शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

व्यंग्य : जीना इसी को कहते हैं

भाई जिले!
हाँ बोल भाई नफे!
आज कैसे उदास हो बैठा है?
कुछ नहीं भाई बस इस जीवन से निराश हो गया हूँ।
वो क्यों भला?
भाई सारी जमा पूंजी लगाकर एक धंधा शुरू किया था पर वो जमा नहीं। सारा पैसा डूब गया। अब समझ में नहीं आता कि क्या करूँ।
तो इसमें इतना निराश क्यों होता हैथोड़ी कोशिश और मेहनत कर सब ठीक हो जाएगा।
भाई अगर तू मेरी जगह होता तो अब तक किसी पेड़ पर लटक चुका होता 
- भाई इतना भी सिरफिरा नहीं हूँ, जो पेड़ पर लटककर अपनी कीमती जान दे दूँ और न ही मैं उन लोगों जितना महान नहीं हूँ, जो आए दिन जरा सी परेशानी या मुसीबत आनेपर इस अनमोल जीवन का राम नाम सत्य कर डालते हैं। मेरा मानना है कि कई योनियों के बाद नसीब हुआ ये मानव जीवन यूँ एक पल में गँवाने के लिए नहीं है जब तक कि इसके पीछे कोई नेक उद्देश्य न हो।
- नफे तू भी कहाँ मेरे और मेरे जैसे लोगों के दुखों को सुन भावुक हो उठा। खैर तू मेरी छोड़ अपनी सुना। आज तेरे चेहरे पर बड़ी रौनक लग रही है। कहाँ से आ रहा है?
भाई आज इंडिया गेट की सैर करके आ रहा हूँ।
अरे वाह तो क्या-क्या देखा वहाँ?
वहाँ अंग्रेजों की सेवा करते हुए प्रथम विश्व युद्ध और अफगान युद्धों में मारे गए 90,000 अंग्रेज भक्त भारतीय सैनिकों की याद में अंग्रेजों द्वारा बनवाया गया युद्ध स्मारक रुपी इंडिया गेट देखाइसकी मेहराब के नीचे स्थित आजादी के बाद स्थापित की गई अमर जवान ज्योति को सादर नमन कियाइंडिया गेट के इर्द-गिर्द घूमते हुए पानी पूरी खायी और जिले सिंह से मुलाकात की।
अरे भाई मैं वहाँ कहाँ मिल गया जबकि मैं तो कल दुखी हो अपना सिर पकड़े हुए घर पर ही पड़ा रहा।
भाई वो जिले सिंह कोई और था। हमें देखते ही पुकारकर अपने पास बुला लिया। गुब्बारे बेच रहा था। अब से कुछ साल पहले नाई का काम करता था। दिल्ली के एंड्रूज गंज इलाके में मालिक सनी की दुकान में जिले सिंह नौकर नहीं बल्कि मालिक की तरह काम करता था। बहुत ही हाजिर जवाब था। अपने ग्राहक के बालों को काटते हुए उनका खूब मनोरंजन करता रहता था और साथ ही साथ अपने मालिक सनी की खिंचाई भी करता रहता था।
फिर वो गुब्बारे क्यों बेचने लगा?
उसके मालिक को रोज शराब पीने की बुरी आदत थी। जिले ने उसे बहुत समझाया पर वो नहीं माना। सनी भी उन भले लोगों में से एक था जो नेक सलाह को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकालना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। और एक दिन वो भी आया जब शराबखोरी ने सनी का एक्सीडेंट करवा दिया और सनी अपने परिवारअपनी दुकान और जिले सिंह को छोड़कर हमेशा के लिए चला गया।
- ओहो ये तो बहुत दुखद हुआ। अच्छा फिर जिले का क्या हुआ?
- जिले अच्छा कारीगर था पर उसे कहीं काम नहीं मिला।
- क्यों भई अच्छे कारीगर को तो काम मिलने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए थी।
- भाई जिले सिंह खरी बात कहनेवाला खरा इंसान ठहरा और आज के जमाने में खरी-खरी कहनेवालों को बिलकुल भी पसंद नहीं किया जाता। और फिर उसकी उम्र और बालों में आ रही सफेदी भी उसके काम मिलने के आड़े आ गयी।
और वो बेचारा इंडिया गेट पर गुब्बारे बेचने लगा।
हाँ पर वो निराश नहीं था। उसके भीतर जिंदगी को जीने का जज्बा दिखाई दे रहा था। वो और लोगों की तरह निराशा से अपना जीवन बर्बाद करने की बजाय मेहनत करके अपने और अपने परिवार की गुजर-बसर करने के लिए प्रयासरत है और कुला मिलाकर खुश है। वैसे दोस्त एक बात कहूँ जीना इसी को कहते हैं।
बात तो तू ठीक कह रहा है भाई। उस जिले सिंह ने इस जिले सिंह को सबक दिया है। जिले सिंह को ये तेरा दोस्त अपनी प्रेरणा बनाएगा और जिंदगी को पूरी हिम्मत से लड़ते हुए जिएगा।
अब आया न लाइन पर।
हाँ भाई बेशक देर से आया पर दुरुस्त आया।  है कि नहीं?
बिलकुल भाई!
लेखक : सुमित प्रताप सिंह

Virus-free. www.avast.com

शनिवार, 10 जून 2017

व्यंग्य : अन्नदाता का दुःख

इन दिनों अन्नदाता हैरान और परेशान हैं। उनकी हैरानी और परेशानी जायज है। वो उन कामों के लिए देश-विदेश में बदनाम हो रहे हैं, जिनको उन्होंने किया ही नहीं। उन्हें उत्पात और विध्वंश का दोषी ठहराया जा रहा है। अन्नदाता कभी उत्पात और विध्वंश करने की सोच ही नहीं सकते। वो तो इतना कर सकते हैं कि जब सहना उनके वश में न हो तो वो किसी पेड़ की डाली पर चुपचाप लटककर अथवा विषपान करके अपनी इहलीला का अंत कर लेंगे। पर उत्पात और विध्वंश करन उनके शब्दकोश में नहीं है। उन्हें सिर्फ सृजन करना आता है। उनके सृजन के फलस्वरूप ही इस संसार का पेट भर रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो संसार अन्नदाताओं के कारण ही पल रहा है,लेकिन फिर भी  संसार को अन्नदाताओं का होना खल रहा है। हर ओर से उम्मीद खोने के बाद राजनीतिक तूफान में अपनी राजनीति की नौका डुबो चुके लोगों ने अन्नदाताओं का सहारा ले फिर से नदी की धारा में अपनी नौका खेवने की भरकस कोशिश शुरू कर दी है। इसके लिए वे किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं। उनके गुंडों ने अन्नदाताओं का भेष धरकर देश में जगह-जगह विनाशलीला आरंभ कर दी है। कभी वो बहरूपिए चूहों को खाने का दिखावा करते हैं तो कभी नरमुंडों के संग फैशनेबल पोज़ देते हैं। कभी किसानों की दुर्दशा का रोना रोकर लूटपाट का सहारा लेते हैं तो कभी आगजनी कर अपने गुस्से का इजहार करते हैं। अब फिर से वो मैदान में हैं। उनके द्वारा दूध किसी भूखे के पेट में जाने की बजाय सड़कों पर बहाया गया। बसें और गाड़ियाँ फूँककर विरोध दर्शाने का ड्रामा रचा गया। लूटपाट और मारपीट का सहारा ले आंदोलन को चमकाने की भरपूर कोशिश हुई। अन्नदाताओं के कंधों का सहारा ले अपनी किस्मत चमकाने का प्रयास करनेवाले राजनीति के बाजीगर नित नई बाजी चल रहे हैं और देश और समाज को छल रहे हैं। उनका क्रोध उचित है। इतने सालों से देश में राम राज्य चल रहा था और एक दिन एक व्यक्ति आया और उसने आकर अचानक उस रामराज्य का दी एंड कर दिया। तथाकथित बुद्धिजीवी सामूहिक रूप से रामराज्य के फिर से लौटने की प्रार्थना आए दिन करते रहते हैं। उस राम राज्य की वापसी के लिए संग्राम जरूरी है और उस संग्राम को लड़ने की जिम्मेवारी किसान का भेष धरे बहरूपियों ने संभाली है। उन बहरूपियों की डोर राजनीति के बाजीगरों के हाथों में हैं। जैसे-जैसे  बहरूपियों का उत्पात बढ़ता जा रहा हैवैसे-वैसे ही अन्नदाताओं का दिल भय से धड़कने लग रहा है। वो उन बहरूपियों की लच्छेदार बातों में फँसकर बेमौत मारे जा रहे हैं। उनकी लाश पर राजनीति करनेवालों की बाँछें खिल उठी हैं। वो ब्रांडेड कपड़े पहने हुए शुद्ध पौष्टिक भोजन और बिसलेरी की बोतल अपनी काँख में दबाए हुए मोटरसाइकिल पर बिना हेलमेट पहने व ट्रिपल राइडिंग करते हुए अन्नदाताओं के दुखों और परेशानियों को हरने के दावे के साथ उनके बीच पधार चुके हैं। अब शायद अन्नदाताओं के दुःख और परेशानी दूर होने का वक़्त आ गया। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि उनके दुःख और परेशानी सुरसा जैसा विशाल आकार लेने को अग्रसर हो रहे हों।    
लेखक : सुमित प्रताप सिंह 
चित्र गूगल से साभार 
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
Blogger द्वारा संचालित.