शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

एक प्रेम कहानी ऐसी भी

  वाराणसी के पावन घाट पर ज्योति और कुलदीप के बीच प्रेम का बीज उपजा था. दोनों ही वाराणसी के होस्टलों में रहते हुए शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. एक दिन कुलदीप अपने दोस्तों और ज्योति अपनी सहेलियों के साथ वाराणसी के घाट पर गंगा मैया के दर्शन करने आये और उनकी एक-दूसरे से ऐसी नज़रें मिलीं तो एक-दूसरे के हो गए. धीरे-धीरे मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ और दोनों में प्यार बढ़ता गया. अब ज्योति को अपना नीरस सा जीवन उमंगों से भरा लगने लगा था. पहले वह किताबों के संसार में सिमटकर खोयी रहती थी. उसका मकसद था पढ़-लिखकर एक मुकाम पाना और अपने माता-पिता का सिर गर्व से ऊँचा करना. इसी संसार में खोये हुए अक्सर वह हर युवा लड़की की भांति स्वप्न देखा करती थी उस सपनों के राजकुमार के जो आसमान से घोड़े पर सवार होकर आएगा और उसे अपने साथ अपने सपनों की रानी बनाकर ले जाएगा.
कुलदीप के रूप में ज्योति को उसके सपनों का राजकुमार मिल चुका था. अब वह अपने सपनों के राजकुमार के साथ भविष्य के सपने सजोने लगी. एक दिन ज्योति की गोद में लेटे हुए कुलदीप ने ज्योति को उदास देख उसकी उदासी का कारण जानना चाहा तो उसने टालने की कोशिश की. जब कुलदीप नहीं माना तो उसकी जिद के आगे उसे झुकना पड़ा.
ज्योति धीमे स्वर में बोली, “कुलदीप मैं तुम्हें कई दिनों से बताना चाह रही थी, लेकिन अक्सर झेंप जाती थी. मेरे पेट में तुम्हारा बच्चा है.”
“ये क्या कह रही हो?” कुलदीप को विश्वास नहीं हुआ.
ज्योति उसके गले से लगती हुई बोली, “सच कह रही हूँ. हम दोनों के प्यार का बीज मेरे गर्भ में पल रहा है.”
“मैं कैसे मान लूँ कि यह बच्चा हमारे प्यार का ही फल है?” कुलदीप ने कठोर बनते हुए कहा.
ज्योति उसकी बात सुनकर हैरान हो गई, “तुम ये कैसी बातें कर रहे हो? ये हमारे प्यार का फल नहीं है तो फिर किसके प्यार का फल है?”
“अब जाने तुमने कितनों के साथ प्रेमलीला खेली हो और उसके फल को मेरे माथे मढ़ रही हो.” कुलदीप व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए बोला.
ज्योति को जैसे आघात सा लगा, “तुमने मुझे क्या धन्धेवाली समझा है, जो मैं सबसे प्रेमलीला रचाती फिरुंगी.”
“मैं कुछ नहीं जानता. आज से मेरा तुमसे कोई संबंध नहीं है. तुम्हारी होने वाली संतान तुम्हें ही मुबारक हो.” इतना कहकर कुलदीप वहाँ से चला गया और ज्योति वहीं पार्क के कोने में बिलखती रही. 
इस मुसीबत की घड़ी में ज्योति की प्रिय सहेली रेनू ने उसका बहुत साथ दिया. ज्योति के गर्भ में बच्चा छः महीने का हो चुका था, सो डॉक्टर ने गर्भपात से इनकार कर दिया. अब रेनू  शहर में एक किराये का मकान खोजकर ज्योति को रखकर उसकी देखभाल करने लगी. एक दिन ज्योति ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया. अब ज्योति सोचने लगी कि बिन ब्याही होकर माँ बनने की बात अगर माँ-बाप को पता लगी तो वे तो जीते-जी मर जायेंगे.
रेनू ने इस विपदा से बचने का उपाय सुझाया. दोनों सहेलियाँ सवेरे-सवेरे वाराणसी के घाट के पास स्थित एक मंदिर में गईं और मंदिर के मुख्य द्वार पर ज्योति ने सुबकते हुए अपनी संतान को रखा और वहाँ से भारी मन लिए चली आई.
जब मंदिर के पुजारी ने नन्हे बालक को देखा तो चौंक गए और चीखकर बोले, “अरे ये कौन अपना बच्चा छोड़ गया है यहाँ पर.”
वहीं बगल से निकल रही सफाई कर्मचारी शन्नो ने जब यह देखा तो झट से बोली, “पुजारी जी मेरा बच्चा है. भगवान का आशीर्वाद दिलवाने आई थी.”
पुजारी जी क्रोधित होकर बोले, ”आशीर्वाद दिलवाने लाई थी तो अपनी गोद में रखती. यहाँ रास्ते में क्यों पटक दिया? कहीं पैर इसके ऊपर पड़ जाता तो.”
शन्नो बोली, “पुजारी जी माफ कर दीजिए. छोटी जाति की हूँ न सो आप बड़ी जाति वालों जितना दिमाग नहीं चलता.” इतना कहकर शन्नो उस बच्चे को लेकर चंपत हो गई.
शन्नो उस बच्चे को गोद में छुपाये तेजी से चलते हुए बड़बडा रही थी, “हे भगवान आज तूने मेरी लोटरी खोल दी. मेमसाब की सूनी गोद में यह बच्चा जब डालूँगी तो मालामाल कर देगीं. जाने किसका पाप सुबह-सुबह मेरे लिए वरदान बनकर आ गया?”
उसके बड़बडाने को मुनेश सुन रहा था. वह हाल ही में पुलिस में भर्ती हुआ था और भर्ती होने के लिए मांगी गंगा स्नान की मन्नत पूरी करने वाराणसी के घाट पर आया था. वह फुर्ती से उसकी ओर लपका और उसे टोकते हुए बोला, “ए बुढिया ये किसका बच्चा चुरा लाई?”
शन्नो एकदम घबराते हुए संभली और जवाब दिया, “किसका बच्चा? अरे मेरा बच्चा है.”
मुनेश उसे हड़कते हुए बोला, “तेरी उम्र और रंग को देखकर कहीं से भी ये तेरा बच्चा नहीं लगता. सही-सही बता नहीं तो हवालात में जायेगी. मैं पुलिस में ही हूँ.”
शन्नो के डर के मारे पसीने छूटने लगे, “बाबू जी माफ कर दो. ये बच्चा तो मुझे मंदिर के द्वार पर पड़ा मिला था. मैंने सोचा इसे पाल-पोस लूंगी. वरना बेचारा भूख से ही मर जाता.”
“पाल-पोस लेगी या फिर इसे बेच देगी.” मुनेश ने गुस्से में उससे बच्चा छीन लिया.
 उस बच्चे को लेकर मुनेश मेरठ ले आया. मुनेश भी अनाथ ही था. उसके माता-पिता बचपन में ही दुर्घटना के शिकार हो स्वर्ग सिधार गए थे. उसे उस बच्चे में अपना बचपन दिखाई दिया. उसने उसे अपने बच्चे की तरह पालना शुरू कर दिया.
समय का पहिया चलता रहा और वह बच्चा, जिसका नाम मुनेश ने प्यार से आकाश रखा था, दस साल का शरारती बच्चा बन चुका था. पुलिस लाइन्स में अक्सर उसकी शिकायत मुनेश के पास आती रहती थीं, लेकिन मुनेश उन्हें हंसकर टाल देता था. एक दिन आकाश ने एस.पी. के घर में स्थित बाग में घुसकर अमरुद तोड़ लिए. उस बाग में काम करनेवाले माली ने आकाश को पकड़कर उसके गाल पर झापड़ झड़ दिए. जब आकाश ने घर जाकर रोते हुए यह बात मुनेश को बताई तो उसका खून खौल उठा. वह बाग में गया और माली के गालों को मार-मार कर लालकर दिया.
मुनेश की पेशी एस.पी. साहिबा के पास हुई. उन्होंने माली और मुनेश से सारे हालत जाने और मुनेश से पूछा, “तुम्हारी तो शादी नहीं हुई फिर ये बच्चा किसका है?”
मुनेश ने मन्नत पूरी करने के लिए वाराणसी के घाट पर गंगा स्नान करने और अजय को बुढिया से लेने की पूरी घटना एस.पी. साहिबा को बता दी. मुनेश को चेतावनी देकर माफ कर दिया गया और माली को आइन्दा किसी बच्चे पर हाथ न उठाने की सख्त हिदायत दी गई.
मुनेश के जाने के बाद एस. पी. साहिबा ने अपने अर्दली से कहा, “अगर कोई मिलने आये तो उससे कह देना मेरी तबियत ठीक नहीं है. आज मैं आराम करूँगी.”
इतना कहकर एस. पी. साहिबा बीते दिनों में खो गयीं. अपनी सहेली रेनू के साथ जब वह यानि कि ज्योति अपने बच्चे को ईश्वर के सहारे छोड़कर आई थी तो कितना रोई थी. वो रेनू जैसी सहेली ही थी, वरना जाने क्या हाल होता उसका. रेनू के समझाने पर ज्योति ने अपनी पढ़ाई में फिर से ध्यान देना शुरू कर दिया और कड़े परिश्रम के परिणामस्वरुप पुलिस सेवा में चुनी गई. घरवालों ने खूब जोर डाला पर ज्योति की किसी से विवाह करने की इच्छा ही न हुई. उसे हर आदमी में अपने भूतपूर्व प्रेमी कुलदीप का घृणित चेहरा ही दिखाई देता था. अचानक ही उसके हृदय में फिर से प्रेम की अनुभूति होने लगी. यह प्रेम मुनेश के लिए था. जिसने उसके बच्चे को अपना बच्चा समझकर इतने दिनों पाला पोसा और इस कारण अभी तक शादी भी नहीं की. वह सोच रही थी कि कुलदीप से उसका प्यार शायद यौवनावस्था में की हुई केवल एक भूल थी और मुनेश के प्रति प्यार आदरभाव से भरा हुआ सच्चा प्रेम था.
उधर मुनेश के हृदय में भी उथल-पुथल चल रही थी. वह अपने आपसे बतिया रहा था, “मैंने एस.पी. साहिबा के माली को मारा और फिर भी उन्होंने मुझे माफ कर दिया. बड़ी ही नेक महिला हैं. पर एक बात समझ में नहीं आई, कि उन्होंने अभी तक शादी क्यों नहीं की. इतने उच्च पद पर आसीन विनम्र युवती का अभी तक कुँवारी रहना अजीब ही लगता है. उनकी आयु मेरे बराबर की ही होगी. मेरे तो माँ-बाप नहीं थे जो कोई बाप अपनी बेटी मेरे साथ ब्याहता. वैसे भी आकाश ही अब मेरा जीवन है. अब उसे पढ़ा-लिखाकर लायक इंसान बनाना ही मेरा लक्ष्य है. पर उनकी क्या मजबूरी होगी? सुना है उनका तो भरा-पूरा परिवार है. फिर क्या कारण रहा होगा? हो सकता है कोई उनके लायक लड़का ही न मिला हो. वैसे कोई किस्मतवाला ही होगा जिससे उनकी शादी होगी.” और इन्हीं विचारों में खोये हुए उसकी आँख लग गई.
सुबह शोर सुनकर मुनेश की नींद टूट गई. एस.पी. साहिबा का अर्दली मुनेश के घर का दरवाजा पीट रहा था.
मुनेश ने दरवाजा खोलकर उससे पूछा, “अरे भाई क्यों इतने बेचैन हो रखे हो? क्या मुसीबत आई है?”
अर्दली ने कहा, “तुम्हें एस.पी. साहिबा ने बुलाया है.”

मुनेश अर्दली के साथ एस.पी. साहिबा यानि कि ज्योति के घर पहुँचा तो वहाँ उसकी सहेली रेनू मुनेश को एकांत में ले गई और उसे बीती सारी बात बताई तथा यह भी बताया कि ज्योति उससे शादी करना चाहती है. मुनेश ने उससे कहा कि कहाँ वह एक सिपाही और कहाँ वह एस.पी. कैसे जोड़ बनेगा? रेनू ने उसे समझाया कि अपने बेटे के प्रति तुम्हारे समर्पण और प्रेम से प्रभावित होकर ज्योति उसे प्यार करने लगी है और प्यार में कोई जाति, धर्म या पद नहीं देखा जाता. चूँकि मुनेश भी ज्योति को मन ही मन चाहने लगा था सो उसने बिना संकोच किये इस रिश्ते के लिए हाँ कर दी और एक शुभ महूर्त में उन दोनों का विवाह हो गया.  

सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, दिल्ली, भारत 

4 टिप्‍पणियां:

Prasanna Badan Chaturvedi ने कहा…

लाजवाब कहानी...बहुत बहुत बधाई....

नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो

SUMIT PRATAP SINGH ने कहा…

धन्यवाद चतुर्वेदी जी...

संजय भास्‍कर ने कहा…

Bahut hi Lajwaab lagi ye khaani

SUMIT PRATAP SINGH ने कहा…

संजय भास्कर जी आप जैसे लाजवाब पाठकों के लिए ही यह कहानी लिखी गई है. आभार...

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