मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

मुलायम सिंह ने किया इटावा गान की सीडी का विमोचन

इटावा: शनिवार दिनांक 28.12.13 को पूर्व रक्षा मंत्री, उत्तर प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे व सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश में स्थित इटावा जिले की नुमाइश में आयोजित कवि सम्मलेन में अपने पैतृक जिले की विशेषताओं को दर्शाने वाले इटावा गान की सी.डी. का विमोचन किया. गौरतलब है कि इटावा गान की रचना इटावा में ही जन्मे गीतकार सुमित प्रताप सिंह ने की है। इस दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश करुणानंद वाजपेयी विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।
गौरतलब है कि सुमित प्रताप सिंह ने इटावा गान से पूर्व दिल्ली एन्थमदामिनी एन्थम व एंटी रोड रेज एंथम की भी रचना की है।। इटावा एन्थम की सभी ने सराहना की है। ज्ञात हो कि सुमित प्रताप सिंह दिल्ली पुलिस में कार्यरत हैंइसके बावजूद उनकी गीत लिखने की कला उनके रग-रग में इस कदर समाई हुई है कि उनसे इस तरह के एन्थम लिखवाने की मांग बढ़ती जा रही है।

इटावा एन्थम के बोल कुछ इस प्रकार हैं “ये तेरा इटावा / यह मेरा इटावा/ है दिलों से प्यारा/ ये जिला इटावा/ सब जिलों से न्यारा/ यह जिला इटावा।सीडी विमोचन के दौरान गीतकार सुमित प्रताप सिंहकवि सम्मेलन के संयोजक शांति स्वरूप पाठकआशीष वाजपेयीसंजय सक्सेना, माधवेन्द्र शर्माकवि एवं पूर्व सपा जिलाध्यक्ष अशोक यादवगौरव पाठकअजय कुमार एवं प्रशान्त तिवारी भी मौजूद रहे।

रिपोर्ट: गुलशन कुमार 

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

आवाज़ का रहस्य (कहानी)

   रात को पढ़ने के लिए बैठा ही था, कि ऊपर वाले मकान से कुछ पीसने की आवाज़ आने लगी. परिवार में सभी चौकन्ने हो गये. चौकन्ना होना ही थाक्योंकि ऊपर वाले मकान को खाली हुये 6 महीने से अधिक समय हो चुका था और वहाँ से आवाज़ आना ही नामुमकिन था. हम सभी आपस में इस विषय पर चर्चा करने लगेतो छोटी बहन ने बताया कि उसने कई बार रात के समयहमारी छत से पड़ोस की छत पर किसी के कूदने की आवाज़ सुनी थी. हम सभी अनुमान लगाने लगेकि कहीं ऊपर वाले मकान में कोई आतंकवादी गतिविधि तो नहीं चल रही हैक्योंकि दिल्ली शहर आतंकवादियों की आतंक फ़ैलाने के लिए मनपसंद जगह है. मेरे पिता ने अनुमान लगायाकि ऊपर शायद कारतूस बनाने का काम चल रहा है. माँ ने उनकी बात का समर्थन किया. सुबह हुई और मैं सीढ़ी लगाकर ऊपर चढ़ गया तथा खिड़की से ताका-झांकी कर ऊपर वाले मकान की छानबीन करने लगा. अंदर झाँकने पर देखाकि दो पानी की बोतलें आधी भरी रखी हुईं थीं तथा पास में ही ग्लूकोज का डिब्बा रखा थाजिसके ऊपर एक गिलास रखा था. फर्श पर कुछ बिखरा पड़ा हुआ था. दूसरे कमरे में झाँका तो कमरा खाली दिखा व उसमें धूल जमी हुई थी. रात को आने वाली आवाज को मन का भ्रम मानकर मैं नीचे उतर आया. रात बीती. सुबह उठकर आया तो माँ ने बताया कि सुबह करीब 5 बजे फिर से कुछ पीसने की आवाज़ आई थी. घर के सभी सदस्य सावधान हो गये. पिता जी सवेरे ही थाने गये तथा मालखाने में पता लगायाकि ऊपर वाला मकान किसी के नाम आबंटित हुआ है या नहीं व मालखाना मोहर्रर को पूरी घटना के विषय में भी अवगत कराया. मालखाना मोहर्रर ने पूरी जांच करने का वादा किया. छोटी बहन ने मुझे बतायाकि उसने ऊपर वाले मकान के पड़ोसवाले मकान में कुछ लड़के देखे हैंजो कुछ-कुछ कश्मीरी आतंकवादियों जैसे लग रहे थे. कहीं वे ही तो ऊपर वाले मकान में कुछ गडबड करने न आते हों. मुझे उसकी बात में कुछ दम लगा. तभी पीछे सीढियों पर कुछ आवाज आने लगी. मैं पिछला दरवाज़ा खोलकर ऊपर गयातो मालखाना मोहर्रर ऊपरवाले मकान के पड़ोस में रहने वाले दक्षिण भारतीय से पूछताछ कर रहा था. मैंने वहाँ पहुँचकर उसे पूरी घटना के बारे में बताया. उसके पास कई चाबियाँ थीं. हमने बारी-बारी सभी चाबियों को आजमाकर मकान का ताला खोलने का प्रयास किया. सौभाग्य  से एक चाबी लग गई और ताला खुल गया. कमरे में घुसे तो देखाकि अंदर चारों ओर मकड़ी के जाले जमे हुए थे. फर्श पर धूल जमी पड़ी थी. जिस जगह से कुछ पीसने की आवाज़ आती थीवहाँ कोई निशान न था. ग्लूकोज का डिब्बा खाली था तथा उसके ऊपर गिलास सा दिखने वाला एक खाली डिब्बा रखा था. आधी भरी पानी की बोतल काफी पुरानी लग रही थी. शौचालय एवं स्नानघर भी जाले व धूल से पटे पड़े थे. बरामदे का दरवाज़ा खोलते ही मालखाना मोहरर्र डर गयाक्योंकि वहाँ नंगे पैरों के निशान थे. असल में वे निशान मेरे ही पैरों के थेजो सुबह मकान की छानबीन के दौरान बरामदे  में बन गये थे. इस बात को मैंने उससे छुपा लिया. आखिर कुछ समय जाँच-पड़ताल करने के पश्चात मालखाना मोहरर्र यह कहते हुए चला गयाकि वह उस इलाके के बीट ऑफिसर को मकान पर निगाह रखने के लिए कह देगा. मैंने सारी बात घर में आकर बताई. अब घर वाले कुछ और सशंकित हो उठे. अब सभी ऊपरवाले मकान में किसी प्रेतात्मा का वास होने का अनुमान लगाने लगे. माँ ने बतायाकि ऊपरवाले की लड़की ने एक बार प्रेम प्रसंगवश अपने हाथ की नसें काट ली थीं. कहीं उस लड़की की मौत न हो गई हो और वह भूतनी बनकर मकान में भटकती हो. रात हुई और फिर से कुछ पीसने की आवाज़ आने लगी. मैंने इस रहस्य से पर्दा उठाने का संकल्प कर लिया तथा रात होते ही दूसरी मंजिल पर पहुँच गया. मालखाना मोहर्रर से मैंने उस घर की चाबी लेकर अपने पास रख ली थी. दरवाज़ा खोलकर जैसे ही मैं भीतर घुसातो एक औरतजिसके बाल बिखरे हुए थेबदहवास हालत में थी कुछ पीसने में लगी हुई थी. मेरे भीतर घुसते ही वह कर्कश ध्वनि में बोली, आओ ठाकुर तुम्हारा ही इंतज़ार था. मैंने सहमते हुए उससे पूछा, तुम कौन हो और यहाँ क्या कर रही हो?” यह सुनकर उस औरत ने अपने बिखरे बालों को अपने चेहरे से हटायातो मैं चौंक गया क्योंकि वह उस मकान में रहने वाले किरायदार की पत्नी थी. मैंने डरते हुए पूछा, चाची आप सब तो यह मकान छोडकर छ: महीने पहले ही चले गये थेतो फिर इतनी रात को यहाँ अँधेरे में अकेली क्या कर रही हो”? मेरी बात सुन उसने बहुत भद्दा ठहाका लगाया और बोली, मैं यहाँ से गई ही कब थीमेरा पति दूसरी शादी करना चाहता थालेकिन मैं उसे तलाक देने को राजी न हुई. सो मकान खाली करने से पहले उसने मेरा गला दबाकर मुझे मार दिया और मेरी लाश को एक बक्से में बंद करके ज़मीन में दफना दिया. तबसे मेरी आत्मा इसी मकान में भटक रही है. अब यहाँ पर अकेले रहते-रहते मैं भी बहुत ऊब गई थी. अच्छा हुआ जो तुम आ गये. अब मैं तुम्हारा टेंटुआ दबाकर तुम्हें भी अपने टोली में शामिल कर लूंगी. फिर हम दोनों की खूब जमेगी. इतना कहकर उसने मेरा गला अपने दोनों हाथों से दबा लिया. मेरा दम घुटने लगा. मैं खुद को बचाने की कोशिश करने लगा. अचानक मेरी आँख खुल गई. मेरा पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था. मैं अपनी खैर मनाने लगाकि यह केवल एक सपना ही था. अगली रात आई. हम सब आवाज़ आने के बारे में ही चर्चा कर रहे थे. रात के करीब नौ बज चुके थे. तभी फिर से वही आवाज़ आने लगी. सभी सिहर उठे. मैंने वह आवाज़ ध्यान से सुनी. वह आवाज़ कुछ पीसने की न होकर कुछ इधर-उधर लुढ़काने की  थी. मैंने झट से दूसरी मंजिल पर पहुँचकर उसके दरवाज़े से कान लगाएलेकिन वहाँ कोई आवाज़ नहीं आ रही थी. एक मंजिल और ऊपर चढ़कर गयातो देखा कि तीसरी मंजिल वाले की बिटिया पत्थर के खिलोने से खेल रही थी. जिसकी आवाज़ बहुत तेज आ रही थी. मैं उसे देखकर मुस्कुराने लगा तथा सोचने लगाकि जिस आवाज़ ने हमारा इतने दिनों तक जीना हराम कर रखा था आख़िरकार उस आवाज़ का रहस्य पता चल ही  गया.

सुमित प्रताप सिंह

इटावा, नई दिल्ली, भारत 

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

मुठभेड़ (कहानी)

फ्तर में अपने काम में व्यस्त था, कि अचानक फोन की घंटी बजी. दूसरी ओर कोई स्पेशल ब्रांच का फोन नंबर माँग रहा था. मैंने सोचा कि शायद कोई मुसीबत का मारा होगा, सो ज्यादा पूछताछ करने की बजाय दिल्ली पुलिस की फोन डायरी में से खोजकर स्पेशल ब्रांच का फोन नंबर उसे बता दिया.
कुछ देर बाद उस व्यक्ति का फिर से फोन आया. उसने जो कुछ बताया उससे मैं सकते में आ गया. उसने बताया कि वह मुंबई में रहता है और उसके यहाँ किरायेदार के रूप में इस समय छः नौजवान ठहरे हुए हैं. उनके पास हथियार भी हैं. चुपचाप उन सबकी बात सुनने पर पता चला, कि उनका दिल्ली में हुई एक डकैती और एक हत्याकांड में हाथ भी रहा है. उसने निवेदन किया मैं उसे किसी ऐसे विश्वस्त पुलिसवाले का फोन नंबर दे दूँ, जो मुंबई आकर उन्हें गिरफ्तार कर सके.
मैंने कहा कि मुंबई पुलिस को इस बारे में क्यों नहीं बताते तो वह बोला कि मैंने इस बारे में सोचा था और अपने एक दोस्त से इस बारे में राय भी ली थी, लेकिन उसने बताया, कि मेरे किरायेदारों की जान-पहचान मुंबई पुलिस में है. कहीं मैंने मुंबई पुलिस में शिकायत की और उन लड़कों को पता चल गया, तो मेरी जान तो गई समझो.
ठीक है मैं कुछ करता हूँ.” इतना कहकर मैंने फोन काट दिया.
मैंने कुछ देर सोच-विचार किया फिर अपने पिता जी को फोन मिलाया. वो शायद कहीं व्यस्त थे, सो मेरा फोन न उठा सके. इसके बाद मैंने अपने बड़े भाई से संपर्क साधा और उसे इस बारे में सूचित किया. उसने स्पेशल ब्रांच में तैनात सब इंस्पेक्टर गजराज सिंह को इस घटना के विषय में बताया. अगले दिन गजराज सिंह का फोन आया. उन्होंने कहा कि वो मेरे दफ्तर आ रहे हैं. गजराज सिंह जब दफ्तर में पहुँचे तो मैंने उन्हें विस्तार से मुंबई से फोन करनेवाले इंसान, जिसने अपना नाम रोहित बताया था, के बारे में व उसके द्वारा दी गई सूचना के बारे में बताया. गजराज सिंह ने पूरी डिटेल लेकर अगले दिन तक इंतज़ार करने के लिए कहा.
अगले दिन सुबह ही उनका फोन आया. उन्होंने बताया कि रोहित द्वारा बताई बात बिलकुल ठीक है. दिल्ली में पिछले साल डकैती पड़ी थी और उसके बाद पुलिस के एक मुखबिर की गुप्तांग काटकर मार डालने की घटना भी घटी थी. उन्होंने कहा कि मैं रोहित से बात करूँ कि वह किसी भी तरह उन बदमाशों को बहला-फुसलाकर दिल्ली ले आये.
मैंने जब यह बात रोहित को बताई तो वह बोला कि इस समय उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है और छः लोगों के साथ रेल में सफर करने के लिए कम से कम तीन हजार रूपये की जरूरत पड़ेगी. मैंने यह बात गजराज सिंह को बताई तो उन्होंने ने कहा कि रोहित से कहो कि वह पता बता दे. उसे उसके घर पर रुपये भिजवा दिए जायेंगे. इस काम के लिए उन्होंने मुंबई में रहनेवाले अपने एक मित्र को कह भी दिया. रोहित का शाम को फोन आया कि गजराज सिंह के मित्र से उसने बात की थी, लेकिन वह व्यस्तता का हवाला देकर रुपयों को वहीं आकर लेने को कह रहा है, जो कि बहुत दूर है. उसने आग्रह किया कि यदि रुपये उसके बैंक के खाते में जमा करवाए जा सकें तो वह रेल का टिकट खरीद सकता है और उन बदमाशों के साथ दिल्ली की ओर रवाना हो सकता है. बहरहाल उसकी यह माँग भी पूरी कर दी गई.
शाम के समय रोहित का फोन आया कि उसने दिल्ली आने की टिकट खरीद ली हैं और वह अगले दिन सुबह की ट्रेन से उन बदमाशों के संग दिल्ली को रवाना होगा. उसने ट्रेन की बोगी नं. और सीट नं. लिखवा दिए. मैंने गजराज सिंह को सारी परिस्थिति बताकर आगे की योजना पूछी तो वो बोले कि मैं तैयार रहूँ क्योंकि परसों बदमाशों को पकड़ने के लिए होनेवाली संभावित मुठभेड़ में मैं भी उनके साथ रहूँगा.
अब आगामी मुठभेड़ के लिए मैंने तैयारी आरम्भ कर दी. शाम को डी.सी.पी. साहब समय से  घर रवाना हो गए. मैंने दफ्तर बंद किया और वहीं कुछ दूर स्थित जिम में गया और कसरत की व थोड़ी-बहुत मुक्केबाजी करके अपने मुक्के सटीक किये. इसके बाद थाने के शस्त्र भंडार में जाकर रिवाल्वर व पिस्तौल (खाली) चलाने का अभ्यास किया. शस्त्र भंडार में मेरे रूप में शायद कोई पहली बार इस तरह अभ्यास करने आया था. इसी कारण वहाँ तैनात पुलिस स्टाफ बहुत खुश हुआ और मुझे अच्छी तरह हथियारों का अभ्यास करवाया.
रात को घर लौटते-लौटते देर हो गई सो खा-पीकर सो गया. सुबह उठा तो रोहित का फोन आया. उसने बताया कि वह उन बदमाशों के साथ ट्रेन में बैठ गया है और कल दोपहर तक दिल्ली पहुँच जाएगा.  मैं मुठभेड़ होने के बारे में सोचकर ही रोमांचित हो रहा था. अब तक तो मैंने अखबारों या टी.वी. पर ही मुठभेड़ की खबर पढ़ी और सुनी थी लेकिन अब तो मैं भी किसी मुठभेड़ का हिस्सा बनने जा रहा था.
फिल्मों में अक्सर पुलिस और बदमाशों की मुठभेड़ देखकर सोचा करता था कि कभी मैं भी मुठभेड़ में किसी बदमाश को गोली मारकर ढेर करूँगा. चलो आखिर वह पल जीवन में आ ही गया. फिर दिमाग में सवाल उठा कि मुठभेड़ में क्या केवल बदमाश ही मारे जाते हैं? मुठभेड़ में गोलीबारी दोनों ओर से होती है या तो बदमाश मरते हैं या फिर पुलिसवाले और या फिर दोनों ही. इसका मतलब कि कल होनेवाली मुठभेड़ में मेरी जान भी जा सकती है? फिर सोचा कि इस देश की माटी हमारे लिए माँ जैसी ही तो है और अगर अपनी इस धरती माँ और समाज के लिए यह तुच्छ जान चली भी जाए तो यह तो सौभाग्य की बात ही होगी. अगर यह मेरा आखिरी दिन है तो आखिरी ही सही. चलो आज इसे जी भरके जिया जाए.
अब मैं उस दिन को दिल से जीना चाहता था. उस दिन मैंने अपने भूले-बिसरे सभी दोस्तों को फोन करके उनके हाल-चाल लिए. संगीत का आनंद लिया और अपनी मोटर साइकिल से जमकर सैर की. रात को समय से सो गया और इतनी जमकर नींद ली कि उठते-उठते सूरज निकल आया. नहाया-धोया, खाया-पीया और मुठभेड़ में जाने को तैयार हो गया. जाते समय माँ के चरणों को छुआ. हो सकता था कि उन पावन चरणों को छूने का फिर से मौका मिलता ही नहीं.
निश्चित समय पर मैं रेलवे स्टेशन पर पहुँच गया. गजराज सिंह अपने मुठभेड़ में सिद्धहस्त अन्य पुलिसवाले साथियों के साथ कुछ समय बाद ही वहाँ पहुँच गए. वे सभी देखने में साक्षात् यमदूत प्रतीत हो रहे थे. शायद मृत्यु से निरंतर भेंट करते हुए उन्होंने यमराज से सेटिंग कर ली थी, सो मृत्यु उनके आस-पास भी नहीं फटकती थी. वे सभी मुझे अविश्वास से देख रहे थे जैसे कह रहे हों कि यह छोकरा यहाँ कर रहा है? गजराज सिंह ने प्लान समझाया कि उन बदमाशों को कार में बिठाकर किसी गेस्ट हाउस में ले जाकर धर पकड़ा जाए. उन को बहलाकर गेस्ट हाउस ले जाने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई.
हम सभी हथियार कपड़ों के नीचे छुपाकर रेलवे स्टेशन के भीतर बढ़ चले. जब हम स्टेशन पर पहुँचे तो वहाँ खड़ी ट्रेन के शीशे में अपना चेहरा निहारा तो देखा मेरी आँखों में रक्त उतर आया था और देश और समाज के दुश्मनों से दो-दो हाथ करने को मेरी बाजुएँ फडकने लगीं. मैं, गजराज सिंह और हमारे दो साथी वहीं स्टेशन पर रुक गए तथा हमारे दो जवान उस स्टेशन से एक स्टेशन पहले ही ट्रेन में चढ़कर बदमाशों की घेराबंदी करने के लिए नियुक्त किये गए. हम स्टेशन पर ट्रेन के आने का इंतज़ार करने लगे. रोहित का फोन नहीं मिल पा रहा था. पिछले स्टेशन पर ट्रेन पहुँच चुकी थी और जिन दो जवानों को पिछले स्टेशन से ट्रेन में चढ़ने और रोहित व उसके साथ आ रहे बदमाशों की घेराबंदी करने के लिए भेजा गया था. उन्होंने फोन करके बताया कि उस प्रकार के व्यक्ति उस बोगी की उन सीटों पर नहीं हैं. गजराज सिंह ने आरक्षण केन्द्र में फोन करके रोहित द्वारा बताई गईं सीटों की डिटेल पूछी तो पता चला कि वो सीटें किसी दूसरे परिवार के नाम पर आरक्षित थीं, जिनमें चार पुरुष और दो महिलाएँ थीं. कुछ समय पश्चात जिस स्टेशन पर हम रोहित और बदमाशों  पलकें बिछाए प्रतीक्षा कर रहे थे ट्रेन आ धमकी. उस ट्रेन से उतरकर हमारे दोनों जवान भी आ पहुँचे. हमें रोहित नामक व्यक्ति ने मूर्ख बना दिया था. हम सभी बैरंग वापस लौट चले. इस प्रकार मुठभेड़ शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई.

सुमित प्रताप सिंह 
इटावा, नई दिल्ली,भारत 

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

टोटका (कहानी)

   
   माँ आँगन के गेट के बाहर निकलने को हुईं तो फिर से उन्हें चावल, सिंदूर और बाल गेट के बीचों-बीच रखे मिले. आज फिर से कोई टोटका कर गया था. माँ टोटका करनेवाले को गरियाते हुए वापस घर को लौट आईं. मैंने जब जाकर डंडे से उस सामान को एक ओर खिसका कर किया तब माँ घर से निकलीं. कुछ दिनों से हम सब परेशान थे. कारण था हमारे घर के आस-पास टोटका किया जा रहा था.
हमारा परिवार कालोनी में अपने काम से काम रखनेवाले परिवार के रूप में जाना जाता है. यही कॉलोनी वालों के लिए ईर्ष्या का विषय है. वैसे तो हमारे घर के आस-पास टोटका होना कोई नहीं बात नहीं थी, लेकिन कुछ दिनों से ये कुछ ज्यादा होने लगा था. सही मायने में कहा जाए तो टोटका उन कायरों और असफल व्यक्तियों का हथियार है, जो यह सोचते हैं कि टोटका करके वे किसी का अहित कर अपना भला कर सकते हैं.
हालाँकि हमें कुछ हद तक पता चल चुका था, कि टोटका करने के पीछे किसका हाथ था, क्योंकि कालोनी के जासूस टाइप के लड़कों से अपना पक्का याराना रहता था. उन्होंने ही बताया था, कि सुबह के अंधेरे में उन्होंने कुछ भली महिलाओं को हमारे घर के इर्द-गिर्द टोटका करने के लिए मंडराते हुए देखा था. वैसे हमें भली-भांति ये भी मालूम था कि टोटका करने में सिद्धहस्त उन महिलाओं का पारिवारिक जीवन कुछ अधिक खुशहाल नहीं था. शायद यही वजह थी, जो वे अपनी खुशहाली पाने की खातिर हमारे घर की खुशहाली पर टोटके के रूप में बुरी नज़र डालती रहती थीं.
ऐसी बात नहीं है कि केवल हम ही टोटका करनेवालीं भली महिलाओं से परेशान थे, कालोनी में रहने वाले अधिकांश लोग उनकी टोटकेबाजी से तंग आ चुके थे. हर समस्या का हल भी अवश्य होता है, सो हमारा परिवार भी इस समस्या का हल खोजने में जुट गया. सबने अपने-अपने सुझाव बताये, लेकिन कोई भी जंचा नहीं. अंत में छोटी बहन ने इस टोटकेबाजी से हमें मुक्त कराने का बीड़ा उठाया. हमारे घर में लोकतान्त्रिक व्यवस्था है, इसलिए हम यह नहीं सोचते कि कौन छोटा है या फिर कौन बड़ा. सो हमने घर की सबसे छोटी सदस्या को बिना कोई प्रश्न पूछे यह कार्य सौंप दिया.
अब छोटी बहन अपने कार्य में जुट गई. उसके कार्य के लिए जो जरूरी सामान उसने माँगा, उसे लाकर दे दिया गया. उसके जरूरी सामान पर नज़र डालें तो वह कुछ यूँ था - गुंथा हुआ आटा, काला धागा, चने की दाल, हरी मिर्चें, सिंदूर, कुछ सुइयाँ, कुछ बाल और एक नींबू. हमारे मन में ये ख्याल तो आ रहे थे, कि आखिर इस सामान का वह करेगी क्या, लेकिन हमें उसकी प्रतिभा पर पूरा यकीन भी था, सो हमने उसे जो उसका करने का मन था करने दिया.
वह अपने कमरे में अपने काम को अंजाम देने में व्यस्त थी और हम सभी दूसरे कमरे में यह सोचने में व्यस्त थे, कि आखिर वह करने क्या जा रही थी. घड़ी की सबसे तुच्छ सेकंड की सुई पर कभी ध्यान न देनेवाला मैं अति व्यस्त मानव आज सेकंड की सुई के पीछे लगा हुआ था. परिवार के बाकी सदस्य खाली बैठे क्या करते सो वे सभी अनुमान नामक शब्द का सदुपयोग करने लगे. करीब आधा घंटा हो चुका था. सेकंड की सुई मेरी नज़रों से तंग आ चुकी थी और परिवार के सदस्यों के सारे अनुमान अनुमानों की नदी में डुबकी लगाकर डूबकर खत्म हो चुके थे.
अचानक छोटी बहन ने अपने कमरे का दरवाजा खोला. अब हम उसके मुँह खुलने और उसकी योजना सुनने का इंतज़ार करने लगे. उसने थाली में रखी आटे की गुड़िया हमें दिखाई तो हमें बहुत गुस्सा आया, कि इतनी देर से कमरे में आटे का प्रयोग करके मूर्तिकला में समय नष्ट किया जा रहा था. वह हमारा गुस्सा भाँप गई और उसने अधिक समय न गँवाते हुए अपना आईडिया बताया. उसने बताया कि जैसे लोहा लोहे को काटता है, वैसे ही टोटके को टोटका ही खत्म करेगा.
अब उसने उस आटे की गुड़िया के सिर में बाल लगाये, उसके माथे पर सिंदूर लगाया, उसके गले में चने की दाल व हरी मिर्च से बनी हुई माला पहनाई, उसके पूरे शरीर में सुइयाँ घुसाईं और उसके साथ कटा नींबू रखकर घर के पिछले दरवाजे के पास टोटकेवाली आंटी के पति की खड़ी हुई मोटर साइकिल के ऊपर चुपचाप जाकर रख दिया.
अब हम उस गुड़िया को देखकर उत्पन्न होनेवाली प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगे. दोपहर हुई, दोपहर बीती और शाम हुई. हमारे दिल में धुकधुकी सी हो रही थी. अचानक ब्लॉक में चीख-पुकार आरम्भ हो गई. उस चीख-पुकार में हम कुछ आवाजें ही सुन पाए.
“देखो यह पक्का किसी तांत्रिक ने टोटका किया है.”
“अरे इस गुड़िया के सिर में घुसी सुइयाँ तो देखो. ये सुइयाँ इसके सिर में इसलिए घुसाई गईं हैं जिससे कि जिस पर भी टोटका हो उसके सिर में भयंकर दर्द उठ जाए और दिमाग सुन्न हो जाए.”
“और इसके गले में लटकी चने की दाल और हरी मिर्च की माला यह बताने के लिए काफी है, कि इस टोटके को करनेवाला कोई अघोरी तांत्रिक है.”
“अरी बहन इस गुड़िया के बाल हो न हो शमशान घाट में जली हुई किसी लाश के सिर से उखाड़े हुए हैं.”
“बुरा हो टोटका करनेवाले का. अभी हॉस्पिटल से फोन आया है कि अभी कुछ देर पहले ही मेरे पति का एक कार से एक्सीडेंट हो गया है और उनकी दायीं टांग टूट गई है.”
और फिर गालियों की ऐसी बौछार आरंभ हुई कि हम सबको कान में रुई ठूसनी पड़ी. इसके बाद सभी महिलाओं ने मिलकर ऊपर से नीचे तक पूरे ब्लाक को अच्छी तरह पानी से धोया और धूप-अगरबत्ती लगाई. टोटके में सिद्धहस्त महिलाएँ भी छोटी बहन के टोटके से ऐसी भयभीत हुईं कि उन्होंने टोटका करने से बिलकुल संन्यास ले लिया.
इस टोटके का एक लाभ भी हुआ. हमारे ब्लाक में रहनेवाले एक आलसी और कामचोर लड़के ने अगले दिन अपनी माँ से कहा कि उसका हमेशा बंद रहनेवाला दिमाग अचानक ही काम करने लगा है और अब वह नाकारा नहीं बैठ सकता तथा नौकरी करके अपने पैरों पर खड़ा होगा. उस लड़के की माँ के हृदय में अचानक टोटका करनेवाले के प्रति आदरभाव उत्पन्न हो गया. अब ये और बात थी कि पिछली शाम को टोटके करनेवाले को सबसे अधिक गरियाया उन्होंने ही था.
अब कॉलोनी इस बात से संतुष्ट हैं कि कॉलोनी में अब कोई टोटका नहीं होता है और हमारा परिवार कॉलोनी वालों की ओर से मन ही मन परिवार की छुटकी सदस्या को टोटकेबाजी से मुक्ति दिलाने के लिए अक्सर धन्यवाद देता रहता है.

लेखक: सुमित प्रताप सिंह

इटावा, नई दिल्ली, भारत 
चित्र:गूगल से साभार 

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