बुधवार, 16 मई 2018

पाठकों के लिए नायाब तोहफा है ये दिल सेल्फ़ियाना


   व्यंग्य का सामर्थ्य असीमित होता है। व्यंग्य के माध्यम से विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, नकारात्मकता, रुग्णता पर किया प्रहार एक तिलमिलाहट की रचना करता है।  वस्तुतः विकार के विरुद्ध आवाज उठाना पर एक विशिष्ट शैली व सीधे  बल्कि घुमा-फिराकर वही व्यंग्य के नाम से जानी जाती है। या यूँ कहें कि जूते को मखमल में लपेटकर मारने की कला का नाम है व्यंग्य। पर व्यंग का सृजन कोई सरल प्रक्रिया नहीं है। गहन चिंतन सामाजिक सर्वेक्षण विसंगति व अस्वस्थता  की खोज, फिर विषय वस्तु की तीक्ष्णता को यथावत रखते हुए उसे चाशनी में पागकर  प्रवाहमयता व संप्रेषणीयता के साथ पाठक के समक्ष परोसना कोई सुगम व आसान कार्य नहीं है। वस्तुतः व्यंग्य की रचना  श्रमसाध्यता, बुद्धिसाध्यता व धैर्यसाध्यता के उपरांत ही संभव होती है। इसीलिए व्यंग्यकार बन पाना कठिन ही होता है।

 इस समय जो युवा व्यंगकार समग्र ऊर्जस्विता व ओजस्विता के साथ व्यंग्य सृजन करके तीव्रता के साथ सफलता के सोपानों को नाप रहा है वह है सुमित प्रताप सिंह। जो कि 'ये दिल सेल्फ़ियाना' कृति के माध्यम से अपना चौथा (कुल छह पुस्तकें) व्यंग्य संग्रह लेकर पाठकों के समक्ष रूबरू हुए हैं।  एक से बढ़कर एक व्यंग्य, अनूठी मौलिकता, विषय वस्तु की उत्कृष्टता, शब्दों का शानदार मायाजाल, प्रस्तुतीकरण की विशेषता, अन्वेषणात्मक शैली, गुदगुदाते वाक्यकथ्य का बखूबी प्राकव्य समस्त असाधारण व अनुपम गुणधर्म हमें इस कृति के समस्त व्यंग्यों में दृष्टिगोचर होते हैं। 

गुटखे की पीक के माध्यम से यत्र-तत्र-सर्वत्र कलाकृतियों के निर्माता पिकासो को ढूंढकर पाठकों के समक्ष अत्यंत निपुणता से प्रस्तुत करके सुमित हम और हमारे 'स्वच्छता अभियान' की दशा/दुर्दशा का सहज ही मूल्यांकन करने में समर्थ दिखाई देते हैं। वे व्यंग बाण चलाकर लक्ष्य भेदने में सफल होते हैं। वे लिखते हैं - "देशी विदेशी पर्यटक तो इन कलाकृतियों को देखकर इन्हें निर्मित करनेवाले गुटखेबाज कलासेवियों की कलाकारी के आगे नतमस्तक हो उठते हैं।"  चाहे 'ढीले लंगोट वाले बाबा' की बात हो या फिर 'मुल्लाजी और शुभचिंतक लल्लाजी' का वृतांत व्यंग्यकार हर पिच पर सेंचुरी बनाते हुए दृष्टिगत होता है। 

 बेवफा सोनम गुप्ता के नाम पत्र लिखते समय तो व्यंग्यकार भाषा विज्ञानी ही नहीं, बल्कि भाषा अन्वेषक व शब्द विशेषज्ञ प्रतीत होता है जब वह इस पत्र का आरंभ ‘सादर दिल जलस्ते’ से संबोधित करते हुए करता है। 'अब तेरा क्या होगा कालिया' व ‘'नौटंकी उत्सव' में सुमित एक अलग ही प्रकार का प्रताप दिखाते हुए सुशोभित होते हैं।  चाहे कथ्य की बात हो, शिल्प की या फिर प्रस्तुति की वे नायाब हैं, बहुत खूब हैं, विशिष्ट हैं और उत्कृष्ट हैं। हँसने-हँसाने के मध्य अपना संदेश देने में जो व्यंग्यकार कदापि ना चूके वह चोखा है और वही अनोखा है। वे लिखते हैं -  "जिन संतानों में अपने माँ-बाप को सूखी रोटी देने में भी प्राण निकलते थे, वो ही श्राद्धों में कौओं को  पूर्वजों के नाम पर खीर- पूरी गर्वित होकर खिलाते हुए मिल जाते हैं।"
 'अल्लाह हू अकबर' में तो शुरु से ही उन्होंने छक्का जड़ दिया है। वे लिखते हैं - "अल्लाहू अकबर! कोई चीखा। इस चीख के साथ ही धड़ाधड़ बम फूटने आरंभ हो गए। बम धमाकों के बाद सुनाई दी जानेवाली चीत्कारों से हृदय द्रवित होने लगा।" यह पढ़कर बाकी व्यंग्य पढ़ने की जरूरत ही नहीं रह जाती है। फर्क, मच्छर तंत्र व मेरी खर्राटों भरी रेलयात्रा में भी रचनाकार प्रांजल भाषा, लय, प्रवाह, अनुशासन, तीखेपन व गतिशीलता के साथ आगे बढ़ता हुआ नज़र आता है। पाठकों को अपने से जोड़ लेने व वशीभूत कर लेने की क्षमता व्यंग्यकार सुमित प्रताप सिंह में निसंदेह विद्यमान है। 

यथार्थ तो यह है कि सफल व्यंगकार वही होता है, जो समाज और उसके हालातों को गहनता, सूक्ष्मता, संजीदगी, परिपक्वता व पैनेपन के साथ न केवल देखता है, बल्कि उन्हें समझ-बूझकर विश्लेषित भी करता है। जो व्यंग्यकार विसंगतियों की जाँच-पड़ताल जितनी सूक्ष्मता से कर लेता है, वह उतना ही अधिक समर्थ व्यंग्यकार माना जाता है।  सुमित में ऐसे ही लक्षण स्पष्टतः  नज़र आते हैं। उनके पास अभिधा, व्यंजना, लक्षणा शक्तियों का सामर्थ है, तो 'पिन पॉइंट' करने का मादा भी है। वे कहने के पूर्व स्वयं भी बहुत कुछ सोचते-समझते हैं और पाठकों को भी बहुत कुछ सोचने-समझने को विवश कर देते हैं। कहीं वे पुलिस को रगड़ते हैं, तो कहीं दुपट्टे के सिसकने पर उसकी खबर लेते हैं। पिता दिवस की कलई खोलते हुए वे जो लिखते हैं वो सीधा कलेजे में बिंध जाता है। भले ही बिंधे, घाव करे या पीड़ा दे पर यह तो वही है जो सुमित प्रताप सिंह 'माफ कीजिएगा पिताजी' में लिखते हैं।  वे लिखते हैं - "कोई वृद्धाश्रम में जाकर अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ अमूल्य क्षण निकालकर अपने पिता के साथ पितृ दिवस मनाकर अपने पुत्र होने के कर्तव्य को निभायेगा, तो कोई भला मानव आज घर के कोने में अपने जीवन के अंतिम दिन गुज़ार रहे पिता को एक दिन ताजा और स्वादिष्ट भोजन खिलाकर अपने अच्छे बेटे होने का सबूत देते हुए मिल जाएगा।"  

उनके जन्मदिवस पर, चाँद सीढ़ी का खेलबाबा के चरण, भेड़िया आया व बलि जैसे व्यंजनों का  खरापन व चोखापन पाठक को तिलमिला देता है। पर है  तो सत्य व प्रमाणित यथार्थ। 'बलि' व्यंग्य का समापन अत्यंत मर्मस्पर्शी है - "राम समूह अपने माथे का पसीना पोंछते हुए भर्राए हुए स्वर में बोले - गांधी की बलि चढ़ा कर आया हूँ। वो भी एक नहीं सैकड़ों की, ताकि पेंशन का बाकी पैसा आराम से मिल जाए और हमारी बेटी दहेज की बलि न चढ़ सके।" साफगोई व सरलता के साथ हमारे समाज के नंगेपन को चित्रित करता है यह व्यंग्य अद्वितीय व असाधारण है। जहाँ 'साहित्यिक बगुले' में वे व्यावसायिकता पर करारी चोट करते हैं, तो वहीं 'दुशासन का लुंगीहरण' में वे एक अनूठा व उत्कृष्ट आयाम लिए हुए नज़र आते हैं।  श्रीकृष्ण दुशासन की पुकार सुनकर लुंगी की लंबाई बढ़ाने में लग जाते हैं। शायद नारी मुक्ति का यही परिणाम होगा, कि पुरुष को अपनी लुंगी को सुरक्षित रख पाना मुश्किल हो जाएगा। विषय वस्तु की असाधारणता व प्रस्तुति की कोमलता, माधुर्य व सरसता ने सभी व्यंग्यों को  रससिक्त बना दिया है।

 शीर्षक व्यंग्य 'ये दिल सेल्फ़ियाना' में वे सेल्फी लेने की लत / जुनून पर चोट करते हैं। इसे वे 'सेल्फ़ीसाइड' रोग का नाम देते हैं। सेल्फ़ी लेने में होने वाली दुर्घटनाओं की बात भी वे करते हैं।  इसकी तुलना वे सनक से करते हैं। 'लव फ़ॉर सेल्फ़ी' की खबर लेते व्यंग्यकार सुमित प्रताप सिंह वास्तव में छिद्रावलोकन करने का सामर्थ्य रखते हैं।  वे लिखते हैं - "जहाँ घराती और बाराती विभिन्न पकवानों का आनंद ले रहे होते हैंवहीं सेल्फ़िया सेल्फ़ी से अपनी भूख मिटा रहा होता है।"

यह यथार्थ है कि सुमित प्रताप सिंह का व्यंग्य लेखन धमाकेदार है।  वस्तुतः वे परिपक्व हैं, सिद्ध हैं, समर्थ हैं और सक्षम भी। उनके पास एक मौलिक नज़रिया है और प्रस्तुतीकरण का असाधारण सामर्थ्य है। उनकी शैली में एक विशिष्टता है और ताज़गी भी है। वे आभासी दुनिया, असंवेदनशीलता, निष्ठुरता, असामाजिकता व मूल्य पतन पर बेहतरीन कलम चला रहे हैं। हर व्यंग्य को रोचक बनाने का उनमें सामर्थ्य है।  मैं उनके प्रति अनंत शुभकामनाएं अर्पित करते हुए उनके सारस्वत यश की मंगलकामना करता हूँ। 

'सुमित' आजकल लिख रहे, विभिन्न व्यंग्य अभिराम।
हो प्रताप हरदम 'शरद', आये नहीं विराम।।

- प्रो. शरद नारायण खरे
विभागाध्यक्ष, इतिहास
शासकीय जे.एम.सी. महिला महाविद्यालय,
मंडला (म.प्र.)

शनिवार, 5 मई 2018

लघुकथा - नेक बदला


    जिले ने नफे से पूछा - नफे उस दिन फतेह ने तेरी जो बेइज्जती की थी, उसका तूने बदला लिया कि नहीं?
इससे पहले कि नफे कुछ कहता सूबे बोल पड़ा - भाई इसने तो ऐसा बदला लिया है कि फतेह उसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएगा।
जिले ने हैरानी से पूछा - ऐसा कैसा बदला ले लिया, जो भुलाया न जा सके?
सूबे मुस्कुराते हुए बोला - नफे से ही पूछ ले न।
जिले - भाई नफे आखिर क्या बदला लिया तूने?
नफे मंद-मंद मुस्कुराया - ये तो तू सूबे से ही पूछ।
जिले बेचैन हो बोला - अरे भाइयो काहे को तड़पा रहे हो? सीधे-सीधे बता क्यों नहीं देते कि आखिर हुआ क्या था?
सूबे ने बताया - फतेह नफे से जिस दिन लड़ा था, उसके अगले दिन ही उसका सड़क पर एक्सीडेंट हो गया। एक्सीडेंट में फतेह के शरीर से काफी खून बह गया था और जब उसे खून की जरूरत पड़ी तो हमेशा उसके साथ रहने वाले उसके सारे संगी-साथी कोई न कोई बहाना कर उसे पीठ दिखा गए।
सूबे की बेचैनी कुछ और बढ़ गई। उसने बेचैन हो पूछा - अच्छा फिर क्या हुआ?
सूबे बोला - फिर क्या होना था। जब ये बात अपने नफे को पता चली तो ये झट से हॉस्पिटल जा पहुँचा और फतेह के लिए रक्तदान कर डाला। 
सूबे ने आगे पूछा - जब फतेह को ये पता चला तो उसने क्या किया?
सूबे बोला - करना क्या था। वह अपने दोनों हाथ जोड़कर रोते हुए नफे से अपने कर्मों के लिए माफी माँगने लगा। उसके ऐसा करने पर नफे ने उससे कहा कि ये नफे का बदला लेने का तरीका है। अब फतेह की रगों में फतेह के संग-संग नफे का खून भी दौड़ा करेगा।
जिले नफे को अपने सीने से लगाते हुए बोला - मेरे यार बहुत ही नेक बदला लिया है तूने।
लेखक - सुमित प्रताप सिंह, नई दिल्ली
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