बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

व्यंग्य सम्राट नहीं व्यंग्य शिष्य


     
     मित्रो आपके सुमित प्रताप सिंह को लाल कला, सांस्कृतिक चेतना मंच (रजिस्टर्ड), दिल्ली  ने 26 फरवरी, 2012 को आयोजित रंग अबीर उत्सव-2012 में “व्यंग्य सम्राट” नामक सम्मान से सम्मानित किया गया. इस कार्यक्रम का आयोजन अल्फा शैक्षणिक संस्थान के प्रांगण में वरिष्ठ समाजसेवी श्री कृष्णा नन्द की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गुजरात के सूरत से पधारे हिन्दी मासिक पत्रिका गुजरात दर्पण के संपादक श्री ए.आर.मिश्रा एवं ह्यूमन एवं एनिमल वेलफेयर के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री दिनेश एम.पटेल तथा अतिथि के रुप में स्थानीय (मीठापुर) निगम पार्षद श्री महेश वाना थे। इस कार्यक्रम का संयोजन दिल्ली रत्न श्री लाल बिहारी लाल का था तथा संचालन वरिष्ठ साहित्यकार डा. ए. कीर्तिबर्धन ने किया।

     बहरहाल यह तो लाल कला, सांस्कृतिक चेतना मंच (रजिस्टर्ड), दिल्ली का स्नेह था अन्यथा मैं तो अभी व्यंग्य का शिष्य ही हूँ व्यंग्य सम्राट बनने के लिए अभी बहुत लंबा सफर तय करना है, उम्मीद है कि आप सभी का स्नेह और दुआएँ मेरे साथ रहेंगी

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

हिंदी पूत लोकेन्द्र सिंह राजपूत


     
प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

     कल रात भारतेन्दु हरिशचंद जी सपने में आये. बहुत खुश लग रहे थे. मैंने उनसे उनकी खुशी का कारण पूछा  तो उन्होंने बताया कि हिन्दी माँ के बढते गौरव व प्रचार-प्रसार को देखकर उनका मन मयूर बनकर झूम रहा है. उन्होंने हम सभी हिन्दी चिट्ठाकारों को कोटिकोटि आशीष व धन्यवाद दिया तथा कामना की, कि यूँ ही हम सभी हिन्दी चिट्ठाकारों के निरंतर प्रयास से हिन्दी एक दिन विश्व के माथे की बिंदी बने. चाहे कपूत कितना भी प्रयत्न करें किन्तु हिंदी की गरिमा बढ़ती ही रहे. मैंने उन्हें हम सभी हिन्दी चिट्ठाकारों की ओर से वचन दिया, कि हिन्दी को विश्व के माथे की बिंदी बनने से कोई नहीं रोक पाएगा. अरे हाँ कपूत शब्द से याद आया आप सबने माँ अंबे जी की आरती की निम्न पंक्तियाँ सुन ही रखी होंगी:-

माँ बेटे का इस जग मे है, बडा ही निर्मल नाता
पूत कपूत सुने हैं, पर न माता सुनी कुमाता.

कितना बड़ा सच छुपा है इन पंक्तियों में. माता वास्तव में कुमाता कभी हो ही नहीं सकती और पूत (पुत्र) सपूत भी होते हैं और कपूत भी. अब उदाहरण के तौर पर हिन्दी फिल्मों को ही ले लें. इसमें काम करने वाले अभिनेता व अभिनेत्रियाँ हिन्दी के बल पर करोड़ों रूपए कमाते हैं, लेकिन जब कभी टी.वी. चैनल पर साक्षात्कार देने आते हैं तो अंग्रेजी में गिटपिट-गिटपिट करना शुरू कर देते हैं. कितनी ठेस लगती होगी यह सब देखकर अपनी हिन्दी माँ को. अभिनेता व अभिनेत्रियाँ  के अलावा चहुँ ओर दृष्टि दौडाने पर ऐसे अनेक कपूत दिख जाएँगे, जिनकी रोजी-रोटी तो हिन्दी के बल पर चलती है, लेकिन हिन्दी बोलने में उनकी नानी मरती है. हालाँकि हिन्दी माँ के कुछ सपूत भी हैं, जो अपनी इस माँ की सेवा में निरंतर जुटे रहते हैं. ऐसे सपूतों को देखकर माँ हिन्दी अपने सभी दुखों को भूलकर फिर से मुस्काने लगती हैं. चलिए आज मिलते हैं हिन्दी के एक ऐसे ही सपूत से जिनका नाम है लोकेन्द्र सिंह राजपूत.

लोकेन्द्र सिंह राजपूत  देश के हृदय मध्य प्रदेश से हैं। इन्होंने ग्वालियर की माटी में जन्म लिया। यहीं इनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए लंबे समय से कार्य कर रहे हैं। समाजसेवा के लिए समर्पित संस्था सेवा भारती के साथ जुड़कर करीब 14 साल ग्वालियर की बस्ती-बस्ती देखी। बाद में पत्रकारिता में पढ़ाई कर पिछले चार वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में  हैं। फिलहाल मध्य प्रदेश  की राजधानी भोपाल में रह रहे हैं।

सुमित प्रताप सिंह- लोकेन्द्र जी जय हिंद जय हिन्दी. कैसे है आप?

लोकेन्द्र सिंह राजपूत- सुमित जी जय हिंद जय हिन्दी.मैं ठीक हूँ आप कैसे है?

सुमित प्रताप सिंह- जी मैं भी बिलकुल ठीक हूँ. हिन्दी बने विश्व की बिन्दीइसी कामना के साथ कुछ प्रश्नों के माध्यम से आपको जानने आया हूँ. (सपूतों की बाँछे खिल चुकी है)

लोकेन्द्र सिंह राजपूत- यह कामना तो सभी हिन्दी पुत्रों व पुत्रियों की है.जो प्रश्न हैं पूछ डालिए. (कपूतों की भृकुटियाँ तन चुकी हैं)

सुमित प्रताप सिंह- ब्लॉग पर हिंदी लेखन करने के विषय में कब, क्यों और कैसे सूझा?

लोकेन्द्र सिंह राजपूत - पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान बेव-पत्रकारिता के बारे में सुना और पढ़ा। ब्लॉगिंग समाज के सामने अपने विचार रखने का सशक्त माध्यम है। इसलिए अपना लिया। कुछेक सीनियर ब्लॉगिंग करते थे तो अपुन कैसे पीछे रह जाते। (सपूत मुस्कुराते हुए इठला रहे हैं)

सुमित प्रताप सिंह- आपने अपने ब्लॉग का नाम "अपना पंचू" ही क्यों रखा?

लोकेन्द्र सिंह राजपूत - ग्वालियर के अंचल में अधिक बातूनी व्यक्ति को पंचू कहा जाता है। पंचू जो दुनिया जहान की तमाम बातें करता है। वहीं से यह नाम लिया। इस ब्लॉग की पहली पोस्ट भी मेरे गांव में बोले जाने वाली बोली में लिखी गई है। 
(कपूत अपने आदर्श लार्ड मैकाले की आरती करते हुए अपना खून खौला रहे हैं)

सुमित प्रताप सिंह- आपकी पहली रचना कब और कैसे रची गई?

लोकेन्द्र सिंह राजपूत - ठीक-ठीक याद नहीं। हां पहली प्रकाशित रचना के बारे में जरूर याद है। दैनिक भास्कर में लेख छपा था। उसके बाद से तो देशभर के अखबारों, पत्रिकाओं और वेब पोर्टल पर कहानी, कविता, यात्रा वृतांत और समसामयिक विषयों पर आलेख प्रकाशित हुए। 
(सपूत अपने-अपने ब्लॉग पर नई हिन्दी रचना डालने पर विचार कर रहे हैं)

सुमित प्रताप सिंह- क्या वाकई लिखना बहुत ज़रूरी है? वैसे आप लिखते क्यों हैं?

लोकेन्द्र सिंह राजपूत - हां, लिखना जरूरी है। लिखकर आप अपनी बात दूर तक पहुंचा सकते हैं। सुमित जी बिना लिखे जी नहीं मानता। इसलिए मेरे लिए लिखना जरूरी है वरना बेचैनी होती है।
(कपूत जुगाड़ लगा रहे हैं कि कैसे गूगल बाबा का टेंटुआ दबाकर सरकार द्वारा ब्लॉग लेखन पर नकेल कसवाई जाये.)

सुमित प्रताप सिंह- लेखन में आपकी प्रिय विधा कौन सी है और क्यों?

लोकेन्द्र सिंह राजपूत - गद्य प्रिय विद्या है। लेकिन, कविता से में प्रेम करता हूं। व्यंग्य मुझसे बनते नहीं लिखने की कोशिश तो खूब की। हां, यात्रा वृतांत लिखने में खूब मजा आता है।
(सपूत हर अच्छी रचना पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं )

सुमित प्रताप सिंह- अपनी रचनाओं से समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

लोकेन्द्र सिंह राजपूत - ढकोसलावादी न बने। सच को स्वीकार करें। जागरूक रहें। बुराई का प्रतिकार करें। अपनी रचनाओं से यही संदेश देने का प्रयास रहता है। 
(कपूत दुःख और निराशा से बेहोश होते हुए सोच रहे हैं "काश! हम भी सपूत होते.")

सुमित प्रताप सिंह- एक अंतिम प्रश्न. "ब्लॉग पर हिंदी लेखन और हिंदी की भारत में स्थिति?"  इस विषय पर आप अपने विचार रखेंगे?

लोकेन्द्र सिंह राजपूत - ब्लॉग पर हिन्दी लेखन और भारत में हिन्दी की भारत में स्थिति। कम समय में ही हिन्दी के ब्लॉग की बाढ़ आना, देश में हिन्दी के महत्व को दर्शाता है। अंतरजाल पर हिन्दी साहित्य की कमी को पूरा करने का काम हिन्दी ब्लॉग ने काफी हद तक दूर किया है। नए साहित्यकारों द्वारा रचा जा रहा साहित्य आसानी से सहज उपलब्ध है। वहीं कुछ ब्लॉगर दिग्गज साहित्यकारों का लिखा-पढ़ा भी प्रस्तुत करते हैं, इसका भी बड़ा फायदा होता है। हिन्दी ब्लॉगिंग का एक बड़ा फायदा यह है कि युवा और नए साहित्यकारों को अपनी उपस्थिति साहित्यजगत में दर्ज कराने के लिए जमे-जमाए साहित्य के मठाधीशों की चमचागिरी नहीं करनी पड़ती। भारत में हिन्दी की स्थिति बेहतर है। आज अंग्रेजी से अधिक समाचार, पत्र-पत्रिकाएं और टीवी चैनल्स (मनोरंजन और समाचार दोनों) हिन्दी के ही हैं। हां, वर्तमान युवा पीढ़ी की हिन्दी, हिन्दी न रहकर हिंग्लिश हो गई है। हालाँकि उसके खास नुकसान नहीं है।

(अंत में हिन्दी के सपूत लोकेन्द्र सिंह राजपूत जी को यूँ ही हिन्दी माँ की सेवा करते रहने का निवेदन व कपूतों के सपूत बनने की कामना करते हुए चल पड़ा हिन्दी के अन्य सपूत की खोज में)

हिन्दी के सपूत लोकेन्द्र सिंह राजपूत से मिलना हो तो पधारें http://apnapanchoo.blogspot.in/ पर...

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

शिखा वार्ष्णेय का जीवन है स्पंदन


प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!


     दोस्तो लंदन शहर कितना खूबसूरत  है. यहाँ की हर इमारत,हर गली,हर दुकान अद्भुत छटा लिए हुए है. टावर ब्रिज, वेस्टमिंस्टर महल, ब्रिटिश संग्रहालय व रोयल अलबर्ट हॉल इत्यादि देखने में कितने अद्भुत लगते हैं. हो भी क्यों न अंग्रेजी साम्राज्य ने पूरे विश्व को खूब लूटा भी तो है.अपने भारत को ही ले लीजिए पूरे 190 साल तक लूटपाट कर अंग्रेजी खजाने को भरा गया. यकीन नहीं हो रहा है तो कभी फुर्सत मिले तो लाल किले के दीवाने खास व उसके जैसी अनेक खास इमारतों को जाकर ध्यान से देखना कि किस प्रकार उनमें जड़े कीमती पत्थर तक खुरच-खुरच कर निकालकर ले गये सफेद शैतान. अब अपने आपको सभ्य कहते हैं. भिखारी बन भारत आए और भारत को भिखारी बनाकर चले गए. जाते-जाते भी हम पर सत्ता करने हेतु अपनी कार्बन कापियाँ अर्थात काले अंग्रेज छोड़ गये. जो अब तक हम भारतीयों का खून चूस रहें है. यह सब देखकर आप सबके मन-मस्तिष्क में कभी स्पंदन नहीं होता. खैर आज हम मिलने जा रहे हैं इसी खूबसूरत शहर में इन सफ़ेद भूतों के बीच रहकर अपने लेखन से स्पंदन मचाने वाली हिंदी ब्लॉगर शिखा  वार्ष्णेय  से.


शिखा  वार्ष्णेय जी की कहानी भी अजब ब्लॉगर की गजब कहानी है. पहले तो इन्हें घरवालों ने घर निकाला देकर फरमान सुनाया कि जाओ रूस जाकर पढ़ाई-लिखाई करो फिर वहाँ से भी बोरिया-बिस्तर बाँधकर वापस लौटने का हुक्म सुनाया गया कि बस हो गई पढाई पूरी अब वापस आ जाओ. घरवालों से फिर यह भी न सहा गया  (कहानी घर-घर की) तो उठा कर पहले से ही कंप्यूटर से शादी कर चुके एक इंजीनियर के साथ  गठबंधन कर दिया (यानि कि हमारी होने वाली आका के मन में भी शिखा जी जैसे विचार उमड़ सकते हैं). फिर चकरघिन्नी की तरह घूमती-फिरती रहीं मारी-मारी (असल में मारे-मारे तो श्रीमान शिखा  वार्ष्णेय फिर रहे थे इनके पीछे-पीछे) एक देश से दूसरे देश निभाती रहीं गृहस्थ धर्म (और श्रीमान शिखा वार्ष्णेय जी क्या निभा रहे थे?). मगर मन की अकुलाहट सतह पर आने लगी और चिल्लाने लगी  बहुत हुआ, बहुत हुआ अब हमें शांत किया जाये. तो कलम थाम ली. बस ..तब से उसकी गुलामी कर रहीं हैं. चलिए मिलते हैं शिखा वार्ष्णेय जी से...

सुमित प्रताप सिंह- शिखा वार्ष्णेय जी जय सिया राम.

शिखा वार्ष्णेय- देखिए सुमित जी मुझे श्री राम पसंद नहीं हैं सो जय श्री कृष्ण. (श्री राम पसंद नहीं हैं तो माता सीता ने क्या बिगाड़ा है...खैर श्री कृष्ण भी तो श्री राम के ही अवतार हैं)

सुमित प्रताप सिंह-  जय श्री कृष्ण कैसी हैं आप?

शिखा वार्ष्णेय- जी बिलकुल ठीक हूँ. आप कैसे हैं?

सुमित प्रताप सिंह- जी मैं भी बिलकुल ठीक हूँ. कुछ प्रश्न लाया हूँ आपके लिए.

शिखा वार्ष्णेय- पूछिए-पूछिए जो भी पूछना है. शिखा जी के मन में स्पंदन भी हो रहा है कि मैं उनसे जाने क्या पूछ लूँ)

सुमित प्रताप सिंह- आपको ब्लॉग लेखन का रोग कब, कैसे और किसके माध्यम से लगा?

शिखा वार्ष्णेय- ये छूत की बीमारी है जो लेखन के कीटाणु से फैलती है. इसके लिए किसी माध्यम का होना वैसे आवश्यक नहीं. ये यूँ ही अंतरजाल पर विचरण करते हुए किसी भी एक ब्लॉग के संपर्क में आने से लग सकती है और लाइलाज है.मुझे यह रोग 2009 में "कुश की कलम" से लगा था जिसका लिंक ऑरकुट पर था.
 ( अचानक ही उनकी दोनों कनिष्का  उँगलियों में स्पंदन होने लगा)


सुमित प्रताप सिंह- किसी भी रचना को अच्छा सिद्ध करने हेतु कितनी टिप्पणियाँ काफी हैं? एक या फिर सौ? 

शिखा वार्ष्णेय- रचना अच्छी है या नहीं ये एक या सौ टिप्पणी नहीं निर्धारित करती.टिप्पणियाँ तो मात्र टोनिक हैं जो लेखन रुपी बीमारी को राहत पहुंचाती है.अंधे को क्या चाहिए दो आँखें ..ऐसे ही लेखक को चाहिए पाठक या श्रोता. टिप्पणियाँ सबूत हैं कि कोई पढने आया और पढ़ कर गया. फिर बेशक कारण कुछ भी हो और एक शब्द ही क्यों ना लिखा गया हो.
(उनके शांत होते ही उनकी अनामिका उँगलियों में स्पंदन होने लगा)

सुमित प्रताप सिंह- आपकी पहली रचना कब और कैसे रची गई?

शिखा वार्ष्णेय- मैंने अपनी पहली रचना १२ वर्ष की अवस्था में ग़ज़ल जैसी कुछ लिखी थी.जिसकी प्रेरणा एक पत्रिका में पढ़ा हुआ एक शेर था.-
 " जब भी चाहा वही चाहा जो अपने मुकद्दर में नहीं, अपनी तो हर तमन्ना से शिकायत है मुझे".
और मैंने इसी को आगे बढ़ाते हुए उसी तर्ज़ पर रोंदू से पांच शेर (तुकबंदी ) और लिख दिए हालाँकि उसे ग़ज़ल कहते हैं ये तब मुझे मालूम नहीं था.

(अब उनकी मध्यमा उँगलियों में भी  स्पंदन  आरम्भ हो गया)

सुमित प्रताप सिंह- आप लिखती क्यों हैं?

शिखा वार्ष्णेय- मेरे अन्दर भाव हमेशा उथल पुथल मचाये रहते हैं और उनके साथ जब लेखन के कीटाणु मिल जाते हैं तो हाहाकार होने लगता है, अत : उन्हें शांत करने के लिए मैं लिखती हूँ.

(उनकी तर्जनी उँगलियों में भी स्पंदन शुरू हो चुका था)


सुमित प्रताप सिंह- लेखन में आपकी प्रिय विधा कौन सी है? आपको यह विधा इतनी प्रिय क्यों हैं?

शिखा वार्ष्णेय- कविता मेरा पहला प्यार है.जो बेशक आपको मिले ना मिले पर आप उसे भूलते नहीं.संस्मरण लिखने में मुझे बहुत आनंद आता है और यात्रा वृतांत लिखना मेरे लिए सहज होता है.

( बेचारे अंगूठे महाराज बचे थे वो भी स्पंदन के जाल में फंसकर स्पंदन करने लगे)

सुमित प्रताप सिंह- अपनी रचनाओं से समाज को क्या सन्देश देना चाहती हैं?

शिखा वार्ष्णेय- मैं कौन होती हूँ सन्देश देने वाली. मैं बस अपने विचार लिखती हूँ. बाकी जिसको जो समझना है वो समझ ले.

(अब शिखा जी के दोनों हाथ स्पंदन अनुभव कर रहे थे)

सुमित प्रताप सिंह- एक अंतिम प्रश्न. "ब्लॉग पर हिंदी लेखन व विदेश में हिंदी"  इस विषय पर आप अपने कुछ विचार रखेंगी?

शिखा वार्ष्णेय-  ब्लॉग और विदेशों में हिंदी लेखन वैसा ही है ..जैसे किसी को ( हिंदी को ) उसके ही घर से निकाल दिया गया हो और हम अपने घर लाकर प्रेम से उसे पाल पोस रहे हैं,उसकी देखभाल कर रहे हैं,सहेज रहे हैं.कि किसी तरह वो हम सब के बीच बनी रहे , फलती फूलती रहे.

(आखिर में जब शिखा जी के पूरे तन, मन व मस्तिष्क  में स्पंदन होने लगा तो मुझे लगा कि उन्हें उनके ब्लॉग स्पंदन के सुपुर्द कर उन्हें जय सिया राम...धत तेरे की भूल गए जय श्री कृष्ण  कहकर खिसक ही लिया जाए)

शिखा वार्ष्णेय जी की रचनाओं को पढ़कर अपने मन-मस्तिष्क  में स्पंदन का अनुभव करना हो तो पधारें   http://shikhakriti.blogspot.com/ पर...

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

ब्लॉग को मीत बनातीं सुमन कपूर 'मीत'



प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

     दोस्तो आज आपको ले चलता हूँ हिमाचल प्रदेश के मनमोहक स्थान मंडी शहर में| मंडी को प्राचीन काल में मांडव नगर तथा सहोर के नाम से जाना जाता था| मंडी हिमाचल प्रदेश का एक मुख्य शहर है| यह  हिमाचल  प्रदेश की राजधानी शिमला से 143 किलोमीटर उत्तर की ओर बसा हुआ है| मंडी शहर की सुखदायक गर्मियाँ (दिल्ली की तरह दुखदायक नहीं) और ठंडी सर्दियाँ (हमारी दिल्ली जैसी ठंडी हैं क्या?) प्रसिद्द हैं |  यह हिमाचल प्रदेश के बड़े शहरों में से एक है | इस शहर में नारी जाति के लिए इतना स्नेह और सम्मान है कि यहाँ लिंगानुपात अधिकतम (1013 महिलाएं प्रति हज़ार पुरुषों पर) है|

अब मंडी की ऐतिहासिकता बात करें तो मंडी राज्य की स्थापना बाहु सेन ने 1200 ईसवी में की थी, किन्तु अजबर सेन ने ऐतिहासिक रूप से मंडी शहर की स्थापना 1526 ईसवी में की| वर्तमान मंडी जिला दो राज्यों मंडी राज्य और सुकेत (सुन्दर नगर)  के मिलन से 15 अप्रैल, 1948 में, जब हिमाचल प्रदेश राज्य की स्थापना हुई, आस्तित्व में आया (आप सबका ज्यादा दिमाग तो नहीं खा रहा हूँ?) आज हम मिलने जा रहे हैं इसी मंडी शहर में डटी हुईं सुश्री सुमन कपूर 'मीत' से |  अब जाने किसकी किस्मत में उनका मीत बनना लिखा है? (आप तो अपना ख्याल छोड़ ही दें) किन्तु सुमन जी ने हिंदी को अपनी माँ और ब्लॉग को अपना मीत बना लिया है| 


 सुमन जी के बारे में क्या कहूँ ...हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत शहर मण्डी में एक साधारण परिवार में जन्म लिया माता पिता ने बहुत अच्छी शिक्षा दिलवाई कि आज अपने पैरों पर खड़ी होने के काबिल बनी हैं (आप और हम कब बनेंगे? काबिल)  और सरकारी सेवा में कार्यरत हैं| विज्ञान की छात्रा होते हुए भी हिंदी और साहित्य की तरफ रुझान था मन के जज्बातों को कलम से पन्नों पर लिखने की कोशिश करती हैं पहले लेखन डायरी के पन्नों तक ही सीमित था करीब एक साल पहले अपने पहले ब्लॉग "बावरा मन" से ब्लॉग जगत में   कदम रखा और कुछ समय बाद दूसरा ब्लॉग "अर्पित सुमन" शुरू किया ब्लॉग जगत से प्रोत्साहन मिला  और बस कारवां चल पड़ा शब्द पथ पर .......

 इन्हें इनकी कविता की इन पंक्तियों से ही पहचानने का प्रयास करते हैं..

पूछी है मुझसे मेरी पहचान
भावों से घिरी हूँ इक इंसान
चलोगे कुछ कदम तुम मेरे साथ
वादा है मेरा न छोडूगी हाथ
जुड़ते कुछ शब्द बनते कविता व गीत
इस शब्दपथ पर मैं हूँ तुम्हारी मीत”!!

सुमित प्रताप सिंह- सुमन जी कैसी हैं आप? (सुमन जी के मीत के बारे में पूछूँ कि नहीं?)

 सुमन कपूर 'मीत'- सुमित जी मैं ठीक हूँ. आप कैसे हैं?

 सुमित प्रताप सिंह- गूगल बाबा के आशीर्वाद से हम भी ठीक-ठाक हैं. कुछ प्रश्न लाया हूँ आपके लिए?

 सुमन कपूर 'मीत'- (अपनी हँसी रोकते हुए. काश इस समय वंदना गुप्ता जी और भैया अजय कुमार झा होते तो यह क्षेत्र ठहाकों से गूँज जाता) गूगल बाबा का आशीर्वाद सभी ब्लॉगरों पर बना रहे (इस सरकार के राज में तो मुश्किल सा लग रहा है) यही प्रार्थना करते हुए अपने प्रश्न पूछ डालिए.                                           



सुमित प्रताप सिंह- जी अवश्य ! आपको ब्लॉग लेखन नामक बीमारी कबकैसे और किसके माध्यम से लगी?

सुमन कपूर 'मीत'- जनवरी 2010 मेरे एक दोस्त के प्रोत्साहन पर मैंने अपना पहला ब्लॉग बावरा मन शुरू किया |

सुमित प्रताप सिंह- किसी भी रचना को अच्छा सिद्ध करने हेतु कितनी टिप्पणियाँ काफी हैंएक या फिर सौ?

सुमन कपूर 'मीत'- किसी भी रचना को सिद्ध करने के लिए टिप्पणियों की संख्या निर्भर नहीं करती बल्कि टिप्पणी में उस रचना पर की गई समीक्षा निर्भर करती है | लेखन तब सार्थक हो जाता है जब उसका लिखा पाठक के मन तक पहुँच जाता है | कुछ ब्लोग्स पर बहुत अच्छी रचनाएँ है पर टिप्पणी नहीं है, इससे ये तो नहीं मान सकते कि वो रचना अच्छी नहीं है | जो पुराने ब्लोगर्स हैं उनकी टिप्पणियां ज्यादा होती हैं क्योंकि उन्हें लंबे समय से पढ़ा जा रहा है, नए ब्लोगर्स को स्थापित होने में समय लगेगा पर रचनाएँ उनकी भी बहुत अच्छी हैं पर टिप्पणियां कम |

सुमित प्रताप सिंह- आपकी पहली रचना कब और कैसे रची गई?


सुमन कपूर 'मीत'- मैंने अपनी पहली रचना 1993 में लिखी उस इंसान के लिए जिसे मैं अपनी जिंदगी में सिर्फ दो बार मिली हूँ | मुकेश अंकल जिनसे बिछडने का मुझे बहुत दुःख हुआ था और वो मेरी कलम में उतर आया था मेरी पहली रचना के रूप में न जाने क्यूँ | 

सुमित प्रताप सिंह- आपको लगता है कि आपका लिखना ज़रूरी हैवैसे आप लिखती क्यों हैं?

सुमन कपूर 'मीत'- मैं अपने मन के लिए लिखती हूँ | सारा खेल मन का ही होता है |
कुछ क़तरे हैं
ये जिन्दगी के
जो जाने अनजाने
बरबस ही
टपकते रहते हैं
मेरे मन के आंगन में................



सुमित प्रताप सिंह- लेखन में आपकी प्रिय विधा कौन सी है?

सुमन कपूर 'मीत'- जो मन में विचार आ जाये उस पर लिख लेती हूँ |
                 (अमां ये क्या बात हुई?)
सुमित प्रताप सिंह- अपनी रचनाओं से समाज को क्या सन्देश देना चाहती हैं?

 सुमन कपूर 'मीत'- इस शिक्षित दुनिया को एक कवि क्या सन्देश देगा ...बस यही कहना चाहती हूँ कि आज कि इस भागदौड  वाली जिंदगी मे हर इंसान खुद से दूर चला गया है ..भावनाएं बस नाम भर की रह गई हैं ... मानव ह्रदय अटूट प्रेम से भरपूर है ....उसे मशीनी ना बनने दें ...

(जो मशीन बन गए हैं उन्हें कैसे सुधारें?)


सुमित प्रताप सिंह- एक अंतिम प्रश्न. "ब्लॉग पर हिंदी लेखन द्वारा हिंदी का विकास"  इस विषय पर आप अपने कुछ विचार रखेंगी?

सुमन कपूर 'मीत'-  ये बात बिल्कुल सही है कि ब्लॉग के जरिये हिन्दी का बहुत विकास हुआ है |ब्लॉग जगत ने नए कवियों और लेखकों  को एक अलग पहचान दी है | उन्हें एक ऐसा मंच दिया है जिनसे उनकी छिपी प्रतिभा दुनिया के सामने आई है | लोग हिंदी की तरफ विमुख हों रहें थे पर ब्लॉग के जरिये एक और जहां उनके लेखन को मंजिल मिली वही दूसरी और हिन्दी को बढ़ावा भी मिला |

(अचानक ही सुमन 'मीत' जी प्रेम से कम्प्यूटर महाराज की ओर देखने लगीं हम समझ गए कि अपने मीत से मिलने का उनका समय हो गया है... उन्हें उनके मीत के साथ छोड़ चल दिए किसी और से जय सिया राम करने)

सुमन कपूर 'मीत' के मीत से मिलना हो तो पधारें http://www.sumanmeet.blogspot.in/ पर...

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

चिट्ठी लिखतीं सुष्मिता सिंह




प्रिय मित्रो

सादर ब्लॉगस्ते!

     दोस्तो कभी आपने सोचा है कि पहले चिट्टी किसने लिखी होगी? अगर पता चल जाए तो मुझे भी बताना |  अभी हाल के कुछ सालों तक चिट्ठी एक-दूसरे के विचारों के आदान-प्रदान का प्रमुख स्रोत थी प्रेमी-प्रेमिकाओं के जीवन का तो यह एक अभिन्न भाग थी और उन्होंने डाकिया चचा को देवदूत का पद प्रदान कर रखा था | किन्तु समय ने करवट बदली और चिट्टियों का युग भी बदला और बदल गई डाकिया चचा की किस्मत थी  | अब लोगों ने डाकिया चचा को मक्खी मारने का काम सौंपकर इंटरनैट पर चिट्ठियां लिखनी आरंभ कर दी हैं तथा इन चिट्टियों को संबंधित व्यक्ति तक पहुँचाने का जिम्मा भी स्वयं ही संभाल लिया है | मतलब कि खुद ही अंतरजातीय डाकिया बन गये हैं  | आज हम मिलने जा रहे है एक ऐसे हिंदी ब्लॉगर से जो इंटरनैट पर चिट्टियाँ लिखने में मस्त रहती हैं | मजे की बात यह है कि इनके ब्लॉग का नाम भी चिट्टी जगत है | सुष्मिता सिंह ने  मास कम्यूनिकेशन में एम.फिल किया है और अभी सोपान स्टेप पत्रिका के साथ काम करती हैं, जो हम दिलवालों की दिल्ली से निकलती है और उस दुनिया के बारे में होती है जिसे गाँव कहते हैं | इनके ब्लॉग का नाम  है तो चिट्ठीजगत लेकिन वो सिर्फ इनकी नहीं आप और हम सब की चिट्ठी है| चलिए मिलते हैं सुष्मिता सिंह से...

सुमित प्रताप सिंह- नमस्कार सुष्मिता सिंह कैसी हैं आप?

सुष्मिता सिंह- जी मैं ठीक चिट्ठी लिखने में मस्त हूँ |  आप कैसे हैं?

सुमित प्रताप सिंह- हम भी ठीक हैं. कुछ प्रश्न लाया हूँ आपके लिए.

सुष्मिता सिंह- जी पूछिए.

सुमित प्रताप सिंह- आपने अपनी पहली कागजी चिट्ठी कब और किसे लिखी?

सुष्मिता सिंह- जी मैंने पहली चिट्ठी दसवीं कक्षा में अपने दादा जी को लिखी थी|

( दादा जी को या फिर किसी और को? अरे आप क्यों मुस्कुरा रहे हैं?)

सुमित प्रताप सिंह- आपने अंतिम कागजी कब और किसे लिखी?

सुष्मिता सिंह- जी मैंने अंतिम कागजी चिट्ठी करीब तीन साल पर अपने एक भैया को लिखी थी|

( भैया को या फिर? हद हो गई पहले आप मुस्कुरा रहे और अब शर्माने भी लगे...खैर...)
   



सुमित प्रताप सिंह- आपको ब्लॉग लेखन करने के बारे में कैसे सूझा?

सुष्मिता सिंह- ब्लॉग के बारे में सुना था कि ये कोई बला है तो मैंने इसके बारे में और दिलचस्पी दिखाई और मेरा एम. फिल. का विषय ही न्यू मीडिया और ब्लॉगिंग बना इसलिए ब्लॉग लेखन और नए पुराने ब्लॉग, ब्लोगरों के बारे में जानना भी मुझे अच्छा लगने  लगा | जब मैंने ब्लॉग के बारे में जाना तो लिखना भी सूझ गया | जब लिखना सूझ ही गया तो अब लिखते रहते हैंअब ये न पूछियेगा कि क्या लिखते हैं |  थोडा हमारे ब्लॉग की सैर भी कर लीजिए | 





सुमित प्रताप सिंह- आपकी पहली रचना कब और कैसे रची गई?

सुष्मिता सिंह- रचना वो भी पहली ये तो ठीक है लेकिन कहाँ ये नहीं पूछा आपने| मैं फिर भी बता देती हूँ| स्कूल की मैगज़ीन में विदाई नाम से एक कविता छपी थी जब स्कूल से हमारी विदाई होने वाली थी | तब लिखने का शौक नहीं बल्कि दोस्तों से विदाई के गम में कविता बन गई | और  ब्लॉग पर  पहली रचना मेरी न हो कर मेरे दोस्त की आठवी में पढने वाली  छोटी बहन की एक कविता थी जो मेरे ब्लॉग पर आई | वह कविता एक भिखारी पर लिखी गई थी | उसके बाद जब मेरी रचना मेरे ब्लॉग पर आई तो आज तक आ ही रही है | पहली तो आ गई आखिरी का पता नहीं... 





सुमित प्रताप सिंह- आप लिखती क्यों हैं?

सुष्मिता सिंह- लिखते क्यों है, ये क्या बात हुई | अब हम लिखते क्यों है ये बता कर लिखेंगे क्या? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमें भी है |  हमारे मन के विचारों को साकार रूप देने के लिए| कभी अपने लिए कभी आपके लिए | अभिव्यक्ति के लिए | लिखेंगे हमेशा लिखेंगे | ब्लॉग पर और भी लिखेंगे | आप को कमेन्ट करना है तो करें, मैं भी करुँगी | आप भी लिखे हम भी लिखे| सब लिखे पढ़े और आगे बढ़ें | 




सुमित प्रताप सिंह- लेखन में आपकी प्रिय विधा कौन सी है?

सुष्मिता सिंह-- अब विधा कौन सी बताऊ | जिस विधा में हमारी लेखनी फिट बैठ जाये वही प्रिय है | विधाता ने इतनी विधाएँ बनाई है किसका किसका नाम ले | कभी कवि, कभी लेखक तो कभी शायर बनने का भी मन करता है पर शायरी आती कहाँ हमें | अगर ब्लॉग की बात करे तो आज हर विधा में ब्लॉग मौजूद है बशर्ते आप क्या पढ़ना पसंद करेंगे | और लेखन को किसी विधा में बाँटना जरुरी तो नहीं | 


(ये लो जी हमने तो विधा पूछी थी सुष्मिता ने प्रवचन ही दे डाला| राम-राम जपो...) 




सुमित प्रताप सिंह- अपनी रचनाओं से समाज को क्या सन्देश देना चाहती हैं?

सुष्मिता सिंह- हमारी रचनाओं से समाज को क्या सन्देश मिला ये तो समाज बेहतर बता पायेगा (तो आप क्या बाएंगिन?)  हम तो सिर्फ लिखने का काम करते हैं | अगर समाज का आइना बनते है हमारे लेख तो कुछ देखते ही होंगे समाज में रहने वाले इस आईने में | सन्देश तो हर वो चिट्ठी देती है जो पढ़ते ही याद दिलाती है वो यादे जो कही खो गई हैं दुनियादारी में | 
(लो फिर प्रवचन शुरू... अब श्याम-श्याम जपो...)




सुमित प्रताप सिंह- एक अंतिम प्रश्न "ब्लॉग पर हिंदी लेखन और हिंदी की प्रगति में युवाओं का योगदान" इस विषय पर आप कुछ विचार रखेंगी?

सुष्मिता सिंह- 55 युवा आबादी है भारत की | युवा शक्ति से तो सभी वाकिफ होंगे ही | जहां इनकी चाह होगी वहां राह बना ही लेते हैं | युवा मूवी तो याद है ना | जहाँ तक ब्लॉग की बात है यह एक तरह से सिटिज़न पत्रकारिता का भी एक रूप है | जब युवा भारत अपनी सशक्त अभिव्यक्ति के लिए तैयार है तो ब्लॉग उनका साथ कैसे छोड़ सकता है | बस एक माध्यम चाहिये आगाज के लिए अंजाम तक तो खुद ब खुद पहुँच जाते हैं ईश्वर के दूत | स्वागत है युवा ब्लोगरों का...कदम कदम बढ़ाये जा... 

( सुष्मिता सिंह का मन चिट्ठी लिखते-लिखते शायद गीत गाने का कर रहा था सो उन्हें यूँ गुनगुनाते और निरंतर चिट्ठी लिखते रहने की शुभकामनाएँ देते हुए राह पकड़ी अपने डगर की )


सुष्मिता सिंह की चिट्ठियाँ पढ़नी हों तो पधारें http://chitthijagat.blogspot.in/  पर...
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