए बोली।
सलमा ने मुस्कुराते हुए कहा, "आज के समय में हम महिला और पुरुष की बराबरी की बात करते हैं तो यह बात हमारे व्यवहार में भी होनी चाहिए और मुझे लगता है कि मुझसे ज्यादा उस लड़के को महिला सीट की जरुरत है।"
इतना कहकर सलमा वहाँ से उठकर खड़ी हुई और अपनी सीट उस लड़के को दे दी।

*चित्र गूगल बाबा से साभार 

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

सुश्री रेनू श्रीवास्तव की दृष्टि में व्यंग्यस्ते

     सुमित प्रताप सिंह द्वारा लिखी गई पुस्तक व्यंग्यस्ते पढ़ी। इसमें व्यंग्य पत्र शैली में लिखे गए हैं। लोकतंत्र महाराज को संबोधित पहले पत्र से लेकर रक्त देवता के नाम आखिरी पत्र तक बड़ी सुंदरता से व्यंग्यस्ते को रचा गया है। इस पुस्तक को पढ़ने बैठी तो पढ़ती ही गई और इस पूरी पढ़ने के बाद ही उठी। लेखक की हिंदी भाषा पर पकड़ और शुद्धता प्रशंसनीय है। इतनी गहराई से लेखक ने सामाजिक बुराइयों से लेकर खोखले रीति-रिवाजों पर जो व्यंग्य किये गए हैं, वो समाज का सही आइना प्रस्तुत करते हैं। लेखक के लेखन की नवीनता का प्रभाव ही था जो स्वयं को पूरी पुस्तक पढ़ने से न रोका जा सका। व्यंग्यस्ते में संकलित कुछ व्यंग्यों से मैं बहुत प्रभावित हुई। जो कि इस प्रकार हैं - वेलेंटाइन, जाति प्रथा, गाँव, क्रिकेट, पब प्रेमी बाला, हिंदी, मदिरा रानी इत्यादि। यदि व्यंग्यस्ते जैसी सार्थक पुस्तकें हमारे समाज में सभी को पढ़ने को मिलें, तो शायद कई सामाजिक बुराइयों को अपनाने से पहले व्यक्ति कुछ सोच-विचार कर सकता है तथा इस समाज में बदलाव की सम्भावना उत्पन्न हो सकती हैं। लेखक ने उन छोटी-मोटी समस्याओं पर भी ध्यान आकर्षित किया है, जो वास्तव में हमारे लिए बड़ा महत्त्व रखती हैं और हम अनजाने में जिन्हें नज़र अंदाज कर देते हैं। हर लेखक एक अच्छा लेखक अपने अच्छे विचारों से भी बनता है, क्योंकि जब तक आपके मन में अच्छे विचारों का आवागमन न होगा, तब तक आप अपनी रचना में वैसा आकर्षण उत्पन्न नहीं कर सकते, जो कि किसी भी पाठक को बांधे रखने के लिए आवश्यक होता है। सुमित प्रताप सिंह से मेरा यही निवेदन है कि आप देश व समाज को रचनारूपी अपने नवीन विचारों से ओतप्रोत पुस्तकें निरंतर भेंट करके मार्गदर्शित करते रहें और एक महान लेखक के रूप में उभरें तथा हमारे देशवासियों प्रेरित करने का कार्य करें। मेरे अनुसार लेखक की कलम वह कर सकती जो तलवार नहीं कर पाती। अंत में यही आशा करती हूँ कि आपकी अगली पुस्तक भी इसी तरह लेखकीय सुंदरता  से परिपूर्ण हो और अधिक से अधिक पाठकों को इससे मनोरंजन व ज्ञान प्राप्त हो सके। 
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ
रेनू श्रीवास्तव
लेखक व पत्रकार।

सोमवार, 10 नवंबर 2014

एक पत्र 'किस' के नाम



प्यारी किस 

सादर चुम्बनस्ते!

मन में आज बार- बार यह प्रश्न कौंध रहा है, कि आखिर तुम्हारी उत्पत्ति कब और कैसे हुई होगी? हो न हो तुम्हारा जन्म हृदय में उमड़ने वाली प्रेम की कोमल व पवित्र भावनाओं के संग हुआ होगा  मानव संतति की उत्पति की प्रक्रिया का प्रथम चरण तो तुमसे ही आरंभ हुआ होगा  जब माता-पिता अपनी संतान को स्नेह प्रदान करने हेतु तुम्हारा प्रयोग करते होंगे, तब तो इस धरा पर तुमसे पवित्र कोई नहीं होता होगा  तुम तब भी पवित्रता के आँचल में समा जाती होगी जब दो जीवन साथी आलिंगनबद्ध होकर प्रेम में तल्लीन हो तुम संग स्वप्नलोक में खो जाते होंगें  पर इन दिनों कुछ लोगों के सिर पर जाने कौन सा भूत सवार हो रखा है, कि वो तुम्हारे पावन रूप की बजाय दूषित रूप का प्रचार-प्रसार कर उसे उचित ठहराने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं और तुम्हें पर्दे से बाहर लाकर तुम्हारे पावन रूप को अपवित्र करने पर तुले हुए हैं  अब ये तो तुम भी भली- भांति जानती होगी कि पार्कों, होटलों व मॉलों में वासना का नंगा नाच करते हुए जब तुम्हारा दुरूपयोग किया जाता है तो दुख तो तुम्हें भी होता होगा  प्रेम कोई दिखावे की वस्तु थोड़े ही है  प्रेम तो अनुभव करने की चीज होती है  सार्वजनिक रूप से प्रेम दिखाना प्रेम कम फूहड़ता अधिक होती है और यह फूहड़ता इन दिनों देश में जगह-जगह देखने को मिल रही है  इस फूहड़ता को अपना हथियार बनाकर भारतीय संस्कृति का विध्वंश करने की निरंतर साजिश चल रही है, जिसके लिए कंधा बनने का कार्य कर रहे हैं आधुनिकता के नशे में टुल्ल हो रखे देश के तथाकथित बुद्धिमान युवा जन  ऐसा भी संभव हो सकता है कि इन युवाओं का जन्म भी इनके माता- पिता के किसी फूहड़ प्रयास के द्वारा ही हुआ हो  तभी फूहड़ता को प्रेम की संज्ञा देकर सार्वजनिक रूप से तुम्हारा दुरूपयोग कर इस फूहड़ता अभियान में वृद्धि करने में ये सब लगे हुए हों  जब ये भटके हुए युवा अपनी संस्कृति को भस्म करने की पुरजोर  कोशिश में लगे होते हैं, तो वामपंथ व पाश्चात्य सभ्यता मिलकर प्रसन्नता के गीत गा रहे होते हैं  परंतु इन कुत्सित मानसिकता वाले युवाओं को यह ज्ञात नहीं है कि उनसे अधिक संख्या उन लोगों की है जो अपनी भारतीय संस्कृति से बहुत प्रेम करते हैं तथा इसकी रक्षा करने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं  और इस प्रकार के प्रत्येक अपवित्र प्रयास को विफल कर सकने की क्षमता रखते हैं 

इन मूर्ख युवाओं को ईश्वर सद्बुद्धि दे 
इसी कामना के साथ तुम्हारे पावन रूप को नमन करते हुए सादर प्रणाम...

इस व्यंग्य को सुमित प्रताप सिंह के स्वर में सुनने के लिए कृपया नीचे दिए गए वीडियो लिंक पर क्लिक करें...



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