बुधवार, 31 दिसंबर 2014

लघु कथा : बदला


रजत ने जैसे ही फ़िल्म की सी.डी. खरीदने के लिए उठाई तो नितिन को गुस्सा आ गया।
नितिन- "रजत तुझे शर्म-वर्म है कि नहीं?"
रजत- "क्यों दोस्त क्या बात हो गई?"
नितिन- "तू उस फ़िल्म की सी.डी. खरीद रहा है, जिसमें हमारे धर्म का मजाक उड़ाया गया है और हमारे देवी-देवताओं का अपमान किया गया है।"
रजत- "इसीलिए तो इस फ़िल्म की लोकल सी.डी. खरीद रहा हूँ, ताकि अपने धर्म और देवी-देवताओं के अपमान का बदला लिया जा सके"
नितिन- "मैं कुछ समझा नहीं।"
रजत- "इस फ़िल्म में हमारे धर्म और देवी-देवताओं का अनादर किया गया है। यह जानते हुए भी अपने धर्म के कुछ तथाकथित विद्वान लोग इस फ़िल्म को देखने की इच्छा करेंगे। मैं उन तथाकथित विद्वानों को इस फ़िल्म की लोकल सी.डी. को कॉपी करके मुफ़्त में बाटूँगा, जिससे कि वे सभी इस फ़िल्म को सिनेमाघर में जाकर देखने की बजाय अपने घर पर ही देखें। इस प्रकार मेरे और मेरे जैसे अनेक लोगों के इस छोटे से प्रयास से फ़िल्म निर्माता का आर्थिक रूप से नुकसान होगा और वह आइन्दा से किसी भी धर्म या जाति का अपमान करनेवाली फ़िल्में बनाने से बाज आएगा।
नितिन- "अच्छा ऐसा है क्या?" दुकानदार से "भैया इस फ़िल्म की एक लोकल सी.डी. मुझे भी देना।"


रविवार, 7 दिसंबर 2014

व्यंग्य : चूहा मौत जाँच आयोग


     कॉलोनीवाले काफी दिनों से परेशान थे। कॉलोनी में डेरा जमाये हुए चूहों ने उन सबका जीना हराम कर रखा था। आख़िरकार एक दिन ईश्वर ने उनकी सुन ली और उनकी जान आफत में डाले रखनेवाले चूहों का सरदार कॉलोनी के एक घर के स्टोर में धराशाही हुआ मिला। उस एक हाथ लंबे चूहे के शव को देखने के लिए सभी कॉलोनीवासी एकत्र हुए। उन सबके लिए यह बहुत ही सुखद दृश्य था। अब कॉलोनीवासियों के लिए यह शोध का विषय बन चुका था, कि उस बलशाली चूहे की मौत आखिर इतनी आसानी से कैसे हुई? वहाँ उपस्थित जनसमूह में एकत्र व्यक्ति इस विषय पर अपने-अपने तर्क प्रस्तुत कर रहे थे। एक बात गौर करने लायक है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में हम भारतीयों को चाहे कुछ विशेष रूप से प्राप्त न हुआ हो, लेकिन अपने-अपने विचार प्रस्तुत करने और अपने-अपने तर्क देने का अधिकार अवश्य मिल गया है और इसी अधिकार का सदुपयोग करते हुये सभी ने अपने-अपने अनुमानों के घोड़े दौड़ने आरम्भ कर दिए। रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन  के एक कर्मठ सदस्य, जो अपनी नौकरी के दौरान कर्मठता नामक बुराई से दूर ही रहे, ने अपने विचार प्रस्तुत किये कि ये चूहा अभी हाल ही में पड़ोसी राज्य में एक तथाकथित संत के पुलिस द्वारा पकडे जाने के घोर दुःख में डूबकर चल बसा है।
उनके इस तर्क के पक्ष में कुछ नरमुंड हिले तथा नरमुंडों ने नहीं हिलकर अपनी समर्थित न होने की इच्छा प्रदर्शित कर दी।

कॉलोनी की एक चाची गंभीर होकर बोलीं, "ऐसा कुछ भी नहीं हुआ होगा। बल्कि इस चूहे ने जिस स्टोर में अपने प्राण त्यागे, उस स्टोर को इसने अपना अभेद्य किला समझ लिया होगा तथा खुद स्वघोषित संप्रदाय का प्रधान। इसके भ्रम को शेर के मौसा बिलौटे ने तोड़ डाला और अपने खतरनाक पंजों के वार से इसे यमलोक पहुँचा दिया।"
अब कॉलोनी के युवा दल की बारी थी। उनमें से एक युवा ने तर्क दिया, "इस चूहे की मौत हृदयघात से हुई है। कुछ दिन पहले इसके पुत्र को कॉलोनी के एक घर में पिंजरे में फँसा कर मार डाला गया था। अपने पुत्र के वियोग में ही इसके प्राण पखेरू उड़ गए हैं।"

बहरहाल जैसा कि प्रत्येक सभा में होता है वही इस सभा में भी हुआ। बहस आरम्भ हुई और बिना किसी परिणाम के बहस का समापन भी हो गया। अंत में एक बुजुर्ग उठे। कलियुग में वैसे तो बुजुर्गों को इतना सम्मान दिया जाता है कि उनके हाल पर छोड़ना ही हम कलियुगी जीव अपना परम कर्तव्य समझते हैं, लेकिन जब कोई उलझन या परेशानी  आती है तो इन्हीं बुजुर्गों के तजुर्बों के आगे दंडवत होने के लिए हम सभी तत्पर रहते हैं। बहरहाल बुजुर्ग ने राय दी कि इस चूहे की मौत की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया जाए, जिसका नाम रखा जाए "चूहा मौत जाँच आयोग"। यह राय सुनते ही राजनीतिक रूप  से बेरोजगार हुए व्यक्तियों के चमचों की बाछें खिल गईं। उन चमचों के कठिन प्रयत्न आखिर रंग लाये और उस क्षेत्र के भूतपूर्व विधायक के नेतृत्व में पिछले चुनावों में अपनी जमानत जब्त करवा चुके निगम पार्षदों ने इस आयोग का जिम्मा संभाला। अब कॉलोनी वालों को प्रतीक्षा है कि "चूहा मौत जाँच आयोग" कब और क्या रिपोर्ट देता है? जबकि "चूहा मौत जाँच आयोग" के सम्मानित अध्यक्ष व सदस्य इस इंतज़ार में हैं कि कॉलोनी में किसी और बलशाली चूहे की मौत हो और इस चूहे की फ़ाइल बंद करके अगले चूहे की मौत पर व्यस्तता का बहाना मिल सके।


रविवार, 30 नवंबर 2014

लघु कथा : बराबरी


बस में काफी भीड़ थी। सलमा बस में अपनी सहेली के साथ महिला सीट पर बैठी हुई थी। वह बहुत देर से बस में खड़े हुए एक लड़के को देख रही थी। उस लड़के को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था कि वह बहुत ही थका हुआ था और थकान के मारे उससे खड़ा भी हुआ नहीं जा रहा था। 
अचानक सलमा ने उस लड़के को बुलाते हुए कहा, "भैया आप मेरी सीट पर आकर बैठ जाइए।"
"तू पागल हो गई है जो एक अनजान लड़के को सीट दे रही है।" सलमा की सहेली उसे डाँटते हुए बोली।
सलमा ने मुस्कुराते हुए कहा, "आज के समय में हम महिला और पुरुष की बराबरी की बात करते हैं तो यह बात हमारे व्यवहार में भी होनी चाहिए और मुझे लगता है कि मुझसे ज्यादा उस लड़के को महिला सीट की जरुरत है।"
इतना कहकर सलमा वहाँ से उठकर खड़ी हुई और अपनी सीट उस लड़के को दे दी।

*चित्र गूगल बाबा से साभार 

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

सुश्री रेनू श्रीवास्तव की दृष्टि में व्यंग्यस्ते

     सुमित प्रताप सिंह द्वारा लिखी गई पुस्तक व्यंग्यस्ते पढ़ी। इसमें व्यंग्य पत्र शैली में लिखे गए हैं। लोकतंत्र महाराज को संबोधित पहले पत्र से लेकर रक्त देवता के नाम आखिरी पत्र तक बड़ी सुंदरता से व्यंग्यस्ते को रचा गया है। इस पुस्तक को पढ़ने बैठी तो पढ़ती ही गई और इस पूरी पढ़ने के बाद ही उठी। लेखक की हिंदी भाषा पर पकड़ और शुद्धता प्रशंसनीय है। इतनी गहराई से लेखक ने सामाजिक बुराइयों से लेकर खोखले रीति-रिवाजों पर जो व्यंग्य किये गए हैं, वो समाज का सही आइना प्रस्तुत करते हैं। लेखक के लेखन की नवीनता का प्रभाव ही था जो स्वयं को पूरी पुस्तक पढ़ने से न रोका जा सका। व्यंग्यस्ते में संकलित कुछ व्यंग्यों से मैं बहुत प्रभावित हुई। जो कि इस प्रकार हैं - वेलेंटाइन, जाति प्रथा, गाँव, क्रिकेट, पब प्रेमी बाला, हिंदी, मदिरा रानी इत्यादि। यदि व्यंग्यस्ते जैसी सार्थक पुस्तकें हमारे समाज में सभी को पढ़ने को मिलें, तो शायद कई सामाजिक बुराइयों को अपनाने से पहले व्यक्ति कुछ सोच-विचार कर सकता है तथा इस समाज में बदलाव की सम्भावना उत्पन्न हो सकती हैं। लेखक ने उन छोटी-मोटी समस्याओं पर भी ध्यान आकर्षित किया है, जो वास्तव में हमारे लिए बड़ा महत्त्व रखती हैं और हम अनजाने में जिन्हें नज़र अंदाज कर देते हैं। हर लेखक एक अच्छा लेखक अपने अच्छे विचारों से भी बनता है, क्योंकि जब तक आपके मन में अच्छे विचारों का आवागमन न होगा, तब तक आप अपनी रचना में वैसा आकर्षण उत्पन्न नहीं कर सकते, जो कि किसी भी पाठक को बांधे रखने के लिए आवश्यक होता है। सुमित प्रताप सिंह से मेरा यही निवेदन है कि आप देश व समाज को रचनारूपी अपने नवीन विचारों से ओतप्रोत पुस्तकें निरंतर भेंट करके मार्गदर्शित करते रहें और एक महान लेखक के रूप में उभरें तथा हमारे देशवासियों प्रेरित करने का कार्य करें। मेरे अनुसार लेखक की कलम वह कर सकती जो तलवार नहीं कर पाती। अंत में यही आशा करती हूँ कि आपकी अगली पुस्तक भी इसी तरह लेखकीय सुंदरता  से परिपूर्ण हो और अधिक से अधिक पाठकों को इससे मनोरंजन व ज्ञान प्राप्त हो सके। 
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ
रेनू श्रीवास्तव
लेखक व पत्रकार।

सोमवार, 10 नवंबर 2014

एक पत्र 'किस' के नाम



प्यारी किस 

सादर चुम्बनस्ते!

मन में आज बार- बार यह प्रश्न कौंध रहा है, कि आखिर तुम्हारी उत्पत्ति कब और कैसे हुई होगी? हो न हो तुम्हारा जन्म हृदय में उमड़ने वाली प्रेम की कोमल व पवित्र भावनाओं के संग हुआ होगा  मानव संतति की उत्पति की प्रक्रिया का प्रथम चरण तो तुमसे ही आरंभ हुआ होगा  जब माता-पिता अपनी संतान को स्नेह प्रदान करने हेतु तुम्हारा प्रयोग करते होंगे, तब तो इस धरा पर तुमसे पवित्र कोई नहीं होता होगा  तुम तब भी पवित्रता के आँचल में समा जाती होगी जब दो जीवन साथी आलिंगनबद्ध होकर प्रेम में तल्लीन हो तुम संग स्वप्नलोक में खो जाते होंगें  पर इन दिनों कुछ लोगों के सिर पर जाने कौन सा भूत सवार हो रखा है, कि वो तुम्हारे पावन रूप की बजाय दूषित रूप का प्रचार-प्रसार कर उसे उचित ठहराने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं और तुम्हें पर्दे से बाहर लाकर तुम्हारे पावन रूप को अपवित्र करने पर तुले हुए हैं  अब ये तो तुम भी भली- भांति जानती होगी कि पार्कों, होटलों व मॉलों में वासना का नंगा नाच करते हुए जब तुम्हारा दुरूपयोग किया जाता है तो दुख तो तुम्हें भी होता होगा  प्रेम कोई दिखावे की वस्तु थोड़े ही है  प्रेम तो अनुभव करने की चीज होती है  सार्वजनिक रूप से प्रेम दिखाना प्रेम कम फूहड़ता अधिक होती है और यह फूहड़ता इन दिनों देश में जगह-जगह देखने को मिल रही है  इस फूहड़ता को अपना हथियार बनाकर भारतीय संस्कृति का विध्वंश करने की निरंतर साजिश चल रही है, जिसके लिए कंधा बनने का कार्य कर रहे हैं आधुनिकता के नशे में टुल्ल हो रखे देश के तथाकथित बुद्धिमान युवा जन  ऐसा भी संभव हो सकता है कि इन युवाओं का जन्म भी इनके माता- पिता के किसी फूहड़ प्रयास के द्वारा ही हुआ हो  तभी फूहड़ता को प्रेम की संज्ञा देकर सार्वजनिक रूप से तुम्हारा दुरूपयोग कर इस फूहड़ता अभियान में वृद्धि करने में ये सब लगे हुए हों  जब ये भटके हुए युवा अपनी संस्कृति को भस्म करने की पुरजोर  कोशिश में लगे होते हैं, तो वामपंथ व पाश्चात्य सभ्यता मिलकर प्रसन्नता के गीत गा रहे होते हैं  परंतु इन कुत्सित मानसिकता वाले युवाओं को यह ज्ञात नहीं है कि उनसे अधिक संख्या उन लोगों की है जो अपनी भारतीय संस्कृति से बहुत प्रेम करते हैं तथा इसकी रक्षा करने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं  और इस प्रकार के प्रत्येक अपवित्र प्रयास को विफल कर सकने की क्षमता रखते हैं 

इन मूर्ख युवाओं को ईश्वर सद्बुद्धि दे 
इसी कामना के साथ तुम्हारे पावन रूप को नमन करते हुए सादर प्रणाम...

इस व्यंग्य को सुमित प्रताप सिंह के स्वर में सुनने के लिए कृपया नीचे दिए गए वीडियो लिंक पर क्लिक करें...



शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

लघु कथा : चिंता


   रकारी कार्यालय में स्वच्छता अभियान जोर-शोर से चल रहा था। कार्यालय के सभी बड़े अधिकारी मंत्री जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्यालय के परिसर में झाड़ू लगाने में व्यस्त थे। यह सब देखते हुए उसी कार्यालय में कार्यरत सफाई कर्मचारी राम सुलभ मिश्रा अपने माथे पर हाथ धरे हुए चिंतित अवस्था में कार्यालय परिसर के एक कोने में चुपचाप बैठा हुआ था । तभी कार्यालय के एक क्लर्क की निगाह उस पर पड़ गई ।
”अरे राम सुलभ यहाँ कोने में इस तरह उदास क्यों बैठे हो?” क्लर्क ने उत्सुकता से पूछा ।
राम सुलभ ने नज़रें उठाकर उदासी से क्लर्क को देखते हुए कहा, “कुछ नहीं साब बस चिंता ने दिमाग में डेरा डाल रखा है ।“
“अरे तुम्हें भला किस बात की चिंता हो गई?” क्लर्क ने मुस्काते हुए पूछा।
राम सुलभ ने जोर से साँस छोड़ते हुए कहा, “आरक्षण की कृपा से पोस्ट ग्रेजुएट होते हुए भी मुश्किल से सफाई कर्मचारी की नौकरी नसीब हो पाई थी और अब अगर ये मंत्री और अधिकारी भी झाड़ू लगाने लगे तब तो इस पापी पेट का भगवान ही मालिक है ।“
इतना कहकर राम सुलभ फिर अपने माथे पर हाथ धरकर चिंता में डूब गया ।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 
चित्र गूगल बाबा से साभार 

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

व्यंग्य : लिफ़ाफे के भीतर


   हर की उस छोटी सी कॉलोनी में उस रोज विद्रोह की सुगबुगाहट होने लगी, जब उस कालोनी की सीवर लाइन जाम हो जाने के कारण बिजली घर पूरी तरह भर गए। मज़बूरन बिजली विभाग के कर्मचारियों को उस कालोनी की बिजली की सप्लाई काटनी पड़ी। मई के गर्म महीने में बिना बिजली के कॉलोनीवालों के तपते हुए शरीरों में उनके मस्तिष्क भी बुरी तरह तपकर भट्टी का रूप धारण कर चुके थे। कॉलोनीवालों के एक परिचित पत्रकार से उनकी दुर्दशा न देखी गई और उसने जिम्मेदारी संभाली कि वह अपने अख़बार के माध्यम से कॉलोनीवासियों की समस्या का समाधान करने का भरकस प्रयत्न करेगा। जब वह पत्रकार उस कॉलोनी में अपने फोटोग्राफर के साथ उस खबर को कैद करने के लिए पहुँचा तो वहाँ परेशान कॉलोनीवासियों के दुखों को सुनकर उसकी भी आँखें भर आईं। उसने उस कॉलोनी की समस्या को राई का पहाड़ बताकर अपने अख़बार में प्रमुखता से छपवाया। अख़बार में खबर आते ही नेता व सम्बंधित विभागों के अधिकारी गण आकर कॉलोनी में हाजिरी लगाने लगे। पत्रकार भी इस दौरान कॉलोनी में हाज़िर रहा। उसने एक बात महसूस की कि कोई भी नेता अथवा अधिकारी कॉलोनी में आता तो चुपचाप एक बंद लिफाफा कॉलोनी की एसोसिएशन के अध्यक्ष के हाथों में पकड़ाकर चला जाता। लिफाफा हाथ में आते ही अध्यक्ष महोदय बाकी कालोनी वासियों के साथ चुपचाप अपने-अपने घरों में विश्राम करने चल पड़ते। कई दिनों तक यह सिलसिला चला। पत्रकार इस दौरान शांत होकर इस सारी प्रक्रिया का साक्षी बना रहा। अब उस पत्रकार को अध्यक्ष के लिफाफा लेने की क्रिया पर बहुत क्रोध आने लगा था। उसने काफी सोच-विचार के उपरांत यह अनुमान लगाया कि हो न हो अध्यक्ष महोदय को इस बात को यहीं दबाने के एवज में लिफाफे में बंद करके गुपचुप तरीके से रकमरूपी रिश्वत दी जा रही है जिसमें कालोनीवालों की भी गुप्त सहमति है। पत्रकार ने निश्चय किया कि वह अध्यक्ष और कॉलोनीवालों को अकेले-अकेले रकम नहीं डकारने देगा। अब वह अगले दिन की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगा। अगले दिन एक और अधिकारी महोदय कॉलोनी में पधारे और कुछ देर के विचार-विमर्श के पश्चात उन्होंने भी अध्यक्ष की ओर चुपके से एक लिफाफा बढ़ा दिया, जिसे पत्रकार ने चीते सी फुर्ती दिखाकर अध्यक्ष का प्रतिनिधि बताकर बीच में ही झटक लिया। उस अधिकारी के चले जाने के बाद पत्रकार ने अनुभव किया कि लिफाफे के भीतर कुछ हलचल हो रही है। 
पत्रकार ने घबराते हुए पूछा, "कौन है लिफ़ाफ़े के भीतर?" 
तभी लिफाफे का मुँह थोड़ा सा खुला और उससे से आवाज आई, "जी मैं आश्वासन हूँ"।

सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 


शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

व्यंग्य : शोध


    मेवालाल मस्तपुरा गाँव के मुख्य रास्ते पर खड़ा हुआ था. उस गाँव के प्रधान से मेवा लाल को ज्ञात हुआ था कि जिस जगह वह खड़ा हुआ था वह गाँव की मुख्य सड़क थी. उसने कड़ी मशक्कत की ताकि वह यह जान सके कि आखिर किस कोण से वह सड़क की श्रेणी में रखी जा सकती थी? सड़क होने का कोई भी तत्व उसके भीतर फिलहाल तो कोई दिखाई नहीं दे रहा था. फिर मेवालाल को प्रोफेसर साब ने शोध के लिए भला वह सड़क ही क्यों दी. अब मेवालाल को अपनी थीसिस उसी सड़क पर, जो न होकर भी शायद थी, लिखनी थी. उसको बिल्कुल भी समझ नहीं आ रहा था कि गाँव के उस कच्चे रास्ते को सड़क बनाकर वह थीसिस आखिर लिखे भी तो कैसे लिखे? गाँव का प्रधान बेशक कहता रहे कि वह कच्चा रास्ता नहीं डामर की पक्की सड़क है लेकिन उस गाँव के बच्चे-बच्चे ने मेवालाल के पूछने पर साफ़-साफ़ बताया है कि वह सिर्फ और सिर्फ कच्चा रास्ता है. फिर प्रधान के कहने पर कच्चा रास्ता भला पक्की सड़क कैसे बन सकती है. हालाँकि प्रधान ने मेवालाल को सरकारी कागजात दिखाकर अपना पक्ष सही सिद्ध करने की कोशिश की थी. उसने मेवालाल को सरकारी कागजों में सड़क के मौजूद होने के सारे सबूत दिखाये और समझाया कि मेवालाल जिसे कच्चा रास्ता समझने की इतने दिनों से भूल कर रहा था वह वास्तव में पक्की सड़क ही थी लेकिन मेवालाल के मन ने फिर भी कच्चे रास्ते को पक्की सड़क मानने से साफ़ इंकार कर दिया. हालाँकि मेवालाल प्रोफेसर साब का बहुत आदर करता था और वह यह भी जानता था कि प्रोफेसर साब उसे कभी भी गलत निर्देश नहीं देंगे लेकिन जब कहीं पर सड़क नाम की कोई चीज हो ही न तो भला कैसे मान लिया जाये कि वो सड़क है. या फिर ऐसा हो सकता है कि यह कोई दिव्य सड़क हो जो सिर्फ सरकारी कागजों में ही दिखाई देती हो. मेवालाल ने वहीं खड़े-खड़े काफी देर तक गंभीर आत्ममंथन किया और प्रोफेसर साब को फोन मिलाकर उन्हें अपनी शंका से परिचित करवाकर उस कच्चे रास्ते को पक्की सड़क न मानने का निर्णय सुना दिया. बदले में उस ओर से प्रोफेसर साब की फटकार मिली और उन्होंने अगली शाम उसे प्रधान के घर पर हाजिर होने का निर्देश दिया. अगली शाम मेवालाल को प्रधान के घर पर प्रोफेसर साब के साथ-साथ उस क्षेत्र के जिलेदार, तहसीलदार व पटवारी उपस्थित मिले. उस रात को रंगीन बनाने में प्रधान ने कोई कसर नहीं छोड़ी और उसी रात मेवालाल को इस परम ज्ञान की अनूभूति हुई कि जिसे वह इतने दिनों से कच्चा रास्ता समझने की भूल कर रहा था वह तो वास्तव में एक अच्छी-खासी सड़क थी और ऐसी दिव्य सड़कों को सिर्फ दिव्य दृष्टि रखनेवाले ही देख सकते हैं. इस परम ज्ञान को प्राप्त करने के बाद मेवालाल  ने अपनी थीसिस तैयार करने में कड़ा परिश्रम किया. थीसिस तैयार करने में मेवालाल को मस्तपुरा गाँव के प्रधान ने भरपूर सहयोग दिया. थीसिस पूरी होने के बाद प्रोफेसर साब के आशीर्वाद से मेवालाल का शोध कार्य संपन्न हुआ और मेवालाल को मेवालाल से डॉक्टर मेवालाल बनने में अधिक समय नहीं लगा. 


सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत 
कार्टून गूगल बाबा से साभार 

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

निंदा टु निंद्रा



   निंदा नामक क्रिया हम भारतीयों को इतनी अधिक भाती है, कि इस क्रिया को कर-करके भी हम लोग बिलकुल भी नहीं थकते। घरोंगलीमोहल्लोंबाजारों व कार्यालयों में जब भी हमें अवसर मिलता है हम तन्मयता से निंदा रुपी क्रिया में तल्लीन हो जाते हैं। हमारी निंदा का पात्र अक्सर वह बेचारा मानव होता हैजो किसी न किसी मामले में हमसे बीस होता है और हम स्वयं के उन्नीस रह जाने का बदला उससे उस पर निंदा शस्त्र का प्रयोग करके लेते रहते हैं। हम चाहकर भी निंदा से दूरी नहीं बना पाते। हमारी अक्षमता हमें निंदा से चिपके रहने को विवश किये रहता है। वैसे निंदा झेलनेवाले को निंदा से हानि की बजाय लाभ ही अधिक रहता है। वह नियमित निंदा नामक शस्त्र का मुकाबला करते-करते और अधिक चुस्त-दुरुस्त होकर चपलता प्राप्त कर लेता है और हम निंदा में खोये हुए जस के तस बने रहते हैं। निंदा झेलनेवाला कबीर के दोहे "निंदक नियरे राखियेआँगन कुटी छवाय। बिन पानीसाबुन बिना,निर्मल करे करे सुभाय।।" से प्रेरणा लेकर हम निंदकों की निंदा को झेलते हुए प्रगति के पथ पर निरंतर बढ़ता रहता है और हम कुंए के मेढक बनकर अपने उसी छोटे से संसार में मस्त रहते हुये दिन-रात निंदा में लगे रहते हैं। हम भारतवासियों के साथ-साथ हमारे द्वारा चुनकर संसद के प्रतिनिधि भी निंदा नामक क्रिया का प्रयोग करने में अत्यधिक सुखद अनुभूति का अनुभव करते हैं। विशेषरूप से विपक्ष में बैठने के लिए विवश होनेवाले प्रतिनिधियों के लिए तो यह क्रिया संसद के होनेवाले अधिवेशनों को बिताने का एकमात्र मुख्य साधन है। सत्ता पक्ष चाहे जितना भी अच्छा काम कर लेलेकिन विपक्ष उसके हर कार्य में खोट निकालते हुए अपने निंदा रुपी कर्तव्य का पालन अवश्य करेगा। हालाँकि सत्ता पक्ष अपने कार्य में लीन रहते हुए विपक्षी निंदकों को आये दिन ठेंगा दिखाता रहता है। कभी-कभी ऐसा अवसर भी आता हैकि जब निंदक निंदा करते हुए  सदन में बैठे-बैठे निंद्रा में ही खो जाते हैं और स्वयं ही निंदा के पात्र बन जाते हैं। असल में उन्हें यह बात धीमे-धीमे समझ में आने लगती है कि जब-जब भी किसी देश की जानता जाग उठती है तो अक्षमों व नालायकों को निंदा करते-करते संसद में निंद्रा में खोते हुए ही अपना वक़्त बिताना पड़ता है।

सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

चित्र गूगल से साभार 

बुधवार, 2 जुलाई 2014

ठाकुर वर्सेज अत्याचार

अपने चचेरे भाई के बेटे को रास्ते में स्कूल का बस्ता लिए उदास बैठे देखा तो उसकी उदासी का कारण जानने की इच्छा हुई.
अंकित यहाँ कैसे उदास बैठे होआज स्कूल क्यों नहीं गए?”
चाचू मेरा स्कूल जाने का मन नहीं करता.” .
ऐसा क्यों?”
वहाँ सब मुझे ठाकुर-ठाकुर कहके चिढ़ाते हैं.
तो तुम ठाकुर कहे जाने पर चिढ़ते क्यों होयह तो गर्व की बात है कि तुम ठाकुर अर्थात क्षत्रिय जाति में पैदा हुए. इसमें तो जन्म लेने को लोग तरसते हैं.
गर्व नहीं मुझे तो शर्म आती है कि मैं ठाकुर जाति में पैदा क्यों हुआ?”
कैसी मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे होऐसा कहके तुम अपने वीर पूर्वजों का अपमान कर रहे हो.
इसमें मैंने गलत क्या कहाठाकुर जैसी अत्याचारी जाति में पैदा होना शर्म की बात नही है तो क्या गौरव की बात है?”
तुमसे किसने कह दिया कि ठाकुर जाति अत्याचारी है?
किसी भी चैनल को खोलकर देख लें. उसमें आने वाले सीरियल और फिल्मों में ठाकुरों को बलात्कारीअत्याचारी और कुकर्मी के रूप में ही दिखाया जाता है. कहते हैं सिनेमा तो समाज का आइना होता है उसमें वही दर्शाया जाता है जो समाज में घटित हो रहा होता है.
बेटा अंकित जैसे हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती वैसे ही सीरियल और फिल्मों में दिखलाई जाने वाली हर बात सत्य नहीं होती.
ये आप कैसे कह सकते हैं?”
ठाकुर वह जाति है जिसने समाज की रक्षा के लिए समय-समय अपने प्राणों की आहुति दी हैकई बार तो पूरा का पूरा कुल ही समाज और अपनी माटी की रक्षा करते हुए खत्म हो गया. जो समाज और धरती के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दे वह जाति भला अत्याचारी अथवा कुकर्मी कैसे हो सकती है?”
तो चाचू हम लोगों को सिनेमा में ऐसा क्यों दिखाया जाता है?”
हमें ऐसा दिखाने वाले सड़ी मानसिकता के वो लोग हैं जिन्होनें मुस्लिम शासकों और अंग्रेजों के तलवे चाटे और अपना स्वार्थ सिद्ध किया. चूँकि हमारी जाति विदेशियों को मिटाने की भावना से निरंतर प्रयास करती रही इसलिए हमारे साथ बैर भावना से कार्य किया गया. आजादी के बाद हमारी जमीनें हड़प ली गईं अथवा किसी न किसी बहाने से हमारी आर्थिक रूप से कमर तोड़ दी गई. कारण था कि कहीं हम एकजुट होकर देश को एक सुदृण शासन न दे दें. इसी साजिश के तहत हमारी नकारात्मक भूमिकाओं को फिल्मों व धारावाहिकों से वृहत रूप देकर हमें निरंतर लज्जित किया जाता है. ताकि हम गौरवहीन व तेजहीन होकर इतिहास के पन्नों में खोकर रह जाएँ.
चाचू यानि कि जो कुछ हमारे बारे में दिखाया जाता है वह सब झूठ है.
हाँ बिल्कुल सफेद झूठ है. ठाकुर कभी भी जातिवादी या अत्याचारी नहीं रहा है. इतिहास गवाह है. रघुकुल के श्री राम का दलित महिला शबरी के झूठे बेर खाने का उदाहरण ले लो या फिर महाराणा प्रताप का भीलों के साथ मिलकर मुगलों से मोर्चा लेने का उदाहरण. ऐसे न जाने कितने उदाहरण यही दर्शाते हैं कि ठाकुर लोग सभी जातियों से बंधुत्व भाव रखते थे और सबसे बड़े ठाकुर अपने भोलेनाथ को ही ले लो वो तो सम्पूर्ण हिन्दू जाति के सबसे पूजनीय देवता हैं. एक बात और समय-समय इस धरा से पापियों और उनके अत्याचारों अथवा समाज से बुराइयों को समाप्त करने के लिए ईश्वर ने क्षत्रिय कुल में राम, कृष्ण, महावीर व बुद्ध जैसे देव पुरुषों के रूप में अवतार लिए. इसलिए याद रखना कि हम ठाकुर प्रत्येक जाति व संप्रदाय के साथ सदैव मिलजुल कर रहे हैं तथा हमारे मन में किसी जाति के प्रति भेदभाव नहीं रहा है. यदि ठाकुर जाति अत्याचारी होती तो भारत में ठाकुर के अलावा किसी और जाति का अवशेष बाकी न बचता. यदि ठाकुरों में जाति की भावना इतनी प्रबल होती तो मृगनयनी का मान सिंह तोमर से मिलन न होता और न ही गुर्जरी महल के रूप में उन दोनों का प्रेम स्मारक अस्तित्व में आता. हमें तो ईश्वर ने देश और समाज की रक्षा करते हुये प्राण न्यौछावर करने के लिए उत्पन्न किया है न कि दूसरों पर अत्याचार करने के लिए. समझे भतीजे.
हाँ चाचू समझ गया.
एक बात और याद रखना कि हमारी शिराओं में उन पूर्वजों का रक्त बह रहा है जिन्होंने अपना सिर झुकाने की बजाय कटाना स्वीकार किया. इसलिए जब कोई तुम्हें ठाकुर होने पर अपमानित करने का प्रयास करे तो उससे अपना मस्तक ऊँचा करके कहना कि तुम्हें गर्व है कि तुम उस वीर जाति में पैदा हुए जिसमें जन्म लेने के लिए मनुष्य ईश्वर से सदैव कामना करता है.
जी अवश्य चाचू! अब यह सिर किसी के आगे झुककर अपने वीर पूर्वजों को अपमानित नहीं होने देगा.
जीते रहो!
सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

सोमवार, 9 जून 2014

साहित्यिक चोर कोश

     ए दिन देखा जाता है कि लेखक या लेखिका अपनी रचना किसी न किसी साहित्यिक चोर द्वारा चुराए जाने से व्यथित रहते हैं. ऐसा नहीं है कि पहले कभी साहित्यिक चोरियां नहीं होती थीं. पहले के समय और अब के वक्त में फर्क सिर्फ इतना सा है कि पहले ऐसी चोरी इतनी जल्दी व आसानी से पकड़ी नहीं जा सकती थी, लेकिन आजकल ऐसी चोरियाँ पकड़ना आसान हो गया है. वर्चुअल संसार पर लेखकों के आगमन से हालाँकि पहले से अधिक ऐसी चोरियाँ बढ़ीं भी हैं और इसके साथ ही साथ चोरी पकड़े जाने की प्रतिशतता में भी इजाफा हुआ है. आजकल सोशल मीडिया पर डेरा जमाये कुछ तथाकथित माननीय महोदय इधर-उधर से माल उड़ाते-उड़ाते न जाने कब लेखक बन जाते हैं कि पता ही नहीं चल पाता है. ऐसी बात नहीं है कि सिर्फ लेखन विधा से अनभिज्ञ मानव ही ऐसा कुकर्म करते हों. ऐसी चोरियाँ साहित्य के क्षेत्र में बरगद बनकर बैठे हुये वे महानुभाव भी करते हैं जो अपने साहित्यिक सफर को येन-केन-प्रकारेण अनवरत चालू बनाये रखना चाहते हैं. जैसे यह जीवन चलता रहेगा वैसे ही ये साहित्यिक चोरी का सिलसिला भी जारी रहेगा. वैसे आप सब भी ऐसी घटनाओं को देख-देखकर व सुन-सुनकर पक चुके होंगे. इसलिए आपको और पकाने का विचार त्यागते हुये एक सुझाव आप सभी के समक्ष रखने की गुस्ताखी करूँगा.
      जैसे समाज में आम चोरों की पहचान के लिए उनका विभिन्न थानों में जीवन परिचय सहेज कर रखा जाता है, वैसे ही ऐसे साहित्यिक चोरों का पूर्ण परिचय भी वर्चुअल संसार पर एक कोश बनाकर डाला जा सकता है और उसका नाम “साहित्यिक चोर कोश” रखा जा सकता है. इस कोश में साहित्यिक चोर का कुटिलतापूर्वक मुस्कुराता हुआ चित्र, उसका धरती पर बोझ बनने का निश्चित समय, तिथि व स्थान डालने के साथ-साथ इस बात का भी उल्लेख किया जाये कि वह किस विधा में चोरी करने में पारंगत है एवं अब तक चोरी कर-करके उसने कितना साहित्यिक माल इकठ्ठा कर लिया है. चोर के बगल में ही उस बेचारे रचनाकार का रोता हुआ चित्र, उसका जीवन परिचय तथा उसकी उस रचना का उल्लेख हो जिसको चोरी करके चोर महाराज ने अपना लेखकीय पोषण किया हो. इसके साथ-साथ चोर महाराज के उन अंध समर्थकों के चित्र व परिचय भी प्रदर्शित किए जायें, जो चोर की चोरी को समर्थन देकर महान बनने के लिए तत्पर रहे.
      जैसे विभिन्न सोशल साइटों पर लाइक व शेयर के ऑप्शन होते हैं वैसे ही इस साहित्यिक चोर कोश पर भी ऑप्शन की सुविधा होनी चाहिए. पहला ऑप्शन ऐसा हो जिसपर क्लिक करते ही साहित्यिक चोर का मुँह काला हो जाये. इस ऑप्शन पर डबल क्लिक करने पर चोर के अंध समर्थकों के मुँह भी काले हो जायें. दूसरे ऑप्शन पर क्लिक करते ही चोर के एक जोरदार झापड़ पड़े. तीसरे ऑप्शन पर क्लिक करने पर दो हाथ प्रकट हों और चोर के दोनों कानों को जाकर ढंग से पकड़कर जोर से उमेठें. चौथे ऑप्शन में यह सुविधा हो कि उस पर क्लिक करते ही चोर महाराज मुर्गासन की स्थिति में कुछ पल के लिए आ जायें. अंतिम ऑप्शन पर क्लिक करते ही एक रूमाल प्रदर्शित हो और चोर महाराज के शिकार हुये रचनाकार की आँखों से बहते हुये आँसुओं को जाकर पोंछ डाले परिणामस्वरूप दुखी रचनाकार का चेहरा खुशी से खिलखिलाने लगे.
      साहित्यिक चोर कोश से चाहे अधिक लाभ न हो लेकिन रचनाकारों को उन चोरों से सावधान होने का अवसर तो मिल ही जायेगा जो सदैव पकी-पकाई रचना को उड़ाकर उसे अपना बनाकर वाहवाही लूटने की जुगत में रहते हैं. चोरों को भी अपनी ऑनलाइन बेइज्जती होने पर कुछ लाज-शरम तो आएगी ही और आइंदा चोरी-चकारी करने से बाज आयेंगे. बाकी जो बेशर्म चोर हैं उनसे हम रचनाकारों को बचानेवाला तो एकमात्र परम पिता परमेश्वर ही है.   
सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

मंगलवार, 3 जून 2014

Book Review: Vyangyaste is one of the most inspirational compositions of writing


  A writer is a mirror of the society who reflects the truth, elevates a creative society, and leads the society in the right directions as a valuable, vital, and highly responsible person. A writer with the same character will be a leader of the mind, and can shape a better society"

    Today I am pleased to write my view and critics of famous book “Vyangastey” authored by Delhi Anthem creator Sumit Pratap Singh. Sumit Pratap Singh a worth name, a fantastic writer who joined the Delhi Police Service in his tough time and after that he became a writer. He has written several books with Damini Anthem and Hariyana Anthem songs. His Offbeat Story has a stunning performance to the writer what exactly he is. I like his writing style which is bold, brave, crispy and engaging. There is never a boring moment in the book and it’s full with hilarious anecdotes. I would recommend it to everyone. Book reviews can be an indispensable asset to writer. Well I will rename this book under category of Creative-Fiction.
   
     It is amusing to see the hard work of a writer with his creative ideology. The creation of such things plays a significant role in the social welfare. As a book meant to amuse and instruct the significant issues in society and certainly has the edge on most of what passes for advice right now. However, I do have issues with sycophants, corruptions, criminals, idiotic morons of identity politics and opportunists in the midst of the crowd. Therefore in this context, it was important for a writer to enlighten the issues of the system to offer fair and equitable opportunities to weed out the unwanted elements from the healthy democracy.
  

     And in chapters “An addressing letter to the Ravan, Adhunik Neta, Obama, PradhanMantri, Atanki aur Kisan” most current analysis and literature, including social ills, the writer tries his best way to invoke the Govt. nefarious actions in the society. He addresses the real problems that often occur. Author also provokes the actual fact that there should not be any partiality for society prejudicially and without hard work there is no way to achieve success.

However, it’s one of the most inspirational compositions of writing I've read. Expectations are very high. It’s not a small achievement. I would like to thank Mr. Sumit Ji whatever he contributes for the country as a writer. It would be my pleasure if possible I do translate this creation from Hindi to English. Finally I would conclude a pious line from unknown-

“We seek a Life inside the stories but factually Life is itself a Story”

Yogesh R.G. Singh 
Ex- Project Scientst, 
National Aerospace Laboratories,
India

बुधवार, 7 मई 2014

दुखी इंसान


एक दुखी इंसान
पहने लुंगी-बनियान
कूड़ा फैंककर आ रहा है
शादी करके पछता रहा है

बीते दिन याद करता है
ठंडी आहें भरता है
हर लड़की पर मरता है
पर अपनी बीबी से डरता है
बीते दिन याद करके
दुखी गीत गा रहा है

सुबह जल्दी उठता है
रात को देर से सोता है
पूरा दिन जीवन उसका
भाग-दौड़ भरा होता है
प्याज काटते-काटते
असली आँसू बहा रहा है

सबको खाना खिलाता है
फिर बच्चों को पढ़ाता है
उनके सो जाने के बाद
बीबी के पैर दबाता है
जिसने शादी करवाई
उसे वह पंडित याद आ रहा है.
एक दुखी इंसान
शादी करके पछता रहा है

सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

शनिवार, 3 मई 2014

नो कंट्रोल

फिस के बाहर उदास बैठे चपरासी धनिया को देखा तो उसकी उदासी का कारण जानने की इच्छा हुई.
“अरे धनिया कैसे उदास बैठे हो?”
“बस ऐसे ही मूड खराब हो रखा है.”
“कुछ न कुछ तो बात हुई होगी. बॉस ने फिर झाड़ मारी?”
“बॉस और कर भी क्या सकता है?”
“बॉस का काम है झाड़ मारना और तुम्हारा काम है उसे सुनना. इसे इतना सीरियसली मत लिया करो.”
“सीरियसली कैसे न लें बाबू जी आखिर हमारी भी ऑफिस में कोई इज्ज़त है.”
“वो तो ठीक है लेकिन असल में हुआ क्या था?”
“इतना कुछ भी नहीं हुआ था. बस बॉस ने फीकी चाय माँगी और हमने मीठी दे दी.”
“ऐसी भारी भूल आखिर तुमसे कैसे हो गई?”
“अब बाबू जी वो बात ये हुई कि टी.वी. चैनल पर समाचार आ रहे थे और हम उनमें ऐसे खो गये कि चाय में चीनी कब डाल दी पता ही नहीं चला.”
“मतलब तुमने इडियट बॉक्स के कारण गलती कि और बदले में झाड़ खाई.”
“हाँ साला यही शब्द बॉस ने हमसे गुस्से में कहा “यू इडियट” और हमने भी उसको जवाब दे डाला.”
“क्या जवाब दिया?”
“हमने उससे कहा हम इडियट तो आप इडियट के बॉस. इतना सुनते ही उसने हमें एक दिन के लिए सस्पेंड कर ऑफिस से बाहर भगा दिया.”
“धनिया जहाँ तक मुझे पता है कि तुम अपने बॉस को पलटकर कभी जवाब नहीं देते. ऑफिस में भी लोग तुम्हारी इस खूबी की चर्चा करते रहते हैं. फिर आज ऐसा क्यों किया?”
“अब बाबू जी आप से क्या छुपाना. जबसे से बीबी ने टी.वी. चैनल पर समाचार देखने की लत पड़वाई है तबसे ही जबान नो कंट्रोल हो गई है.”
“मतलब कि बीबी की वजह से आदत खराब हो गई है?”
“बाबू जी इसमें बीबी का क्या दोष? उसने तो सुझाव दिया था सुबह-शाम घर पर रहकर ऑफिस की बातों में ही टाइम खराब करने से अच्छा है देश-दुनिया की ख़बरें टी.वी. चैनलों पर देखो. कुछ न कुछ तो ज्ञान मिलेगा.”
“और इसी ज्ञान ने तुम्हारी ये हालत कर दी.”    
“अब आप तो हमें ही दोष दिये जा रहे हैं. कभी आप भी टी.वी. चैनलों पर ख़बरों का मुआइना किया कीजिये. जबसे चुनावी बिगुल बजा है तबसे ही सभी पार्टियों के नेताओं की जबान नो कंट्रोल हो रही है.”
“हाँ कुछ ज्यादा ही आउट ऑफ कंट्रोल हो रखी है.”
“तो फिर इसमें हमारा क्या दोष? जो इंसान जैसा देखता है वैसा ही तो व्यवहार करता है.”
“इसका एक उपाय है.”
“बताइए.”
“टी.वी. चैनलों पर तुमने एक इंसान ऐसा भी देखा होगा जो अपनी जबान ही नहीं खोलता. कुछ उससे भी सीखो और “नो कंट्रोल” की स्थिति से बाहर आओ.”
“बाबू जी हम इंसान हैं कोई पालतू नहीं जो किसी के कहने पर ही बोलें और और आज्ञा न मिले तो न बोलें. ऐसी जिंदगी जीना अपने वश की बात नहीं.”
“देखो धनिया जिन लोगों से प्रेरित होकर तुम्हारी जबान “नो कंट्रोल” की स्थिति में आई है असल में वे आपस में चाहे जितना अंट-शंट बोल लें अथवा लड़-झगड लें, लेकिन निजी तौर पर उनका व्यवहार बहुत ही मेल-जोल वाला होता है. इसलिए उनकी जबान के “नो कंट्रोल” से प्रेरित होना छोड़कर अपने बॉस से सॉरी बोलकर अपनी जीवन की गाड़ी को कंट्रोल में ले आओ.”
“हमारे मन में एक विचार आ रहा है.”
“कैसा विचार?”
“यही कि इतनी देर से आप हमें इतना लेक्चर दे रहे हैं. कही आप हमारे बॉस के पुराने चमचे तो नहीं हैं?”
धनिया की बात सुनकर गुस्सा भी आया और हँसी भी आई. उसके मुँह लगने की बजाय वहाँ से निकलना ही मुनासिब लगा. चलते-चलते मन सोचने लगा कि धनिया शायद टी.वी. चैनल पर समाचार देखने के साथ-साथ जासूसी व सास-बहू की साजिशों से भरे सीरियल भी अपनी बीबी के साथ गलबहियाँ करते हुये देखता है. इसलिए उसकी जबान के साथ-साथ उसका दिमाग भी “नो कंट्रोल” की अवस्था में आ चुका है.

 सुमित प्रताप सिंह
इटावा, नई दिल्ली, भारत 

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