शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

लघु कथा : चिंता


   रकारी कार्यालय में स्वच्छता अभियान जोर-शोर से चल रहा था। कार्यालय के सभी बड़े अधिकारी मंत्री जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्यालय के परिसर में झाड़ू लगाने में व्यस्त थे। यह सब देखते हुए उसी कार्यालय में कार्यरत सफाई कर्मचारी राम सुलभ मिश्रा अपने माथे पर हाथ धरे हुए चिंतित अवस्था में कार्यालय परिसर के एक कोने में चुपचाप बैठा हुआ था । तभी कार्यालय के एक क्लर्क की निगाह उस पर पड़ गई ।
”अरे राम सुलभ यहाँ कोने में इस तरह उदास क्यों बैठे हो?” क्लर्क ने उत्सुकता से पूछा ।
राम सुलभ ने नज़रें उठाकर उदासी से क्लर्क को देखते हुए कहा, “कुछ नहीं साब बस चिंता ने दिमाग में डेरा डाल रखा है ।“
“अरे तुम्हें भला किस बात की चिंता हो गई?” क्लर्क ने मुस्काते हुए पूछा।
राम सुलभ ने जोर से साँस छोड़ते हुए कहा, “आरक्षण की कृपा से पोस्ट ग्रेजुएट होते हुए भी मुश्किल से सफाई कर्मचारी की नौकरी नसीब हो पाई थी और अब अगर ये मंत्री और अधिकारी भी झाड़ू लगाने लगे तब तो इस पापी पेट का भगवान ही मालिक है ।“
इतना कहकर राम सुलभ फिर अपने माथे पर हाथ धरकर चिंता में डूब गया ।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 
चित्र गूगल बाबा से साभार 

2 टिप्‍पणियां:

bk singh ने कहा…

Very much to the point!

SUMIT PRATAP SINGH ने कहा…

धन्यवाद सिंह साब...

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