गुरुवार, 13 जून 2019

रोचक शीर्षक वाली अनूठी पुस्तक ये दिल सेल्फ़ियाना

      पुलिस का नाम लेते ही आमतौर पर लोगों के मन में किसी भ्रष्ट, कामचोर या क्रूर व्यक्ति की छवि उभरती है; कोई ऐसा व्यक्ति, जिससे गुंडे-बदमाश तो साँठगाँठ कर लेते हैं और आम आदमी घबराता है।

लेकिन सब उंगलियां बराबर नहीं होतीं। अपवाद हर जगह होते हैं और सुमित जी ऐसे ही एक अपवाद हैं। अपवाद इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि पुलिस की रूखी, ऊबाऊ, बेरंग नौकरी करने के बावजूद भी कोई व्यक्ति उत्कृष्ट व्यंग्यकार और कुशल कवि भी हो सकता है। वर्दी वाले कठोर चेहरे के पीछे कोई कोमल हृदय वाला संवेदनशील कवि भी छिपा हो सकता है। बन्दूक चलाने वाले शक्तिशाली हाथ उतनी ही कुशलता से कलम भी चला सकते हैं और अपराधियों को रुलाने वाले लोग अपने व्यंग्य की गुदगुदी से पाठकों को हंसाकर लोटपोट भी कर सकते हैं। ऐसे दो विपरीत ध्रुवों के बीच कुशलता से सन्तुलन बना सकने वाले और दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से सफल हो सकने वाले लोग बहुत विरले ही होते हैं, इसीलिए सुमित जी को मैंने अपवाद कहा था।

ये विचार मेरे मन में इसलिए आए क्योंकि आज मैंने उनका व्यंग्य संग्रह "ये दिल सेल्फ़ियाना" पढ़ा। इस पुस्तक का नाम जितना रोचक है और उस पर Shyam Jagota जी का बनाया हुआ मुखपृष्ठ जितना आकर्षक है, इस पुस्तक की विषय-वस्तु और सामग्री भी उतनी ही अनूठी है।

पुस्तक के प्रस्तावना में ही सुमित जी ने "सेल्फ़ी रोग" के लक्षण, कारण, प्रभाव और लाभ गिनवाए हैं। उन्होंने यह भी स्वीकारा है कि इस सेल्फ़ी रोग की "दुष्प्रेरणा" से ही उन्हें इस व्यंग्य संग्रह को ऐसा नाम देने की बुद्धि सूझी!

लेकिन यह संग्रह केवल सेल्फ़ी की महिमा बताने तक सीमित नहीं है। इसमें चुगलखोरी का वर्णन भी है, महान चित्रकार पिकासो को टक्कर देने वाले गुटखेबाजों की प्रशंसा भी है, मच्छर तंत्र की चुनौतियां भी हैं और खर्राटों वाली रेलयात्रा का वृत्तांत भी है। ऐसे विभिन्न विषयों को बड़ी कुशलता से समेटने वाले और समाज की निष्क्रियता, लापरवाही और दुर्गुणों पर करारी चोट करने वाले कुल ३७ व्यंग्य लेख इसमें हैं, जो पाठक को कभी गुदगुदाते हैं, कभी अचानक कुछ याद दिलाते हैं, तो कभी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर भी कर देते हैं। मुझे लगता है कि हर संवेदनशील और जागरूक व्यक्ति को इस पुस्तक में कुछ न कुछ अवश्य मिलेगा।

युवा लेखक, व्यंग्यकार और कवि सुमित जी की अनेक पुस्तकें, काव्य संग्रह और व्यंग्य रचनाएँ अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी पुस्तकों का अनेक भारतीय भाषाओं में और अंग्रेज़ी में भी अनुवाद हो चुका है। अपनी विशिष्ट उपलब्धियों के लिए उन्हें अब तक अनेक विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है और उनका लेखन-कार्य अभी भी अनवरत जारी है। अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी वे अक्सर अपने विचार व्यक्त करते हैं, और वे कई सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहते हैं।

पुलिस की तनावपूर्ण और कठिन नौकरी के बावजूद भी सुमित जी अपने लेखन और काव्य रचना के लिए सतत समय निकाल पाते हैं, यह वाकई अद्भुत और प्रशंसनीय है।

उनके भावी लेखन और सफलताओं के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं!

सुमंत विद्वान्स

कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका

बुधवार, 29 मई 2019

व्यंग्य - दौरा बनाम दौर


- भाई नफे!
हाँ बोल भाई जिले!
- जो मैं देख रहा हूँ, क्या तू भी वो सब देख पा रहा है?
- तू भला क्या दिखाने की कोशिश में है?
- अरे उसी को जो धड़ाधड़ जारी है।
- क्या धड़ाधड़ जारी है?
- भाई इन दिनों विभिन्न राजनीतिक दलों में धड़ाधड़ इस्तीफों का सिलसिला चल रहा है। अब तो ये हाल है कि किसी नेता के हाथ में कोई कागज दिखे तो एक पल को ऐसा लगता है कि कहीं वह उसका इस्तीफा न हो।
- हा हा हा अच्छा लतीफा है।
- भाई अब तो इस्तीफे और लतीफे में फर्क करना मुश्किल हो गया है। इस्तीफे इतने धड़ल्ले से दिए जा रहे हैं, जितने धड़ल्ले से कवि सम्मेलनों में कविता के नाम पर लतीफे श्रोताओं को झिलवाये जाते हैं।
- भाई ये  शायद इस्तीफ़ा रूपी लतीफ़ों का दौर है।
- पर ये दौर आया कैसे?
- ये दौर दौरों के फलस्वरूप आया है।
- मैं कुछ समझा नहीं। जरा खुलके बता।
- चुनावों के दौरान नेताओं को विभिन्न प्रकार के दौरे पड़े।
- एक-दो उदाहरण तो दे।
- किसी को अपनी छिन चुकी सत्ता को बचाने का दौरा पड़ा, किसी को तानाशाही का दौरा पड़ा तो किसी को राष्ट्रवाद का दौरा पड़ा।
- भाई पहले दो दौरे तो समझ में आते हैं पर ये तीसरा दौरा भला दौरा कैसे हुआ? जहाँ तक मेरा मानना है कि राष्ट्रवाद एक पवित्र भावना है, जो अपने देश से प्रेम करने वाले हरेक व्यक्ति के दिल में बसती है।
- ये बात तेरे-मेरे जैसे लोग ही तो समझते हैं। बाकी के लिए तो राष्ट्रवाद केवल दौरा है, जो इस देश को विनाश की ओर ले जा रहा है। 
- मतलब कि राष्ट्रवाद को दौरा मानने वालों के अनुसार हमें राष्ट्रवाद को तिलांजलि देकर दुश्मन देश के चरण छूकर उससे शांति की याचना करनी चाहिए, वो अगर हमारे एक गाल पर तमाचा मारे तो अपना दूसरा गाल आगे कर देना चाहिए और देश की थाली में खाकर उसी में छेद करने वाले महानुभावों को ससम्मान अपना कार्य करते देना चाहिए।
- बिलकुल भाई, जो इन सबको स्वीकार न करे, तो उनके अनुसार उसे राष्ट्रवाद के दौरे ही पड़ते हैं। 
- भाई देश का नागरिक अब इतना बौरा नहीं रहा, कि वो कह दें और राष्ट्रवाद दौरा कहलाया जाने लगे।
- तो फिर राष्ट्रवाद को किस नाम से परिभाषित किया जाना चाहिए?
- राष्ट्रवाद ऐसा भयंकर तूफान है जिसमें देश के प्रति दुर्भावना रखने वाले सही-सलामत नहीं बचेंगे।
- तेरे कहने का अर्थ है कि राष्ट्रवाद दौरा नहीं, बल्कि अब राष्ट्रवाद का दौर है।
- बिलकुल भाई, और अब ये दौर देश में अनवरत चलता रहेगा।
- एवमस्तु!

लेखक - सुमित प्रताप सिंह
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