शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

रचनाओं की आभा में खोई हुईं रचना आभा


आदरणीय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

आप सभी लेखक मित्रो को यह तो याद ही होगा, कि जब आपने अपनी पहली रचना रची थी और फिर उस रचना को किसी समाचार पत्र या पत्रिका में छपवाने के लिए भिजवाई थी तथा रचना संग संपादक को संबोधित करते हुए मक्खन और चाशनी में डुबोए हुए शब्दों से भरा संपादक के नाम एक पत्र भी रचना के साथ में संलग्न किया था कई दिनों के इंतज़ार के बाद  जब आपकी रचना उस समाचार पत्र या पत्रिका में छपी होगी, तब आप संपादक को धन्यवाद देते हुए कितने खुश हुए होंगे या फिर रचना के न छपने पर आपने संपादक को कितना गरियाया होगा सोशल मीडिया की उत्पत्ति हुई और हम लेखकों की संपादकों पर निर्भरता कम हो गई और हम अपने विचारों को बेधड़क ब्लॉग या फेसबुक अथवा ट्विटर जैसी माइक्रो ब्लॉग साइटों पर प्रकाशित करके तुष्ट होने लगे पर कहीं न कहीं हमारे भीतर समाचार पत्र या पत्रिकाओं में छपने की इच्छा दबी रही, जो समय-समय पर बाहर आ जाती है हमारी इसी इच्छा का परिणाम है कि अभी भी समाचार पत्र या पत्रिकाओं में साहित्य सांसे ले रहा है
चलिए आज आपको मिलवाता हूँ एक ऐसे व्यक्तित्व से जो सोशल मीडिया पर लिखते-लिखते प्रिंट मीडिया में स्थान पाकर संपादन की बागडोर संभाल चुका है और लेखकों की रचनाओं में आभा की तलाश में तल्लीन है जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ रचना आभा जी की  
रचना आभा जी का जन्म व परवरिश दिल्ली में ही हुई है।  दिल्ली में रहते हुए गत १७ वर्षों से अध्यापन कार्य कर रही हैं, साथ ही -साथ गृहस्थी का दायित्व भी निभा रही हैं।  साहित्य व कला में इनका बचपन से ही रुझान रहा है, किन्तु पारिवारिक दायित्व के चलते लेखन में एक दीर्घ विराम आ गया था।  गत वर्ष जनवरी,  २०१३ में इनका  पहला काव्य संग्रह 'पहली दूब'  प्रकाशित हुआ (अब देखते हैं दूसरी दूब कब आती है?)।  तब से ये साहित्य साधना में निरंतर सक्रिय हैं। मंचों पर काव्य पाठ , लेखन में कविता के अतिरिक्त गज़ल, कहानियां, लघुकथाएँ, लेख एवं पुस्तक समीक्षा इत्यादि में इनकी कलम धड़ल्ले से चल रही है। रचना जी पिछले एक वर्ष से हिंदी मासिक पत्रिका 'ट्रू मीडिया' में साहित्यिक सम्पादिका के तौर कार्य कर रही हैं अब 'आगमन' पत्रिका के संपादन की जिम्मेवारी इनके मजबूत कन्धों पर डाल दी गई है। अब मैं श्रीमान रचना आभा अर्थात विश्वास त्यागी जी को नमस्कार कर घर में प्रवेश पाने के उपरांत रचना आभा जी सामने अपने प्रश्नों की पोटली लिए बैठ चुका हूँ।

सुमित प्रताप सिंह- नमस्कार रचना आभा जी! कैसी हैं आप?
रचना आभा- नमस्कार सुमित मैं ठीक हूँ। आप सुनाइये आपके क्या हाल हैं?
(विश्वास त्यागी जी मेरे लिए जलपान की व्यवस्था करने के उपरांत सोफे पर आँख बंद करके बैठ गए हैं)

सुमित प्रताप सिंह- जी मैं भी ठीक हूँ, लेकिन लगता है आपके पति की तबियत ठीक नहीं लग रही है।
(विश्वास जी आँख खोलकर शक भरी नज़रों से मुझे देखने लगे, कि मुझे उनकी खराब तबियत के बारे में कैसे पता चला?)
रचना आभा- दरअसल बात यह है कि आज बच्चे स्कूल की ओर से पिकनिक पर गए हुए हैं, सो इन्होंने आज घर की जिम्मेदारी संभाल ली और मुझसे मिलने के लिए आने वाले लेखक-लेखिकाओं को जलपान कराते-कराते ही इनकी यह हालात हो गई है
(तभी दरवाजे की घंटी बजी और एक लेखक अपनी रचना और भेंट स्वरुप एक ताज़ा कद्दू विश्वास जी के हाथ में थमा गए)

सुमित प्रताप सिंह- रचना जी यदि आज्ञा हो तो मैं अपने प्रश्नों की पोटली खोलूँ
रचना आभा- हाँ हाँ अपनी पोटली खोलिए और पूछ डालिए जो पूछना है
(मैं अपनी कनखियों से देख रहा हूँ कि विश्वास जी को शक हो रहा है कि कहीं मैं उनकी थकान के बारे में फिर से न प्रश्न पूँछ डालूँ)

सुमित प्रताप सिंह- ब्लॉग लेखन के बारे कब और कैसे सूझा?
रचना आभा-  मैं अंतरजाल की दुनिया से अधिक परिचित नहीं थी। केवल डायरी में ही लिखा करती थी।  वर्ष २०१२ में मैंने अपना फेसबुक खाता बनाया, तो पाया कि मेरे लेखक मित्र ने लेखन में धूम मचा रखी है और उनका सारा ही लेखन ब्लॉग पर होता था। तभी मुझे ब्लॉग के विषय में जानकारी मिली। उनके ब्लॉग से होती हुई अन्य ब्लॉगों तक पहुँची।  यह एक प्रवाह की तरह था, कि आप कहीं से शुरू करके पढ़ते -पढ़ते कहीं और पहुँच जाएँ। मुझे लगा कि अपनी रचनाएँ अधिक से अधिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने का यह एक सुरक्षित और सरल माध्यम है।  उन्होंने ही मेरा ब्लॉग बनाने में मदद की। 
(दरवाजे की घंटी बजी और वही लेखक महोदय अपनी एक और रचना व साथ में फिर से भेंट स्वरुप एक ताज़ा कद्दू विश्वास जी के हाथ में थमा कर चले गए)

सुमित प्रताप सिंह- आपकी पहली रचना कब और कैसे रची गई?
(विश्वास जी उन लेखक महोदय की दोनों रचनाएँ पढ़कर अर्धमूर्छित होकर सोफे पर पड़े हुए हैं)
रचना आभा-  मेरी पहली रचना तो बचपन में ही लिखी गयी थी , जब मैं ८ वीं  या ९वीं  कक्षा में थी। उन दिनों समाचारों में जनरल मुशर्रफ और भुट्टो तथा भारत-पाक संबंधों की ख़बरें छायीं रहती थीं।  बस उसी पर एक पैरोडी बना डाली , जो कि विद्यालय में सहपाठियों और अध्यापकों द्वारा खूब पसंद की गयी।  इससे मनोबल बढ़ा, तो कविताएं भी रचने लगी।  छोटे -भाई और बहन के विद्यालय में पत्रिका के लिए रचनाएं मांगी जाती थीं , तो उनके लिए भी लिखने लगी और साथ-साथ मित्रों के भाई-बहनों की फरमाइश पर भीउस समय मैं हिंदी और अंग्रेजी  दोनों भाषाओं में समान सहजता से लिख पाती थी। 
(दरवाजे की एक बार फिर से घंटी बजी और फिर से वही लेखक अपनी तीसरी रचना व भेंट स्वरुप एक और ताज़ा कद्दू विश्वास जी के हाथ में थमाकर गायब हो गए)

सुमित प्रताप सिंह- क्या वाकई लिखना बहुत ज़रूरी है? वैसे आप लिखती क्यों हैं?
(विश्वास जी को जाने क्या सूझी और उन्होंने अपनी रिवोल्वर निकालकर उसे कपड़े से साफ करना शुरू कर दिया)
रचना आभा-  'ज़रूरी' जैसा तो कुछ भी नहीं है,  पर हर प्राणी अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम ढूंढ ही लेता है चाहे वह मूक प्राणी ही क्यों न हो ! तो लेखन को अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम मानकर मैंने भी लिखना प्रारम्भ किया फिर इसमें आत्म -संतुष्टि मिलने लगी। अपने कई भाव, जो हम किसी से साझा नहीं कर पाते, यह सोचकर कि पता नहीं सामने वाले की प्रतिक्रिया क्या होगी, उन्हें कलम से कागज़ पर उतारना कहीं अधिक सरल है। उस पर यदि पाठकों की सराहना मिलने लगे, तो कलम दोगुने मनोबल से चलने लगती है। एक स्थिति ऐसी भी आ जाती है, जब आप लिखना नहीं चाहते, पर लोग आपको पढ़ना चाहते हैं, ऐसे में उनकी भावनाएं भी हमारे अंदर के सुस्त लेखक को जगा देती हैं। यह बहुत प्रसन्नता भी देता है कि वे हमारे लेखन को, हमारे शब्दों को ढूँढ रहे हैं। 
(दरवाजे की घंटी बजी और विश्वास जी को शक हुआ कि चौथी रचना के साथ चौथा कद्दू लेकर वही कद्दू लेखक आ गए हैं उन्होंने अपनी रिवोल्वर हाथ में लिए हुए दरवाजा खोला लेकिन सामने अपनी खटारा कार में सवार स्वघोषित व्यंग्यकार अपनी रचनाओं का बंडल लिए हुए खड़े हुए थे जब उन्होंने विश्वास जी के हाथ में रिवोल्वर देखी तो रिवर्स गियर में ही अपनी कार वापस अपने घर की ओर दौड़ा दी)

सुमित प्रताप सिंह- लेखन में आपकी प्रिय विधा कौन सी है?
(विश्वास जी ने व्यंग्यकार के डरकर भागने पर मंद-मंद मुस्कुराते हुए अपनी रिवोल्वर में गोलियाँ भरना शुरू कर दिया)  
रचना आभा-  वैसे तो लेखन मैंने कविता से प्रारम्भ किया था, पर अब मुझे गज़ल और कहानियां लिखने में भी उतना ही आनंद आता है। गज़ल की नज़ाकत मुझे लुभाती है और कहानी का छंद मुक्त होना।  पिछले कुछ समय से तो हिंदी कहानी में अन्य  भाषाओं के शब्दों का भी सहज प्रयोग देखा जा रहा है, जो इस विधा को, अभिव्यक्ति को और सरल बना देता है और लेखक अपने भाव पूर्णत: सम्प्रेषित करने में सफल हो पाता है।  शायद यही कारण है कि कविता की तुलना में कहानी के पाठक अधिक मिलते हैं।
(अभी रिवोल्वर में एक गोली ही भरी गई थी कि दरवाजे कि फिर घंटी बजी विश्वास जी को शक हुआ कि कहीं वही व्यंग्यकार तो नहीं आ गए उन्हें फिर से न डराने की चाहत लिए अपनी रिवोल्वर को सोफे पर ही छोड़कर दरवाजा खोलने चल दिए)

सुमित प्रताप सिंह- अपनी रचनाओं से समाज को क्या संदेश देना चाहती हैं?
रचना आभा-  मेरी रचनाओं का झुकाव प्राय: नारी विमर्श पर अधिक होता है, पर जो सामाजिक समस्याएं मुझे विचलित करती हैं, उन सभी पर अपनी लेखनी चलाना पसंद करती हूँ।  स्त्री-पुरुष असमानता , बलात्कार, आर्थिक विषमता, अन्याय, अज्ञानता, मानवीय संबंध आदि विषयों पर लिखकर समाज में व्याप्त बुराईयों एवं कट्टर मानसिकता आदि पर प्रहार करने की कोशिश करती हूँ।  “दामिनी काण्ड” के समय मैंने अपनी छटपटाहट व क्रोध को 'बलात्कार' नामक कविता का माध्यम से व्यक्त किया था।  यह देखकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ, कि फेसबुक पर उसे पढ़ने वाले सभी युवा पुरुष मित्रों के मन को उसने उसने इस हद्द तक प्रभावित  किया, कि उनमे से अधिकांश ने उसके प्रत्युत्तर में एक कविता लिखी, जिसका सार यही था की ऐसे भीषण काण्ड के बाद वे शर्मिंदा हैं पुरुष जाति  में जन्म लेने के लिए.… और यह भी, कि अपने होते हुए, अपनी जानकारी में  ऐसा हादसा किसी के साथ नहीं देंगे। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी , क्योंकि उस कविता को लिखते या साझा करते समय मेरे मन में यह विचार नहीं था कि इस तरह से आत्माओं को झकझोर कर रख देगी वह।  यहाँ तक कि जब मैं एक वरिष्ठ और चर्चित कवि  से पहली बार मिली, तो उन्होंने मुझे इसी कविता की रचनाकार के रूप में पहचाना।  इससे स्पष्ट है कि आपकी रचनाएं, आपका लेखन जाने -अनजाने समाज पर कितना प्रभाव छोड़ता है। 
(इस बार दरवाजे पर एक लेखिका महोदया थीं दुल्हन जैसा श्रृंगार किये हुए अधनंगे लिबास में अपनी रचनाएँ संपादक को दिखाने का आग्रह कर रहीं थीं जब उन्हें पता चला कि संपादक नहीं संपादिका हैं तो मुँह बिचकाकर उलटे पाँव लौट गईं)

सुमित प्रताप सिंह- एक अंतिम प्रश्न. "ब्लॉग व फेसबुक एवं ट्विटर जैसी माइक्रो ब्लॉग साइट्स पर हिंदी लेखन द्वारा क्या हिंदी की हालत सुधरेगी?"  इस विषय पर आप अपने कुछ विचार रखेंगी?
रचना आभा-  ब्लॉग / फेसबुक व ट्विटर जैसी सामाजिक साइट्स ने हिंदी को पुनर्जीवन दिया है, इसमें कोई संदेह नहीं।  जब तक लोग फोन पर संदेश भेजकर काम चलाते थे, हिंदी की  इतनी आवश्यकता महसूस नहीं होती थी , क्योंकि हिंदी को भी अंग्रेजी में टंकित (टाइप ) कर लेते थे।  किन्तु हिंदी में लिखने वाले ब्लॉग/ फेसबुक अथवा ट्विटर पर तब तक सहज नहीं महसूस कर पाते, जब तक कि हिंदी वर्तनी का प्रयोग न करें।  इस प्रकार देखा-देखी  और लोग भी हिंदी में ही टंकण करने लगे हैं और  इस  भाषा का वृक्ष  पुन: हरियाने लगा  है।  अब अधिक से अधिक लोग इन साइट्स पर हिंदी वर्तनी का प्रयोग करना चाहते हैं।  लोग फोन खरीदते समय भी इस बात का ध्यान रखने लगे हैं, कि उसमे  हिंदी पढ़ने व लिखने की सुविधा हो। हिंदी टंकण के लिए आये दिन नये यंत्र (Apps) डाउनलोड करने के लिंक साझा किये जा रहे हैं। इन सामाजिक साइट्स के उपयोगकर्त्ता विश्व भर  में फैले हुए हैं, जिनमे से कई हिंदी भाषी भी हैं।  उनके हिंदी प्रयोग से निश्चित तौर पर ही इस भाषा का प्रचार प्रसार हो रहा है। भारत में प्रकाशित होने वाली हिंदी पत्रिकाओं का विमोचन विदेशों  में किया जा रहा है, इस प्रकार की सूचनाएँ जब तस्वीरों सहित इन साइट्स और ब्लॉग्स के माध्यम से फैलती हैं, तो नि:संदेह  हिंदी के हाथ सुदृढ़ होते हैं। इन साइट्स की मेहरबानी से ही सही, हिंदी बहुत शीघ्र विश्वपटल पर न केवल अपना खोया आत्म विश्वास पुन: प्राप्त  करेगी, अपितु विश्व की अग्रणी भाषाओं में से एक होगीऐसा मेरा दृढ विश्वास है और कामना भी !! 
(विश्वास जी भी विश्वास के साथ अपनी रिवोल्वर भरते हुए शायद शक कर रहे हैं कि कहीं मैं दोबारा जलपान की फरमाइश तो नहीं करूँगा?)

सुमित प्रताप सिंह- ऐसी कामना हम सभी हिन्दी प्रेमी करते हैं अच्छा रचना जी अब आज्ञा दें. फिर मुलाक़ात होगी
रचना आभा- जी अवश्य धन्यवाद

(अब चूँकि विश्वास त्यागी जी की रिवोल्वर पूरी तरह लोड हो चुकी थी, इसलिए वहाँ से निकलना ही उचित था तो साथियो चल पड़ा हूँ अपनी प्रश्नों की पोटली टांगकर किसी और मंज़िल की ओर)

रचना आभा जी की रचनाओं की आभा देखनी हो तो पधारें http://rachna-tyagi.blogspot.in/ पर   


5 टिप्‍पणियां:

lokendra singh ने कहा…

वाह, बढ़िया साक्षात्कार....

SUMIT PRATAP SINGH ने कहा…

धन्यवाद लोकेन्द्र जी...

rashmi tarika ने कहा…

Bahut hi accha sakshaatkaar...prerna deta hua ..

rashmi tarika ने कहा…

Bahut hi accha sakshaatkaar...prerna deta hua ..

SUMIT PRATAP SINGH ने कहा…

धन्यवाद रश्मि जी...

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