बुधवार, 31 दिसंबर 2014

लघु कथा : बदला


रजत ने जैसे ही फ़िल्म की सी.डी. खरीदने के लिए उठाई तो नितिन को गुस्सा आ गया।
नितिन- "रजत तुझे शर्म-वर्म है कि नहीं?"
रजत- "क्यों दोस्त क्या बात हो गई?"
नितिन- "तू उस फ़िल्म की सी.डी. खरीद रहा है, जिसमें हमारे धर्म का मजाक उड़ाया गया है और हमारे देवी-देवताओं का अपमान किया गया है।"
रजत- "इसीलिए तो इस फ़िल्म की लोकल सी.डी. खरीद रहा हूँ, ताकि अपने धर्म और देवी-देवताओं के अपमान का बदला लिया जा सके"
नितिन- "मैं कुछ समझा नहीं।"
रजत- "इस फ़िल्म में हमारे धर्म और देवी-देवताओं का अनादर किया गया है। यह जानते हुए भी अपने धर्म के कुछ तथाकथित विद्वान लोग इस फ़िल्म को देखने की इच्छा करेंगे। मैं उन तथाकथित विद्वानों को इस फ़िल्म की लोकल सी.डी. को कॉपी करके मुफ़्त में बाटूँगा, जिससे कि वे सभी इस फ़िल्म को सिनेमाघर में जाकर देखने की बजाय अपने घर पर ही देखें। इस प्रकार मेरे और मेरे जैसे अनेक लोगों के इस छोटे से प्रयास से फ़िल्म निर्माता का आर्थिक रूप से नुकसान होगा और वह आइन्दा से किसी भी धर्म या जाति का अपमान करनेवाली फ़िल्में बनाने से बाज आएगा।
नितिन- "अच्छा ऐसा है क्या?" दुकानदार से "भैया इस फ़िल्म की एक लोकल सी.डी. मुझे भी देना।"


रविवार, 7 दिसंबर 2014

व्यंग्य : चूहा मौत जाँच आयोग


     कॉलोनीवाले काफी दिनों से परेशान थे। कॉलोनी में डेरा जमाये हुए चूहों ने उन सबका जीना हराम कर रखा था। आख़िरकार एक दिन ईश्वर ने उनकी सुन ली और उनकी जान आफत में डाले रखनेवाले चूहों का सरदार कॉलोनी के एक घर के स्टोर में धराशाही हुआ मिला। उस एक हाथ लंबे चूहे के शव को देखने के लिए सभी कॉलोनीवासी एकत्र हुए। उन सबके लिए यह बहुत ही सुखद दृश्य था। अब कॉलोनीवासियों के लिए यह शोध का विषय बन चुका था, कि उस बलशाली चूहे की मौत आखिर इतनी आसानी से कैसे हुई? वहाँ उपस्थित जनसमूह में एकत्र व्यक्ति इस विषय पर अपने-अपने तर्क प्रस्तुत कर रहे थे। एक बात गौर करने लायक है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में हम भारतीयों को चाहे कुछ विशेष रूप से प्राप्त न हुआ हो, लेकिन अपने-अपने विचार प्रस्तुत करने और अपने-अपने तर्क देने का अधिकार अवश्य मिल गया है और इसी अधिकार का सदुपयोग करते हुये सभी ने अपने-अपने अनुमानों के घोड़े दौड़ने आरम्भ कर दिए। रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन  के एक कर्मठ सदस्य, जो अपनी नौकरी के दौरान कर्मठता नामक बुराई से दूर ही रहे, ने अपने विचार प्रस्तुत किये कि ये चूहा अभी हाल ही में पड़ोसी राज्य में एक तथाकथित संत के पुलिस द्वारा पकडे जाने के घोर दुःख में डूबकर चल बसा है।
उनके इस तर्क के पक्ष में कुछ नरमुंड हिले तथा नरमुंडों ने नहीं हिलकर अपनी समर्थित न होने की इच्छा प्रदर्शित कर दी।

कॉलोनी की एक चाची गंभीर होकर बोलीं, "ऐसा कुछ भी नहीं हुआ होगा। बल्कि इस चूहे ने जिस स्टोर में अपने प्राण त्यागे, उस स्टोर को इसने अपना अभेद्य किला समझ लिया होगा तथा खुद स्वघोषित संप्रदाय का प्रधान। इसके भ्रम को शेर के मौसा बिलौटे ने तोड़ डाला और अपने खतरनाक पंजों के वार से इसे यमलोक पहुँचा दिया।"
अब कॉलोनी के युवा दल की बारी थी। उनमें से एक युवा ने तर्क दिया, "इस चूहे की मौत हृदयघात से हुई है। कुछ दिन पहले इसके पुत्र को कॉलोनी के एक घर में पिंजरे में फँसा कर मार डाला गया था। अपने पुत्र के वियोग में ही इसके प्राण पखेरू उड़ गए हैं।"

बहरहाल जैसा कि प्रत्येक सभा में होता है वही इस सभा में भी हुआ। बहस आरम्भ हुई और बिना किसी परिणाम के बहस का समापन भी हो गया। अंत में एक बुजुर्ग उठे। कलियुग में वैसे तो बुजुर्गों को इतना सम्मान दिया जाता है कि उनके हाल पर छोड़ना ही हम कलियुगी जीव अपना परम कर्तव्य समझते हैं, लेकिन जब कोई उलझन या परेशानी  आती है तो इन्हीं बुजुर्गों के तजुर्बों के आगे दंडवत होने के लिए हम सभी तत्पर रहते हैं। बहरहाल बुजुर्ग ने राय दी कि इस चूहे की मौत की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया जाए, जिसका नाम रखा जाए "चूहा मौत जाँच आयोग"। यह राय सुनते ही राजनीतिक रूप  से बेरोजगार हुए व्यक्तियों के चमचों की बाछें खिल गईं। उन चमचों के कठिन प्रयत्न आखिर रंग लाये और उस क्षेत्र के भूतपूर्व विधायक के नेतृत्व में पिछले चुनावों में अपनी जमानत जब्त करवा चुके निगम पार्षदों ने इस आयोग का जिम्मा संभाला। अब कॉलोनी वालों को प्रतीक्षा है कि "चूहा मौत जाँच आयोग" कब और क्या रिपोर्ट देता है? जबकि "चूहा मौत जाँच आयोग" के सम्मानित अध्यक्ष व सदस्य इस इंतज़ार में हैं कि कॉलोनी में किसी और बलशाली चूहे की मौत हो और इस चूहे की फ़ाइल बंद करके अगले चूहे की मौत पर व्यस्तता का बहाना मिल सके।


रविवार, 30 नवंबर 2014

लघु कथा : बराबरी


बस में काफी भीड़ थी। सलमा बस में अपनी सहेली के साथ महिला सीट पर बैठी हुई थी। वह बहुत देर से बस में खड़े हुए एक लड़के को देख रही थी। उस लड़के को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था कि वह बहुत ही थका हुआ था और थकान के मारे उससे खड़ा भी हुआ नहीं जा रहा था। 
अचानक सलमा ने उस लड़के को बुलाते हुए कहा, "भैया आप मेरी सीट पर आकर बैठ जाइए।"
"तू पागल हो गई है जो एक अनजान लड़के को सीट दे रही है।" सलमा की सहेली उसे डाँटते हुए बोली।
सलमा ने मुस्कुराते हुए कहा, "आज के समय में हम महिला और पुरुष की बराबरी की बात करते हैं तो यह बात हमारे व्यवहार में भी होनी चाहिए और मुझे लगता है कि मुझसे ज्यादा उस लड़के को महिला सीट की जरुरत है।"
इतना कहकर सलमा वहाँ से उठकर खड़ी हुई और अपनी सीट उस लड़के को दे दी।

*चित्र गूगल बाबा से साभार 

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

सुश्री रेनू श्रीवास्तव की दृष्टि में व्यंग्यस्ते

     सुमित प्रताप सिंह द्वारा लिखी गई पुस्तक व्यंग्यस्ते पढ़ी। इसमें व्यंग्य पत्र शैली में लिखे गए हैं। लोकतंत्र महाराज को संबोधित पहले पत्र से लेकर रक्त देवता के नाम आखिरी पत्र तक बड़ी सुंदरता से व्यंग्यस्ते को रचा गया है। इस पुस्तक को पढ़ने बैठी तो पढ़ती ही गई और इस पूरी पढ़ने के बाद ही उठी। लेखक की हिंदी भाषा पर पकड़ और शुद्धता प्रशंसनीय है। इतनी गहराई से लेखक ने सामाजिक बुराइयों से लेकर खोखले रीति-रिवाजों पर जो व्यंग्य किये गए हैं, वो समाज का सही आइना प्रस्तुत करते हैं। लेखक के लेखन की नवीनता का प्रभाव ही था जो स्वयं को पूरी पुस्तक पढ़ने से न रोका जा सका। व्यंग्यस्ते में संकलित कुछ व्यंग्यों से मैं बहुत प्रभावित हुई। जो कि इस प्रकार हैं - वेलेंटाइन, जाति प्रथा, गाँव, क्रिकेट, पब प्रेमी बाला, हिंदी, मदिरा रानी इत्यादि। यदि व्यंग्यस्ते जैसी सार्थक पुस्तकें हमारे समाज में सभी को पढ़ने को मिलें, तो शायद कई सामाजिक बुराइयों को अपनाने से पहले व्यक्ति कुछ सोच-विचार कर सकता है तथा इस समाज में बदलाव की सम्भावना उत्पन्न हो सकती हैं। लेखक ने उन छोटी-मोटी समस्याओं पर भी ध्यान आकर्षित किया है, जो वास्तव में हमारे लिए बड़ा महत्त्व रखती हैं और हम अनजाने में जिन्हें नज़र अंदाज कर देते हैं। हर लेखक एक अच्छा लेखक अपने अच्छे विचारों से भी बनता है, क्योंकि जब तक आपके मन में अच्छे विचारों का आवागमन न होगा, तब तक आप अपनी रचना में वैसा आकर्षण उत्पन्न नहीं कर सकते, जो कि किसी भी पाठक को बांधे रखने के लिए आवश्यक होता है। सुमित प्रताप सिंह से मेरा यही निवेदन है कि आप देश व समाज को रचनारूपी अपने नवीन विचारों से ओतप्रोत पुस्तकें निरंतर भेंट करके मार्गदर्शित करते रहें और एक महान लेखक के रूप में उभरें तथा हमारे देशवासियों प्रेरित करने का कार्य करें। मेरे अनुसार लेखक की कलम वह कर सकती जो तलवार नहीं कर पाती। अंत में यही आशा करती हूँ कि आपकी अगली पुस्तक भी इसी तरह लेखकीय सुंदरता  से परिपूर्ण हो और अधिक से अधिक पाठकों को इससे मनोरंजन व ज्ञान प्राप्त हो सके। 
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ
रेनू श्रीवास्तव
लेखक व पत्रकार।

सोमवार, 10 नवंबर 2014

एक पत्र 'किस' के नाम



प्यारी किस 

सादर चुम्बनस्ते!

मन में आज बार- बार यह प्रश्न कौंध रहा है, कि आखिर तुम्हारी उत्पत्ति कब और कैसे हुई होगी? हो न हो तुम्हारा जन्म हृदय में उमड़ने वाली प्रेम की कोमल व पवित्र भावनाओं के संग हुआ होगा  मानव संतति की उत्पति की प्रक्रिया का प्रथम चरण तो तुमसे ही आरंभ हुआ होगा  जब माता-पिता अपनी संतान को स्नेह प्रदान करने हेतु तुम्हारा प्रयोग करते होंगे, तब तो इस धरा पर तुमसे पवित्र कोई नहीं होता होगा  तुम तब भी पवित्रता के आँचल में समा जाती होगी जब दो जीवन साथी आलिंगनबद्ध होकर प्रेम में तल्लीन हो तुम संग स्वप्नलोक में खो जाते होंगें  पर इन दिनों कुछ लोगों के सिर पर जाने कौन सा भूत सवार हो रखा है, कि वो तुम्हारे पावन रूप की बजाय दूषित रूप का प्रचार-प्रसार कर उसे उचित ठहराने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं और तुम्हें पर्दे से बाहर लाकर तुम्हारे पावन रूप को अपवित्र करने पर तुले हुए हैं  अब ये तो तुम भी भली- भांति जानती होगी कि पार्कों, होटलों व मॉलों में वासना का नंगा नाच करते हुए जब तुम्हारा दुरूपयोग किया जाता है तो दुख तो तुम्हें भी होता होगा  प्रेम कोई दिखावे की वस्तु थोड़े ही है  प्रेम तो अनुभव करने की चीज होती है  सार्वजनिक रूप से प्रेम दिखाना प्रेम कम फूहड़ता अधिक होती है और यह फूहड़ता इन दिनों देश में जगह-जगह देखने को मिल रही है  इस फूहड़ता को अपना हथियार बनाकर भारतीय संस्कृति का विध्वंश करने की निरंतर साजिश चल रही है, जिसके लिए कंधा बनने का कार्य कर रहे हैं आधुनिकता के नशे में टुल्ल हो रखे देश के तथाकथित बुद्धिमान युवा जन  ऐसा भी संभव हो सकता है कि इन युवाओं का जन्म भी इनके माता- पिता के किसी फूहड़ प्रयास के द्वारा ही हुआ हो  तभी फूहड़ता को प्रेम की संज्ञा देकर सार्वजनिक रूप से तुम्हारा दुरूपयोग कर इस फूहड़ता अभियान में वृद्धि करने में ये सब लगे हुए हों  जब ये भटके हुए युवा अपनी संस्कृति को भस्म करने की पुरजोर  कोशिश में लगे होते हैं, तो वामपंथ व पाश्चात्य सभ्यता मिलकर प्रसन्नता के गीत गा रहे होते हैं  परंतु इन कुत्सित मानसिकता वाले युवाओं को यह ज्ञात नहीं है कि उनसे अधिक संख्या उन लोगों की है जो अपनी भारतीय संस्कृति से बहुत प्रेम करते हैं तथा इसकी रक्षा करने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं  और इस प्रकार के प्रत्येक अपवित्र प्रयास को विफल कर सकने की क्षमता रखते हैं 

इन मूर्ख युवाओं को ईश्वर सद्बुद्धि दे 
इसी कामना के साथ तुम्हारे पावन रूप को नमन करते हुए सादर प्रणाम...

इस व्यंग्य को सुमित प्रताप सिंह के स्वर में सुनने के लिए कृपया नीचे दिए गए वीडियो लिंक पर क्लिक करें...



शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

लघु कथा : चिंता


   रकारी कार्यालय में स्वच्छता अभियान जोर-शोर से चल रहा था। कार्यालय के सभी बड़े अधिकारी मंत्री जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्यालय के परिसर में झाड़ू लगाने में व्यस्त थे। यह सब देखते हुए उसी कार्यालय में कार्यरत सफाई कर्मचारी राम सुलभ मिश्रा अपने माथे पर हाथ धरे हुए चिंतित अवस्था में कार्यालय परिसर के एक कोने में चुपचाप बैठा हुआ था । तभी कार्यालय के एक क्लर्क की निगाह उस पर पड़ गई ।
”अरे राम सुलभ यहाँ कोने में इस तरह उदास क्यों बैठे हो?” क्लर्क ने उत्सुकता से पूछा ।
राम सुलभ ने नज़रें उठाकर उदासी से क्लर्क को देखते हुए कहा, “कुछ नहीं साब बस चिंता ने दिमाग में डेरा डाल रखा है ।“
“अरे तुम्हें भला किस बात की चिंता हो गई?” क्लर्क ने मुस्काते हुए पूछा।
राम सुलभ ने जोर से साँस छोड़ते हुए कहा, “आरक्षण की कृपा से पोस्ट ग्रेजुएट होते हुए भी मुश्किल से सफाई कर्मचारी की नौकरी नसीब हो पाई थी और अब अगर ये मंत्री और अधिकारी भी झाड़ू लगाने लगे तब तो इस पापी पेट का भगवान ही मालिक है ।“
इतना कहकर राम सुलभ फिर अपने माथे पर हाथ धरकर चिंता में डूब गया ।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 
चित्र गूगल बाबा से साभार 

शनिवार, 23 अगस्त 2014

बिलकुल सच्चा वाला


    शोक अपने कमरे में बैठा शून्य की ओर निहार रहा था कि तभी उसका मोबाइल फोन बजने लगा.
“हैलो दीपक! तू पीछे ही रुक मैं बस दो मिनट में आता हूँ.” इतना कहकर अशोक ने झटपट कपड़े पहने और कमरे के पिछले दरवाजे से बाहर निकल गया.
होस्टल से कुछ दूर झाड़ियों की ओट में दीपक कार लिए खड़ा हुआ था. अशोक ने उससे गले मिलते हुए पूछा, “काम हुआ?”
“हाँ काम तो हो गया. अब काम-तमाम कब करना है?” दीपक हलकी मुस्कराहट के साथ बोला.
अशोक ने भी मुस्कुराने की कोशिश की, “काम-तमाम आज शाम को ही होगा.”
दीपक फिर मुस्कुरा दिया, “लगता है बड़ी जल्दी है जनाब को.”
अशोक ने उसकी मुस्कराहट का बुरा नहीं माना, “कलेजे में आग लग रखी है भाई. उसका काम-तमाम करके ही ठंडक मिलेगी.”
“तो चल तेरे कलेजे को ठंडक पहुँचाकर ही दम लेते हैं. बता कहाँ चलना है?” दीपक ने कार स्टार्ट कर रोड पर दौड़ाते हुए पूछा.
अशोक ने बिना उसकी ओर देखते हुए कहा, “अशोक होटल के पास विनय मार्ग पर बने हनुमान मंदिर में. वहीं मिलेंगे वो.”
दीपक ने एकदम कार में ब्रेक लगाये, “अबे पागल हो गया है तू? वी.आई.पी. एरिया है वो. चारों ओर कितनी तगड़ी सिक्योरिटी रहती है. कहीं और का भी तो प्लान कर सकता था.”
“क्यों डर के मारे अम्मा मर गईं क्या? तुझे तो मैं बड़ा दिलेर मानता था.” अशोक व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए बोला.
दीपक ने अशोक की आँखों में आँखें डालकर कहा, “मेरा जिगरा देखना चाहता है. तू बोल तो सही उसे पी.एम. हाउस के बाहर उड़ाकर आ आऊँ.”
अशोक थोड़ा शांत हुआ, “उसे उड़ाना तो मुझे ही है. बस तुझे जो कहा है उसे करता जा.”
दीपक ने कार फिर से स्टार्ट कर दी, “जैसी तेरी मर्जी. ये पकड़ रिवोल्वर और ये कारतूस. बस बारह हैं. छः रिवोल्वर में लोड हैं और छः इमरजेंसी के लिए.”
अशोक ने रिवोल्वर का मुआयना किया, “ओरिजिनल है न? पता चला कि देशी कट्टे की तरह फायर करते ही फट जाये और खुद के साथ-साथ मेरा हाथ भी उड़ा दे.”
“अबे ध्यान से देख जर्मनी मेड है. जिससे ली है साले ने पचास हजार किराया लिया है आज-आज का. फुल गारन्टी दी है चलने की. वरना पूरे पैसों के साथ दस हजार एक्स्ट्रा वापसी देगा.” दीपक ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा.
अशोक का एक बार रिवोल्वर का ठीक से मुआयना करने का था, “एक राउंड में ही उसका काम-तमाम हो जाएगा. दूसरे की जरूरत ही न पड़े शायद.”
“अरे एक गोली में ही उसका राम नाम सत्य हो जाएगा.” दीपक ने बेफिक्री से सिगरेट का धुआँ छोड़ते हुए कहा.
अशोक की आखें खून से लाल हो गईं, “एक गोली से काम नहीं चलेगा. छः की छः गोलियाँ उसके सीने पर उतारकर ही दम लूँगा.”
“जितनी चाहे गोलियाँ उसके सीने में उतार लेना पर दो-चार गोलियाँ बचाकर भी रखनी पड़ेगी. बचकर भागने के काम आएँगी.” ट्रैफिक जाम से उलझते हुए दीपक बोला.
“और अगर ऐसा ट्रैफिक जाम रहा तो फिर तो भाग लिए.” और कार के भीतर हँसी से माहौल कुछ पलों के लिए हल्का हो गया.
“ये पकड़ इसे रिवोल्वर की नली में पर लगा ले. इसे साइलेंसर कहते हैं. इससे गोली चलने की आवाज नहीं आएगी और जब तक लोगों को पता चलेगा कि उसे गोली लगी है तब तक हम दोनों जाने कहाँ पहुँच चुके होंगे.” दीपक ने साइलेंसर अशोक के हाथ में थमा दिया.
कुछ देर रूककर दीपक ने अशोक से पूछा, “यार ये इतना सब हो कैसे गया? आखिर कहानी क्या है?”
दीपक ने मानो अशोक की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो, “स्कूल खत्म होते ही तूने तो मेरा साथ छोड़कर पूना की राह पकड़ ली और मैं यहाँ दिल्ली आ गया. जैसे तेरे माँ-बाप तुझे इंजीनियर बनाने के इच्छुक थे, वैसे ही मेरे माँ-बाप मुझे आई.ए.एस. बनाना चाहते थे सो ग्रेजुएशन करने दिल्ली भेज दिया. दो साल तो बढ़िया बीते लेकिन तीसरे साल अपने कोर्स की सेकेंड इयर की स्टूडेंट निशा से दिल लग गया. हालाँकि एक-दूसरे का साथ पाकर हम दोनों की ही पढ़ाई-लिखाई पर कोई कोई आँच न आई, बल्कि पहले से बेहतर हुई. फाइनल इयर में मैंने अच्छा स्कोर किया और उसने भी अपनी क्लास में सेकेण्ड डिवीजन हासिल की. इस एक साल में हमारा प्यार परवान चढ़ चुका था और हम दो दिल एक जान हो चुके थे.”
“मतलब कि तूने हम बिहारियों की उस परंपरा को जारी रखने का जिम्मा उठा लिया था, कि बिहार से बाहर पढ़ने जाओ तो एक अच्छी नौकरी और शादी के लिए एक बढ़िया सी छोकरी ढूँढकर ही बिहार को लौटो.” दीपक ने अशोक के हाथ में ताली मारी.
अशोक ने इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
दीपक थोड़ा झेंपते हुए बोला, “सॉरी यार मैं तो बस मजाक कर रहा था. अच्छा आगे क्या हुआ?”
“इधर निशा ने ग्रेजुएशन क्या की उसके घरवालों को उसकी शादी की चिंता लग गई. उसने मुझसे कहा कि मैं उसके मम्मी-डैडी से बात करूँ. एक दिन डरते-डरते मैं उसके घर पर निशा का रिश्ता माँगने गया. उसके मम्मी-डैडी से मैंने निशा का हाथ माँगा, लेकिन...” अशोक इससे पहले अपनी बात पूरी कर पाता दीपक ने बेचैनी से पूछा, “लेकिन क्या?”
“उसके बाप ने मेरे सामने एक अनोखी शर्त रख दी.” अशोक ने उदासी में कहा.
दीपक ने उत्सुकता पूछा, “कैसी शर्त.”
अशोक ने बिना दीपक की ओर देखे बोलना जारी रखा, “शर्त थी कि मुझे शादी के बाद निशा के बाप का सरनेम लगाना पड़ेगा. मुझे मिश्रा से गुप्ता बनना था.”
“अबे यार बस इतनी छोटी सी शर्त थी. तुझे बिना सोचे मान लेनी चाहिए थी.” दीपक कार की रफ़्तार को थोड़ा और तेज करते हुए बोला.
अशोक ने दीपक को धिक्कारते हुए देखा, “यह छोटी सी शर्त है. अपने वजूद को खत्म करके दूसरे के खोल में तू शायद जी ले पर मैं नहीं जी सकता.”
दीपक को अशोक की सोच पर तरस आ रहा था, “मेरे भाई कुछ नहीं रखा जात-पात में. ये सब पुरानी बातें हो गईं हैं.”
“वैसे तो मैं भी जाति के प्रति इतना कट्टर नहीं हूँ. अगर होता तो निशा से दिल नहीं लगाता. पर ये मामला कुछ अलग हो गया था. सोचो अगर मैं मिश्रा से गुप्ता बन जाता तो तेरे जैसे दोस्त ही मजाक कर-करके जीना हराम कर देते मेरा.” अशोक ने अपनी सफाई पेश की.
दीपक ने दूसरी सिगरेट जला ली और कश मारने लगा,”तेरी गलतफहमी थी ये. खैर छोड़ आगे क्या हुआ बता.”
अशोक हालाँकि दीपक को थोड़ी-थोड़ी देर में सिगरेट सुलगाने पर टोकना चाहता था, लेकिन फिर सिगरेट को भूलकर अपनी कहानी पर आ गया, “होना क्या था जब मैंने निशा के बाप का सुझाव नहीं माना तो उसने मुझसे कहा कि अगर मिश्रा से गुप्ता नहीं बनोगे तो निशा के जीवन से दूर जाना पड़ेगा.”
दीपक ने कार के शीशे में अपने बिखरे बालों को सँवारते हुए पूछा, “तो निशा ने अपने पापा से विरोध नहीं दर्शाया? आखिर तू ही तो उसे नहीं चाहता था वो भी तो तुझे प्यार करती थी.”
“हाँ उसने विरोध किया और बदले में अपने माँ का जोरदार झापड़ भी खाया. एक-दिनों में जब मामला नोर्मल हुआ तो वो मेरे पास आई भी.” अशोक के चेहरे पर हलकी सी मुसकुराहट आई.
दीपक से अशोक की चुप्पी बर्दाश्त न हुई,”अच्छा वो तेरे पास आई तो क्या वो शादी के लिए राजी थी.”
अशोक दीपक के मस्तिष्क में मूर्खता के कीटाणु खोजने की कोशिश कर रहा था, “राजी न होती तो क्यों आती. वह अपने बाप के इस निर्णय के समर्थन में नहीं थी. हमने फैसला किया कि हम चुपचाप कोर्ट में जाकर कानूनी तौर पर एक-दूसरे के हमसफ़र बन जायेंगे.”
“गुड तो मतलब तुम दोनों ने जाकर कोर्ट में जाकर शादी कर ली.” दीपक ने उत्साहित हो कहा.
अशोक को वह कहावत याद आ रही थी कि सिगरेट के एक तरफ धुआँ और दूसरी ओर गधा होता है. अब दीपक का चेहरा उसे गधे में परिवर्तित होता दिखने लगा, “नहीं की.”
दीपक आधी बची सिगरेट को एक कश में ही पी गया, “नहीं की. अबे क्यों नहीं की जब लड़की थी राजी तो क्या करता काजी?
“काजी यानि उसके पाजी बाप ने हमारी शादी नहीं होने दी. मैंने कोर्ट से शादी की तारीख लेकर निशा को बता दिया था. पूरे दिन कोर्ट के बाहर इंतज़ार करता रहा लेकिन निशा नहीं आयी.” अचानक अशोक की आखों में नमी छा गई.
“आई नहीं या फिर हो सकता है उसे आने ही नहीं दिया दिया गया हो.” दीपक ने अशोक को सांत्वना देने का प्रयास किया.
अशोक थोड़ा नोर्मल होते हुए बोला, “उस शाम को निशा का फोन आया कि वह मुझसे शादी नहीं कर सकती. उसने बताया कि उसके बाप ने उसके लिए मुझसे भी अच्छा लड़का ढूँढा है. जिसके साथ वह खुश रहेगी.”
“तुझे लगता है कि निशा ने अपने आप यह कहा होगा.” दीपक ने उसे समझाने की कोशिश की.
अशोक की आँखों में अचानक नमी की बजाय रक्त उतर आया, “अपने आप कहा हो या फिर उससे कहलाया गया हो. निशा को बेवफाई की सज़ा तो मिलकर रहेगी.”
“वो तो खैर तू दे ही देगा, लेकिन एक बात बता तुझे कैसे पता चला कि निशा आज हनुमान मंदिर में आ रही है.” दीपक ने अपनी उलझन दूर करनी चाही.
अशोक अजीब से अंदाज में मुस्कुराया, “निशा के पति की फेसबुक प्रोफाइल में मैं लड़की का फर्जी एकाउंट बना कर निशा की शादी के अगले रोज ही बैठ गया था. दो दिन पहले ही उसने फेसबुक पर अपडेट डाला था कि हनीमून मनाने के बाद आज हनुमान मंदिर में हवन का आयोजन करवाएगा.”
“हा हा हा यार ये फेसबुक ने तो लोगों की लाइफ ही बदलकर रख दी है. नहाना, धोना, हगना सब फेसबुक पर ही होता है. लाइक और कमेंट के लालच में लोग अपने घर की औरतों की ऐसी नुमाइश करते हैं जैसे फेसबुक न हो गई कोई रंडी बाज़ार हो गया. फेसबुक के जरिये एक-दूसरे के बेडरूम तक की खबर लोगों को रहने लगी है.” दीपक दिल खोलकर हँसा.
अशोक के चेहरे से तो मानो हँसी पास आकर छिटककर अलग हो जा रही थी, “बस यहीं कार रोक ले. यहाँ से पाँच सौ मीटर आगे ही मंदिर है. तू मुझे यहीं उतारकर मंदिर से करीब पाँच सौ मीटर दूर जाकर मेरा इंतज़ार करना और मेरे मोबाईल की मिस्ड काल मिलते ही कार स्टार्ट करके भागने के लिए तैयार रहना.”
“ओके बॉस! पर एक बात तो बता. तूने निशा से बिलकुल सच्चा वाला ही प्यार किया था न कहीं ये टाइम पास वाला प्यार तो नहीं था. अगर टाइम पास वाला था तो रिस्क मत ले अपनी जान का.” दीपक ने अशोक को टोकते हुए कहा.
अशोक का खून खौल उठा, “साले पहली बात तो ये कि तुझे बचपन से समझाता आ रहा हूँ, कि कभी शुभ काम में जाते हुए किसी को टोका नहीं जाता. दूसरी बात कि मैंने निशा से बिलकुल सच्चा वाला प्यार ही किया था और उसने फिर भी मुझे धोखा दिया और इसी की सज़ा उसे देने जा रहा हूँ.”
दीपक ने अशोक से उलझना मुनासिब नहीं समझा और चुपचाप उसे अपने मकसद में कामयाब होने की दुआ देते हुए जाने दिया. करीब आधा घंटा ही बीता था कि अशोक कार का दरवाजा खोलकर दीपक के बगल में आकर बैठ गया.
“तूने तो आने से पहले मिस्ड काल मारने को कहा था. निशा का कामतमाम कर आया?” दीपक ने हैरान हो पूछा.
“नहीं” अशोक का जवाब मिला.
“नहीं. क्यों नहीं टपकाया उसे? साले उसने तुझे धोखा दिया था. मतलब कि आज हमने बिना-बात में ऐसी-तैसी मरवाई और पचास हजार का खून हुआ सो अलग.” दीपक अचानक तैश में आ गया.
अशोक के चेहरे पर शांति थी, “तूने मुझसे जाते हुए पूछा था न कि मैंने निशा को बिलकुल सच्चा वाला प्यार ही किया था. हाँ मैंने उससे बिलकुल सच्चा वाला प्यार ही किया था. यहाँ से मैं गया तो था उसे इस दुनिया से दूर भेजने के लिए, लेकिन जब निशा का मासूम चेहरा देखा तो विचार बदल गया. वह तो मुझे बहुत प्यार करती थी. शायद रही होगी कोई उसकी भी मजबूरी. अगर उससे मेरी शादी नहीं हो पाई तो उससे मेरा प्यार खत्म तो नहीं हो गया. क्या प्रेम केवल दो शरीरों का ही मिलन है? दो आत्माओं का मिलन भी तो प्रेम ही होता है. निशा प्रत्यक्ष रूप से मेरी न हो सकी पर अप्रत्यक्ष रूप से सदा मेरी ही रहेगी और मैं भी उसे यह अहसास दिलाऊँगा कि मेरे दिल में उसके लिए कोई मैल नहीं है. उसे जब  भी मेरे सच्चे प्यार का अहसास होगा तो वह अपने फैसले पर जरूर पछताएगी और एक दिन ऊपरवाले से दुआ माँगेगी कि अगले जन्म में जीवनसाथी के रूप में उसे मैं ही मिलूँ.”

“तुम साले आशिक लोगों को भी भगवान चुनकर ही बनाता है.” इतना कहकर दीपक ने कार दौड़ा दी.     

सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

व्यंग्य : लिफ़ाफे के भीतर


   हर की उस छोटी सी कॉलोनी में उस रोज विद्रोह की सुगबुगाहट होने लगी, जब उस कालोनी की सीवर लाइन जाम हो जाने के कारण बिजली घर पूरी तरह भर गए। मज़बूरन बिजली विभाग के कर्मचारियों को उस कालोनी की बिजली की सप्लाई काटनी पड़ी। मई के गर्म महीने में बिना बिजली के कॉलोनीवालों के तपते हुए शरीरों में उनके मस्तिष्क भी बुरी तरह तपकर भट्टी का रूप धारण कर चुके थे। कॉलोनीवालों के एक परिचित पत्रकार से उनकी दुर्दशा न देखी गई और उसने जिम्मेदारी संभाली कि वह अपने अख़बार के माध्यम से कॉलोनीवासियों की समस्या का समाधान करने का भरकस प्रयत्न करेगा। जब वह पत्रकार उस कॉलोनी में अपने फोटोग्राफर के साथ उस खबर को कैद करने के लिए पहुँचा तो वहाँ परेशान कॉलोनीवासियों के दुखों को सुनकर उसकी भी आँखें भर आईं। उसने उस कॉलोनी की समस्या को राई का पहाड़ बताकर अपने अख़बार में प्रमुखता से छपवाया। अख़बार में खबर आते ही नेता व सम्बंधित विभागों के अधिकारी गण आकर कॉलोनी में हाजिरी लगाने लगे। पत्रकार भी इस दौरान कॉलोनी में हाज़िर रहा। उसने एक बात महसूस की कि कोई भी नेता अथवा अधिकारी कॉलोनी में आता तो चुपचाप एक बंद लिफाफा कॉलोनी की एसोसिएशन के अध्यक्ष के हाथों में पकड़ाकर चला जाता। लिफाफा हाथ में आते ही अध्यक्ष महोदय बाकी कालोनी वासियों के साथ चुपचाप अपने-अपने घरों में विश्राम करने चल पड़ते। कई दिनों तक यह सिलसिला चला। पत्रकार इस दौरान शांत होकर इस सारी प्रक्रिया का साक्षी बना रहा। अब उस पत्रकार को अध्यक्ष के लिफाफा लेने की क्रिया पर बहुत क्रोध आने लगा था। उसने काफी सोच-विचार के उपरांत यह अनुमान लगाया कि हो न हो अध्यक्ष महोदय को इस बात को यहीं दबाने के एवज में लिफाफे में बंद करके गुपचुप तरीके से रकमरूपी रिश्वत दी जा रही है जिसमें कालोनीवालों की भी गुप्त सहमति है। पत्रकार ने निश्चय किया कि वह अध्यक्ष और कॉलोनीवालों को अकेले-अकेले रकम नहीं डकारने देगा। अब वह अगले दिन की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगा। अगले दिन एक और अधिकारी महोदय कॉलोनी में पधारे और कुछ देर के विचार-विमर्श के पश्चात उन्होंने भी अध्यक्ष की ओर चुपके से एक लिफाफा बढ़ा दिया, जिसे पत्रकार ने चीते सी फुर्ती दिखाकर अध्यक्ष का प्रतिनिधि बताकर बीच में ही झटक लिया। उस अधिकारी के चले जाने के बाद पत्रकार ने अनुभव किया कि लिफाफे के भीतर कुछ हलचल हो रही है। 
पत्रकार ने घबराते हुए पूछा, "कौन है लिफ़ाफ़े के भीतर?" 
तभी लिफाफे का मुँह थोड़ा सा खुला और उससे से आवाज आई, "जी मैं आश्वासन हूँ"।

सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 


शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

व्यंग्य : शोध


    मेवालाल मस्तपुरा गाँव के मुख्य रास्ते पर खड़ा हुआ था. उस गाँव के प्रधान से मेवा लाल को ज्ञात हुआ था कि जिस जगह वह खड़ा हुआ था वह गाँव की मुख्य सड़क थी. उसने कड़ी मशक्कत की ताकि वह यह जान सके कि आखिर किस कोण से वह सड़क की श्रेणी में रखी जा सकती थी? सड़क होने का कोई भी तत्व उसके भीतर फिलहाल तो कोई दिखाई नहीं दे रहा था. फिर मेवालाल को प्रोफेसर साब ने शोध के लिए भला वह सड़क ही क्यों दी. अब मेवालाल को अपनी थीसिस उसी सड़क पर, जो न होकर भी शायद थी, लिखनी थी. उसको बिल्कुल भी समझ नहीं आ रहा था कि गाँव के उस कच्चे रास्ते को सड़क बनाकर वह थीसिस आखिर लिखे भी तो कैसे लिखे? गाँव का प्रधान बेशक कहता रहे कि वह कच्चा रास्ता नहीं डामर की पक्की सड़क है लेकिन उस गाँव के बच्चे-बच्चे ने मेवालाल के पूछने पर साफ़-साफ़ बताया है कि वह सिर्फ और सिर्फ कच्चा रास्ता है. फिर प्रधान के कहने पर कच्चा रास्ता भला पक्की सड़क कैसे बन सकती है. हालाँकि प्रधान ने मेवालाल को सरकारी कागजात दिखाकर अपना पक्ष सही सिद्ध करने की कोशिश की थी. उसने मेवालाल को सरकारी कागजों में सड़क के मौजूद होने के सारे सबूत दिखाये और समझाया कि मेवालाल जिसे कच्चा रास्ता समझने की इतने दिनों से भूल कर रहा था वह वास्तव में पक्की सड़क ही थी लेकिन मेवालाल के मन ने फिर भी कच्चे रास्ते को पक्की सड़क मानने से साफ़ इंकार कर दिया. हालाँकि मेवालाल प्रोफेसर साब का बहुत आदर करता था और वह यह भी जानता था कि प्रोफेसर साब उसे कभी भी गलत निर्देश नहीं देंगे लेकिन जब कहीं पर सड़क नाम की कोई चीज हो ही न तो भला कैसे मान लिया जाये कि वो सड़क है. या फिर ऐसा हो सकता है कि यह कोई दिव्य सड़क हो जो सिर्फ सरकारी कागजों में ही दिखाई देती हो. मेवालाल ने वहीं खड़े-खड़े काफी देर तक गंभीर आत्ममंथन किया और प्रोफेसर साब को फोन मिलाकर उन्हें अपनी शंका से परिचित करवाकर उस कच्चे रास्ते को पक्की सड़क न मानने का निर्णय सुना दिया. बदले में उस ओर से प्रोफेसर साब की फटकार मिली और उन्होंने अगली शाम उसे प्रधान के घर पर हाजिर होने का निर्देश दिया. अगली शाम मेवालाल को प्रधान के घर पर प्रोफेसर साब के साथ-साथ उस क्षेत्र के जिलेदार, तहसीलदार व पटवारी उपस्थित मिले. उस रात को रंगीन बनाने में प्रधान ने कोई कसर नहीं छोड़ी और उसी रात मेवालाल को इस परम ज्ञान की अनूभूति हुई कि जिसे वह इतने दिनों से कच्चा रास्ता समझने की भूल कर रहा था वह तो वास्तव में एक अच्छी-खासी सड़क थी और ऐसी दिव्य सड़कों को सिर्फ दिव्य दृष्टि रखनेवाले ही देख सकते हैं. इस परम ज्ञान को प्राप्त करने के बाद मेवालाल  ने अपनी थीसिस तैयार करने में कड़ा परिश्रम किया. थीसिस तैयार करने में मेवालाल को मस्तपुरा गाँव के प्रधान ने भरपूर सहयोग दिया. थीसिस पूरी होने के बाद प्रोफेसर साब के आशीर्वाद से मेवालाल का शोध कार्य संपन्न हुआ और मेवालाल को मेवालाल से डॉक्टर मेवालाल बनने में अधिक समय नहीं लगा. 


सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत 
कार्टून गूगल बाबा से साभार 

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

निंदा टु निंद्रा



   निंदा नामक क्रिया हम भारतीयों को इतनी अधिक भाती है, कि इस क्रिया को कर-करके भी हम लोग बिलकुल भी नहीं थकते। घरोंगलीमोहल्लोंबाजारों व कार्यालयों में जब भी हमें अवसर मिलता है हम तन्मयता से निंदा रुपी क्रिया में तल्लीन हो जाते हैं। हमारी निंदा का पात्र अक्सर वह बेचारा मानव होता हैजो किसी न किसी मामले में हमसे बीस होता है और हम स्वयं के उन्नीस रह जाने का बदला उससे उस पर निंदा शस्त्र का प्रयोग करके लेते रहते हैं। हम चाहकर भी निंदा से दूरी नहीं बना पाते। हमारी अक्षमता हमें निंदा से चिपके रहने को विवश किये रहता है। वैसे निंदा झेलनेवाले को निंदा से हानि की बजाय लाभ ही अधिक रहता है। वह नियमित निंदा नामक शस्त्र का मुकाबला करते-करते और अधिक चुस्त-दुरुस्त होकर चपलता प्राप्त कर लेता है और हम निंदा में खोये हुए जस के तस बने रहते हैं। निंदा झेलनेवाला कबीर के दोहे "निंदक नियरे राखियेआँगन कुटी छवाय। बिन पानीसाबुन बिना,निर्मल करे करे सुभाय।।" से प्रेरणा लेकर हम निंदकों की निंदा को झेलते हुए प्रगति के पथ पर निरंतर बढ़ता रहता है और हम कुंए के मेढक बनकर अपने उसी छोटे से संसार में मस्त रहते हुये दिन-रात निंदा में लगे रहते हैं। हम भारतवासियों के साथ-साथ हमारे द्वारा चुनकर संसद के प्रतिनिधि भी निंदा नामक क्रिया का प्रयोग करने में अत्यधिक सुखद अनुभूति का अनुभव करते हैं। विशेषरूप से विपक्ष में बैठने के लिए विवश होनेवाले प्रतिनिधियों के लिए तो यह क्रिया संसद के होनेवाले अधिवेशनों को बिताने का एकमात्र मुख्य साधन है। सत्ता पक्ष चाहे जितना भी अच्छा काम कर लेलेकिन विपक्ष उसके हर कार्य में खोट निकालते हुए अपने निंदा रुपी कर्तव्य का पालन अवश्य करेगा। हालाँकि सत्ता पक्ष अपने कार्य में लीन रहते हुए विपक्षी निंदकों को आये दिन ठेंगा दिखाता रहता है। कभी-कभी ऐसा अवसर भी आता हैकि जब निंदक निंदा करते हुए  सदन में बैठे-बैठे निंद्रा में ही खो जाते हैं और स्वयं ही निंदा के पात्र बन जाते हैं। असल में उन्हें यह बात धीमे-धीमे समझ में आने लगती है कि जब-जब भी किसी देश की जानता जाग उठती है तो अक्षमों व नालायकों को निंदा करते-करते संसद में निंद्रा में खोते हुए ही अपना वक़्त बिताना पड़ता है।

सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

चित्र गूगल से साभार 

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