बुधवार, 6 नवंबर 2019

कविता : खौफ में है आदमी

(कलियुग की सूपर्णखाओं के सम्मान में एक कविता)

रतों के खौफ के साये में
इन दिनों जी रहा है आदमी
नित नए अपमान का घूँट 
इन दिनों पी रहा है आदमी

दे दिया है संविधान ने 
अधिकार बेशक बराबरी का 
पर वो अधिकार शायद 
नहीं है आदमी की बिरादरी का
अपना हाथ माथे पर धरे 
ये सोचे जा रहा है आदमी
औरतों के खौफ के साये में
इन दिनों जी रहा है आदमी

कान उसके सुन रहे हैं
औरतों की चीत्कार को 
पर लब न खुल पा रहे
चीत्कार के प्रतिकार को
वो जानता है कि न साथ देगा
उसके संग का ही आदमी
औरतों के खौफ के साये में
इन दिनों जी रहा है आदमी

बेबसी है दोस्त उसकी 
बेचारगी अब उसके संग है
अपने इस हाल पर तो 
खुद आदमी भी दंग है
इसलिए ज़ुल्म सहता रहता
मायूस हो बेचारा आदमी
औरतों के खौफ के साये में
इन दिनों जी रहा है आदमी।
लेखक : सुमित प्रताप सिंह

सोमवार, 21 अक्तूबर 2019

कविता : सच्ची दिवाली


इस दिवाली दिये जलाना
देश की सौंधी माटी के 
भूल के भी तुम मत लाना
लड़ियाँ-बल्ब चीन घाती के

अपना पैसा अपने घर में
हमें छिपा के रखना है
लघु उद्योगों की सांसों को 
हमें बचा के रखना है

लड़ी-बल्बों से कीट-पतंगे
घर के भीतर बढ़ते हैं
दिये जलाना घी के तुम 
बीमारी को ये हरते हैं

चीनी बल्बों से भारत की 
अर्थव्यवस्था टिमटिम करती है
देशी दिये अपना के देखो
कैसे ये सरपट भगती है

मँहगे मॉलों में जा-जाकर
पैसा न व्यर्थ लुटाना तुम
देसी बनिये से कर खरीदारी 
उसका आस्तित्व बचाना तुम

तब ही मनेगी देश में अपने
अच्छी और सच्ची दिवाली
अर्थव्यवस्था झूमेगी खुश हो
और फैलेगी देश में खुशहाली।

लेखक : सुमित प्रताप सिंह

चित्र गूगल से साभार 

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